‘चुडैल’ होने के शक में आदिवासी महिला को नंगा कर सिर काट डाला

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गोवाहाटी (21 जुलाई):     असम में 63 साल की एक महिला को भीड़ ने ‘चुड़ैल’ होने के शक में पहले नंगा किया फिर सिर काटकर हत्या कर दी। यह घटना सोमवार को हुई। पुलिस ने इस क्रूर हत्या के संबंध में सात गांववालों को गिरफ्तार किया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना असम के बिश्वनाथ चरैली के पास भूमाजूली गांव में हुई। मृत महिला की पहचान आदिवासी पोनी ओरांग नाम से हुई है।
अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक समद हुसैन ने बताया कि देवी होने का दावा करने वाली अनीमा रोंघंती (35 साल) ने लोगों को पास के एक मंदिर में इकट्टा होने को कहा। उसने लोगों को बताया कि ओरांग एक चुड़ैल है और वह गांव में दुर्भाग्य लाएगी। इसके बाद भीड़ ओरांग के घर में घुस गई और उसे बाहर निकाल लाई। इसके बाद पास की एकनदी के पास उसे लगभग पूरा नंगाकर ले जाकर, दिन के उजाले में ही उसका गला काटकर हत्या कर दी।
रिपोर्ट के मुताबिक, महिला की मौजूदगी को गांव में लोगों के बीमार पड़ने का कारण माना जाता था। इस घटना के बाद स्थानीय आदिवासी और कारवी समुदाय में तनाव की स्थिति पैदा होने के बाद स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए अतिरिक्त पुलिस व्यवस्था का इंतजाम किया गया है।
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प्रस्तुति-सिकन्दर कुमार मेहता
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देवी की ‘दिव्य’ माहवारी, हमारे लिए ‘बीमारी’

आषाढ़ के महीने में गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर की देवी को माहवारी होती है। देवी को होने वाली इस सालाना माहवारी का भक्त पूरे साल इंतज़ार करते हैं। 4 दिन तक मंदिर बंद रहता है और कोई भी देवी के दर्शन नहीं कर सकता। मंदिर की देवी की अनुमानित योनि के पास पुजारी साफ़-नए कपड़े रखते हैं, और 4 दिन बाद ‘खून’ से भीगा यह कपड़ा भक्तों के बीच प्रसाद के तौर पर बांट दिया जाता है। इस कपड़े का प्रसाद में मिलना बड़ी क़िस्मत की बात मानी जाती है और इसलिए इसे लेने-मांगने की चाह वालों की तादाद भी काफ़ी ज़्यादा होती है। डिमांड के हिसाब से सप्लाई के लिए कपड़े के छोटे-छोटे टुकड़े किए जाते हैं ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को यह माहवारी वाला दिव्य प्रसाद नसीब हो सके।

