विरह-वेदना

सिकन्दर कुमार मेहता
न जाने अब भी मुझे तू क्यों याद आती है,
तुझसे बिछड़े तो हो गए बरषों ।
उस विरह की वेदना आज भी मुझे सताती है,
न जाने अब भी मुझे तू क्यों याद आती है ॥

पास होता तो दूर जाने की कोशिश करती,
दूर हूँ तो तू क्यूं तड़पती ।
क्या तुम्हारी भी ह्रदय कड़ाहती है ।
न जाने अब भी…..

फूल-सी कोमल हाथों का वो एहसास,
अब भी है मेरे दामन में ।
तेरे जिस्म की वो खुसबू आज भी मदहोस कर जाती है ,
न जाने अब भी…..

लौट आओ मेरे जिन्दगी में,
कब तक तड़पता रहूं ।
तेरी याद ने मुझ जैसे को भी शायर बना जाती है,
न जाने अब भी…..

(यह कविता मैने गत सप्ताह लिखा ।)

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