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पाखंड का अंत -१

सिकन्दर कुमार मेहता

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फाइल फोटो

आज पड़ोस में एक साधु बाबा समस्याओं के निवारण के लिए दो -चार दिन का सतसंग-प्रवचन और भंडारा (भोज) करने की सलाह दे रहे थे ।
मैंने पूछा – क्या आपका यह उपाय कारगर साबित होगा ?
बाबा ने तपाक से कहा  – १०० % लेकिन यह सब तुम्हारे समझ से परे है ।
तभी उसके साथ आए एक सज्जन ने  कुछ मामूली पुजा-सामग्री मगांने को कहा जिसका मुल्य लगभग ₹ ५००० के आसपास थी और भंडारा का खर्च अलग ।
उसकी समस्या थी बीमारी, आपसी कलह,हमेशा कर्ज मे डुबे रहना और एक शब्द में कहें तो गरीबी ।
आज से कार्यक्रम शुरू हुआ है, देखते हैं इस संकटमोचक बाबा का कॊन सी बात है जो हमारी समझ से परे है ।

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