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माना जाता है कि देवी को हो रही माहवारी के कारण ही ब्रह्मपुत्र का पानी भी उन 4 दिनों के लिए लाल हो जाता है। इस बारे में कई अफ़वाहें भी हैं। कई लोगों का मानना है कि मंदिर के पुजारी ख़ुद ही घटना का वज़न बढ़ाने के लिए ब्रह्मपुत्र के पानी में हर साल इस दौरान रंग डाल देते हैं। ख़ैर, जो भी हो इतना तो तय है कि देवी के खून से सने कपड़ों से लेकर ब्रह्मपुत्र के पानी तक, लोग श्रद्धा से ख़ुद को बेहद ख़ुशक़िस्मत मानकर देवी की माहवारी का जश्न मनाते हैं। जब मुझे यह सब पता चला था तब लगा कि इस देश में मूर्खता की कोई सीमा सोच पाना, खुद ही मूर्खता है। मतलब, जरा सोच कर देखिए…हम मूर्ख और अव्वल दर्जे की बकवास कल्पनाओं में कितना आगे निकल चुके हैं ।
मैं 9 साल की थी जब पहली बार मुझे पीरियड्स हुए थे। बहुत छोटी थी, तो पहले-पहल समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है? दुर्गापूजा का समय था, और शायद दूसरा दिन था। सुबह-सुबह मेरा भाई पूजा के लिए गुड़हल के फूल तोड़ रहा था। मैंने पीले रंग की एक स्कर्ट पहनी थी जिस पर हाथी और पालकी की ख़ूबसूरत तस्वीरें बनी थीं। मेरे भाई ने मेरी स्कर्ट पर कुछ लाल-सा लगा देखा और मुझसे पूछा कि क्या लगा है। मैंने देखा और सोचा कि शायद गुड़हल का लाल रंग लग गया होगा। बाद में नहाते समय अपने कपड़े देखे तो डर गई। इतना सारा खून पहले कभी नहीं देखा था। भाग कर मां के पास आई और मां को दिखाकर पूछा कि क्या हुआ है। मां चौंकी, शायद सोच रही होंगी कि इतनी जल्दी कैसे हो गया। फिर उन्होंने समझाया कि कोई बात नहीं, एक उम्र के बाद सबको होता है। मां ने बताया कि कैसे-कैसे क्या करना है और किन बातों का ख़्याल रखना है।यह भी ताक़ीद की कि किसी से न बोलूं इस बारे में। मैंने मन में सोचा कि जब सबको ही होता है तो किसी से राज़ रखने की क्या ज़रूरत। उसके पहले मां हर रोज सांझ का दिया दिखाते हुए ज़बरदस्ती खुद के साथ मुझे शामिल करती थीं। दुर्गापूजा के पूरे 9 दिन घर भर का रूटीन बदल जाता था। पूरा घर सुबह अंधेरे ही उठ जाता था। फूल तोड़ने से लेकर घर की सफ़ाई के सारे काम जल्दी निपटा लिए जाते थे। मिट्टी के दिये बनाए जाते थे।इन दियों को शाम में जलाया जाता था। दोनों समय लंबी पूजाएं होती थीं, और दोनों ही समय आरती हुआ करती थी। आरती के बाद शंख बजता था और सबको प्रसाद मिलता था। पूजा के लिए इस दौरान अलग जगह होती थी, जहां मिट्टी के एक छोटे-से चबूतरे पर जौ के दाने डाले जाते थे। दशहरे वाले दिन तक उसमें अंगुली भर तक लंबी जौ उग जाती थी। इसे जयंती कहा जाता था। इसे सिर पर रखने के अलावा, पुरुष कान में फंसाते थे और हम बच्चों को इसे अपनी किताबों में रखने को कहा जाता था। उस साल पूजा के दूसरे दिन सुबह-सुबह मुझे पीरियड्स हुए थे। दर्द और अजीब से लिजलिजेपन के अलावा जो सबसे पहला अंतर मुझे महसूस हुआ वह था मां का मुझे पूजा में शामिल ना करना।

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हालांकि पहले जब मां ज़बरदस्ती शामिल करती थीं तब मुझे चिढ़ होती थी, लेकिन अब जब नियम बनाकर पीरियड्स के दौरान भगवान को छूने या फिर पूजा के किसी भी काम में शामिल न होने को कहा गया तब मुझे अखर रहा था। पूजा ना करना मेरे लिए मुद्दा नहीं था, ज़बरदस्ती ना करने को कहना मुद्दा था। फ़िर पता चलाकि हर कोई इसी नियम से चलता है। क्लास में दोस्तों से पूछा तो उनसे पता चला कि उनके यहां भी यही नियम है। मेरी कई दोस्त मारवाड़ी समुदाय की थीं। उनके यहां तो नियम और भी सख़्त थे। पीरियड्स के दौरान महिलाओं और लड़कियों को रसोई में जाने, घर के रोज़ाना के बर्तनों में खाने, बिस्तर पर सोने या घर की किसी चीज को हाथ लगाने तक की मनाही थी। मुझे समझ ही नहीं आया तब कि इस बात का मतलब और तुक क्या है? अजीब था बस मेरे लिए। एक तो मुझे उतना ही पता था जितना मां ने बताया था। इतना सा कि एक उम्र में आने के बाद सबको होता है। बस। और कुछ नहीं। और पता था कि कैसे रहते हैं। समय-समय पर देखना होता था कि पैड बदलने की ज़रूरत तो नहीं है, कपड़े में तो नहीं लगा वग़ैरह-वग़ैरह। मुझे यह सब बहुत बड़ी एक मुसीबत ही लगती थी। पहले कभी स्कूल में खेलते वक़्त सोचना नहीं होता था। धूल-मिट्टी, कीचड़, इंक… इन सबसे कपड़े रोज़ ही गंदे होतेथे, लेकिन कोई मज़ाक नहीं उड़ाता था । मुझसे कहा गया था कि पीरियड्स में अगर कपड़े गंदे हुए, मतलब अगर कहीं किसी ने खून लगा देख लिया तो शर्मिंदगी की बात है।मैंने छोटी क्लास में कई बच्चों को यूनिफॉर्म में ही पेशाब करते देखा था। मुझे पता था कि ऐसा करने पर मजाक उड़ता है। जब मैं छोटी थी तब सोते समय एक ही सपना रोज़ देखती थी कि पापा के दोस्त घर आए हैं औरउन्होंने मुझसे पानी मांगा है। मुझे बाथरूम जाना है, लेकिन मैं पहले उनको पानी देती हूं और फिर भागकर बाथरूम जाती हूं। वहां पहुंचकर मैं टॉयलेट करती हूं। सपने में ठीक इसी जगह यह देखते हुए मैं असली में अपने बिस्तर पर टॉयलेट कर देती थी। छोटी थी तब मैं बहुत, फिर भी मुझे लगा था कि यह गंदी बात होती है। जल्दी ही आदत छूट गई। पर पीरियड्स में कपड़े पर हल्का-सा भी निशान न लग जाए, यह मेरे वश में नहीं था। एक दिन की बाततो थी नहीं, हर महीने की चीज़ थी। इतना संभालना मुश्किल था। चिढ़ होती थी मुझे। एक तो दर्द, ऊपर से इतना फूंक-फूंक कर चलना-रहना और उससे भी बढ़कर ऐसे-न-करो-वैसे-न-करो की टोकाटाकी ।

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हुआ फिर यह कि कुछ महीने बाद मैंने मां को बताना ही बंद कर दिया। मैं स्वाभाविक रहती, हावभाव से जताती ही नहीं और दर्द हो रहा है यह भी नहीं बोलती। एक-दो बार जब ऐसा कर लिया और मां को पता नहीं चला तब मुझे लगा कि यह नाटक उतना भी नामुमकिन नहीं है। मां को जब पता ही नहीं चलता तो फिर अपनी आदत के मुताबिक़ वह मुझे पूजा में शामिल करतीं। पहले-पहल अंदर धुकधुकी-सी लगी रहती थी। छोटी ही थी, सो लगता था कि कहीं देवता नाराज़न हो जाएं। पर मेरा रिज़ल्ट भी वैसा ही आया, जैसा आता था। सबकुछ मस्त था ज़िदगी में, वैसा ही जैसा हुआ करता था। तब लगा कि अरे, भगवान को तो कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा  पीरियड्स में मेरे हाथों छू लिए जाने पर। फ़िर तो आदत ही बन गई। मां पूछती थीं कई बार, फ़िर उनको लगता था कि मैं शर्मा रही हूं सो नहीं बताती हूं। सो धीरे-धीरे उन्होंने पूछना भी छोड़ दिया।मेरी मां अपनी आस्तिकता के मामले में अपने लिए बेहद कट्टर हैं, लेकिन औरों पर वह अपनी कट्टरता थोपती नहीं हैं। सो शायद उनको लग गया कि मैं पीरियड्स में भी सब छूती हूं और मुझे रोक-टोक अच्छी नहीं लगती। दो-तीन बार उन्होंने अपना पक्ष समझाने की कोशिश की, लेकिन यह समझकर कि मुझे अपने तरीके से चीज़ेंकरना अच्छा लगता है, उन्होंने टोकना छोड़ दिया। मुझे याद है कि कई बार उन्होंने अपने मन को समझाने के लिए दादी को मेरे बारे में बताते हुए यह भी कहा कि उसको जैसा करना है करने दीजिए, आख़िर देवी तो जानती ही होंगी। हमारा परिवार शाक्त है, सो शक्ति ही उनकी कुलदेवी हैं। मुझे अपनी मां का तर्क जंचा था। मैं तब भी आस्तिक नहीं थी, लेकिन तब मैं नास्तिक भी नहीं थी। बावजूद इसके फ़ालतू के  रस्म-ओ-रिवाज़ मानने से मुझे एक तरह की कोफ़्त हुआ करती थी ।मेरे पापा के मौसेरे भाई की बीवी ऐसे लोगों में से हैं जो अपनी कट्टरता दूसरों पर थोपकर ही मानती हैं। एक बार उनके घर पर थी जब मुझे पीरियड्स हुए थे। मैं उनको भीन बताती, लेकिन मेरे पास नैपकिन नहीं था। सो उनसे मंगवाने के लिए कहते समय उनको बताना पड़ा। उन्होंने मुझे कपड़ा इस्तेमाल करने को कहा, लेकिन मेरे इनकार करने पर उन्होंने मजबूरी में मंगवा दिया। पूरे चार दिन तक बहुत परेशान किया उन्होंने मुझे। चटाई पर सुलातीं, ज़मीन पर बिठातीं, अलग बर्तन में अलग से एक कोने में बैठाकर खाना देतीं मुझे।

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मुझे यह सब अपनी बेइज़्ज़ती जैसा लगता था। घर आकर जब मैंने मां को उनके बर्ताव के बारे में बताया तो बेहद शांत रहने वाली मेरी मां ने फ़ोन कर उनको बहुत सुनाया था। पहली बार उनके यहां ही महसूस किया मैंने कि लड़कियों और महिलाओं को कितना कुछ सहना पड़ता है माहवारी के नाम पर। ऐसा महसूस करवाया जाता है कि वे गंदी हो गई हैं इस दौरान और स्वाभाविक ज़िंदगी नहीं जी सकतीं। इतना कुछ हर महीने महसूस करने के बाद कोई ताज़्जुब नहीं कि वे ख़ुद इस फालतू थियरी पर इतना यक़ीन करने लगती हैं कि मौका आने पर अपनी बेटी और बहू के साथ इतनी ही सख़्ती से ऐसा ही व्यवहार करती हैं। पुरुषों के पास इसके लिए कौन सी वजह होती है यह नहीं पता। कामाख्या देवी की कथित माहवारी के कपड़े प्रसाद में लेने के लिए जिनके हाथ बड़ी श्रद्धा में पसर कर ख़ुद को कृतार्थ मानते हैं, वही लोग अपने घर की लड़कियों और महिलाओं को उनकी माहवारी में गंदा मानकर कैसे अछूत मानलेते हैं, यह मेरी समझ के बाहर है। पुरुष कहेंगे कि घर की औरतों का मामला है, औरतें ही मानती हैं और औरतें ही मनवाती हैं। वह नहीं कहते ऐसा करने को। ठीक है, लेकिन कभी ऐसा ना करने को भी तो नहीं कहते। कभी समझाते भी तो नहीं कि क्यों ऐसा करना फ़ालतू और बकवास काम है।
कल एक दोस्त, नीतीश से बात हो रही थी। उसने बताया कि रोमन साम्राज्य के दौरान वेश्यावृत्ति एक पेशे के तौर पर स्वीकार्य थी। शहर के बीचों बीच वेश्यालय हुआ करते थे। एक कॉलोनी की तरह। वहां बाहर एक बोर्ड पर रोज़ लिखा जाता था कि आज इस वेश्या को माहवारी हुई है, किसी को होने की संभावना है। दूर-दूर से किसान, व्यवसायी और भी तमाम लोग इस दौरान आते थे और मुंहमांगी क़ीमत देकर माहवारी का ख़ून ख़रीदा करते थे। वहां मान्यता थी कि माहवारी प्रजनन का प्रतीक है और इसीलिए इसे सम्मान से देखाजाता था। मानते थे कि इसके ख़ून को खेत में छिड़कने से फ़सल अच्छी होती है। मिट्टी भी तो फ़सल को जनती ही है ना। हां ये बात दीग़र है कि मिट्टी को माहवारी नहीं होती है।एक बार फ़िर कहूंगी, अजीब है यह क़ौम। औरतों के साथ तो भेदभाव है ही। जानवर भी इससे अछूते नहीं हैं। दुकानों में कुत्ते बिकते हैं। नस्ल के हिसाब से क़ीमत तय होती है। वहां भी कुत्ते की क़ीमत ज्यादा होती है। कुतिया की क़ीमत कम होती है। आप में से अगर किसी के पास कभी कुतिया रही हो तो आप जानते होंगे कि उसको भी माहवारी होती है। वो पैड तो लगा नहीं सकती, सो जहां बैठती है, वहीं टपकता रहता है। लोगों को इससे आपत्ति है।यह नहीं कि उसे एक चादर दे दें, लोगों को बस घृणा आती है।इसलिए कुतिया पालने से आपत्ति है, और इसलिए ही उनकी क़ीमत कम होती है। गाय का मामला अलग है।गाय क्योंकि दूध देती है इसलिए उसकी क़ीमत और उसका मान ज़्यादा होता है। कहावत है ना कि दुधारु गाय की लात भी सही…वैसे ही। दिक़्क़त बस यही है कि जो लोग देवी की माहवारी को श्रद्धा से देखते हैं, वे यह सब कैसे कर पाते हैं। देवी आपके बच्चे नहीं जनेंगीं, ना ही वह आपका घर और आपका परिवार संभालेंगी। फ़िर क्यों है देवी की ‘गंदगी’ पर इतनी श्रद्धा? और जिस देवी को खुद यह ‘गंदगी’ होती हो, वह किसी और लड़की या महिला के अपने माहवारी के दौरान छू दिए जानेसे कैसे गंदी हो सकती है, यह मेरी समझ के बाहर है।

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स्वाति मिश्रा

स्वाति मिश्रा

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Top 15 Famous Indian Superstitions List

India is a land of religions. Just like India’s languages, the religion changes after a few kilometres. As we know that “With Great Power comes Great Responsibilities”, in the same manner, With large number of religions come large number and kind of superstitions.
Although many superstitions are in no way, related to any religion, but they directly or indirectly are influenced by these factors.
Being an Indian, superstitions are the things that we grew up with, and these superstitions have over powered our mind in such a manner that we unconsciously get carried away by that superstition, as our mind takes that superstition as a daily deed, without giving it any different behaviour. This happens because of us facing these superstitions regularly, as a part of our daily chore, and thus they don’t affect us, but for the people who observe us do feel a change in our behaviour when we are being influenced by these superstitions. A few of these behaviourial activities performed by us unintentionally, that render us a title of being a “Typical Indian” are mentioned here.

15. Let us bribe GOD

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Bribing GOD is as common as taking a bath as both of these things happen almost everyday. Bribing God in India is more of a culture than that of a superstition. Not only in Hindu religion, but in other religions also, bribing God is a medium of getting your wishes fulfilled. It can be heard very commonly from the lips of a student praying to God that “Please pass us in the examinations and we will dedicate sweets worth a particular amount to you!” I don’t understand if this is a give and take offer or a simple pray? And whenever I observe a pray, I always feel it to be a give and take offer, as people offering their belongings to religious places and asking for some personal benefited output in return. Sometimes fasting for a day or two is also a way of bribing God, and I just don’t understand as to why God will enjoy seeing you starve?

14. The Day Phobia

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The literal meaning of “phobia” is extreme fear of something, and the Indian superstitions have rendered a phobia among people regarding a few days of the week. Sounds weird but is true. Indian parents inhabit this habit in their children right from the birth by creating a fear in them that ifthey cut their nails or hair, or wash their hair, or wash their clothes on some days of week, particularly Tuesday and Thursday, something bad will happen to them, which they used to call as “Paap” which literally means that God will do something bad with them as they tried to do something bad to God by cutting their nails on those particular days.

13. The Number 13

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That is a pretty common superstition living in the hearts and minds of numerous people around India. The fear of number 13 is the biggest fear in their life. They don’t perform any big task, or begin a new business on 13th of any month, especially when that 13th is a Friday. This superstition is so persistent that the city of Chandigarh doesn’t even have a Sector 13.

12. Live in a fear for a better Future

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If you are a regular visitor to any sort of religious place in India, you would come across this dialogue by the priest that your future deeds and the next incarnations depend upon the deeds you do in this life. If you remain really well, peaceful and calm, and don’t involve yourself in any sort of cruelty, it would lead to you obtaining a better life after you die! But I wonder, why live your life in a fear of the future, when you don’t even know what is going to happen with you in the next instant. It is also said that“Live in your present, the future will make way for itself”. So you got to agree on this quote and have a little faith in you.

11. Having sea food with milk products will give you Vitiligo

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I guess you are a vegan, as being a non-vegan is also a sin in many parts of this subcontinent. But if you are fond of meat and sea food, you might have seen this dialogue striking you very often that Don’t eat fish with milk or any other milk product, and when you asked the reason, you would get a reply that it would give you Vitiligo, which is a disease that causes white patches on your skin, whereas vitiligo happens due to absence of a certain kind of pigments from the body’s system. In no manner can this combination cause vitiligo.

10. Are you going out?

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If you are going out and someone sneezes in front of you, that is said to be a bad omen, and the work you are going to perform won’t just happen. Similar is when you are going somewhere, and someone else calls you from your back. But if we think practically and logically, then how could anyone calling us or sneezing in front of us can prevent us from completing the job we are assigned to perform?

9. Nazar Utaarna

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When you are going to perform some big work, like entering into a new house, or if you are praising the looks of a newly born child, you would notice his/her mother,taking a little eye liner out of their eye and putting it up on the neck or at the back of ear of that kid. This is called Nazar Utaarna, which is usually done to prevent anyone from putting a negative vibe over the small kid. The process is simple, which is done by putting a black coloured dot (bindi) on the kid or by tying a black coloured thread on the kid’s hand or leg. Another process of preventing people from putting a negative vibe over anewly bought property is by tying a combination of chilli and lemon into a thread and hanging it in front of that property.

8. Sleeping with a scissor or a knife under your pillow avoids bad dreams

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Are you also prone to getting bad dreams, that leads you waking up in the middle of the night? Well, there is a simple soloution to this mindbobbling problem. Just keep a knife or a pair of scissors under your pillow before yougo to sleep, and this would prevent all the negative thoughts coming to your mind get a positive effect. This is what India thinks, and the thought that Indians grew up with!

7. Invite quarrels and fights with a broken glass/mirror!

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If your mirror has broken down, or the cutlery made ofglass has broken down, dispose it off as soon as possible. Don’t keep it or any part of it in your house as it would give an invitation to fights and quarrels with the people. Now, these people can be your family members,your neighbors or even the person that is walking down the street. I think the actual reason, this superstition was created is so that the broken pieces of glass don’t hurt anyone. So, in order to create a fear among people, a dangerous sounding superstition was created.

6. Don’t shake your legs

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When I was a child, my mother used to tell me not to shake my legs when I was sitting idle. When I asked herthe reason, she simply said that it brings bad luck in the family. I didn’t understand the concept as the reason our body unintentionally shakes our legs is in order to maintain body heat by regulating the temperature. How can it be related to the invitation of some sort of bad luck ?

5. A Black Cat crossing your way !

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This superstition is so prominent in the minds of people that they just can’t live with the fact that it is justa superstition. I have seen people changing their whole route just because a black catcrossed their way, and if by mistake, they walk the path crossed by the cat, the fear in their mind is so prominent that something bad surely happens with them, although the cat is not the reason of it.

4. Sweeping the floor in evening !

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Sweeping the floor in the evening hours is said to be a taboo in Indian culture. They say it also brings bad luck in home, which is quite a peculiar way of making someone fearful of something, as a person gets what he thinks. If he thinks he is going to get something bad, he performs accordingly, and ends up in achieving that bad thing. The probable reason for our ancestors preventing us to sweep the floor at night timeis if some valuable product gets swept away in the darkness of the night.

3. Teen Tigaada Kaam Bigaada

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The meaning of this quote is “Three is Unlucky”. Just like The Number 13, 3 is also rendered to be unlucky in various sorts, like going to do some work in a group of 3 would surely give a negative output. That is why, it is said that 3 Tigaada, Kaam Bigaada.

2. Coconut Cracking

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Before entering into the newly bought car, or before entering in your new house, before any such auspicious and joyful step, a coconut would be stroke on the ground with high force, so that it breaks into pieces. This is meant as a way of inaugurating a newly bought thing and praying for its longevity.

1. The One Rupee Story

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You might have seen at weddings, that a wedding gift in thr form of cash is handed over to the bride’s/groom’s parents in a decorative envelope, having a 1 rupee coin taped in the front. This 1rupee coin speaks more than it shows. In the envelope, one can simply insert a currency note of desired amount and the adjoining 1 rupee would render it to be a Shagun or a wedding gift for the happiness of the family. That 1 rupee is what differentiates a simple note from Shagun.

In the end, I would like to tell everyone what I think these superstitions actually mean. They are nothing but asmall portion of our mind, that force us to take the job we are doing in some other way. These superstitions just divert our mind from the path described by us, which leads to distortion of the taskor the in completion of the task, which is devised by our mind as a consequence of that superstition.

Brought to You By –Sikandar Kumar Mehta

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