देवी की ‘दिव्य’ माहवारी, हमारे लिए ‘बीमारी’

आषाढ़ के महीने में गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर की देवी को माहवारी होती है। देवी को होने वाली इस सालाना माहवारी का भक्त पूरे साल इंतज़ार करते हैं। 4 दिन तक मंदिर बंद रहता है और कोई भी देवी के दर्शन नहीं कर सकता। मंदिर की देवी की अनुमानित योनि के पास पुजारी साफ़-नए कपड़े रखते हैं, और 4 दिन बाद ‘खून’ से भीगा यह कपड़ा भक्तों के बीच प्रसाद के तौर पर बांट दिया जाता है। इस कपड़े का प्रसाद में मिलना बड़ी क़िस्मत की बात मानी जाती है और इसलिए इसे लेने-मांगने की चाह वालों की तादाद भी काफ़ी ज़्यादा होती है। डिमांड के हिसाब से सप्लाई के लिए कपड़े के छोटे-छोटे टुकड़े किए जाते हैं ताकि ज़्यादा-से-ज़्यादा लोगों को यह माहवारी वाला दिव्य प्रसाद नसीब हो सके।

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माना जाता है कि देवी को हो रही माहवारी के कारण ही ब्रह्मपुत्र का पानी भी उन 4 दिनों के लिए लाल हो जाता है। इस बारे में कई अफ़वाहें भी हैं। कई लोगों का मानना है कि मंदिर के पुजारी ख़ुद ही घटना का वज़न बढ़ाने के लिए ब्रह्मपुत्र के पानी में हर साल इस दौरान रंग डाल देते हैं। ख़ैर, जो भी हो इतना तो तय है कि देवी के खून से सने कपड़ों से लेकर ब्रह्मपुत्र के पानी तक, लोग श्रद्धा से ख़ुद को बेहद ख़ुशक़िस्मत मानकर देवी की माहवारी का जश्न मनाते हैं। जब मुझे यह सब पता चला था तब लगा कि इस देश में मूर्खता की कोई सीमा सोच पाना, खुद ही मूर्खता है। मतलब, जरा सोच कर देखिए…हम मूर्ख और अव्वल दर्जे की बकवास कल्पनाओं में कितना आगे निकल चुके हैं ।
मैं 9 साल की थी जब पहली बार मुझे पीरियड्स हुए थे। बहुत छोटी थी, तो पहले-पहल समझ ही नहीं आया कि हुआ क्या है? दुर्गापूजा का समय था, और शायद दूसरा दिन था। सुबह-सुबह मेरा भाई पूजा के लिए गुड़हल के फूल तोड़ रहा था। मैंने पीले रंग की एक स्कर्ट पहनी थी जिस पर हाथी और पालकी की ख़ूबसूरत तस्वीरें बनी थीं। मेरे भाई ने मेरी स्कर्ट पर कुछ लाल-सा लगा देखा और मुझसे पूछा कि क्या लगा है। मैंने देखा और सोचा कि शायद गुड़हल का लाल रंग लग गया होगा। बाद में नहाते समय अपने कपड़े देखे तो डर गई। इतना सारा खून पहले कभी नहीं देखा था। भाग कर मां के पास आई और मां को दिखाकर पूछा कि क्या हुआ है। मां चौंकी, शायद सोच रही होंगी कि इतनी जल्दी कैसे हो गया। फिर उन्होंने समझाया कि कोई बात नहीं, एक उम्र के बाद सबको होता है। मां ने बताया कि कैसे-कैसे क्या करना है और किन बातों का ख़्याल रखना है।यह भी ताक़ीद की कि किसी से न बोलूं इस बारे में। मैंने मन में सोचा कि जब सबको ही होता है तो किसी से राज़ रखने की क्या ज़रूरत। उसके पहले मां हर रोज सांझ का दिया दिखाते हुए ज़बरदस्ती खुद के साथ मुझे शामिल करती थीं। दुर्गापूजा के पूरे 9 दिन घर भर का रूटीन बदल जाता था। पूरा घर सुबह अंधेरे ही उठ जाता था। फूल तोड़ने से लेकर घर की सफ़ाई के सारे काम जल्दी निपटा लिए जाते थे। मिट्टी के दिये बनाए जाते थे।इन दियों को शाम में जलाया जाता था। दोनों समय लंबी पूजाएं होती थीं, और दोनों ही समय आरती हुआ करती थी। आरती के बाद शंख बजता था और सबको प्रसाद मिलता था। पूजा के लिए इस दौरान अलग जगह होती थी, जहां मिट्टी के एक छोटे-से चबूतरे पर जौ के दाने डाले जाते थे। दशहरे वाले दिन तक उसमें अंगुली भर तक लंबी जौ उग जाती थी। इसे जयंती कहा जाता था। इसे सिर पर रखने के अलावा, पुरुष कान में फंसाते थे और हम बच्चों को इसे अपनी किताबों में रखने को कहा जाता था। उस साल पूजा के दूसरे दिन सुबह-सुबह मुझे पीरियड्स हुए थे। दर्द और अजीब से लिजलिजेपन के अलावा जो सबसे पहला अंतर मुझे महसूस हुआ वह था मां का मुझे पूजा में शामिल ना करना।

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हालांकि पहले जब मां ज़बरदस्ती शामिल करती थीं तब मुझे चिढ़ होती थी, लेकिन अब जब नियम बनाकर पीरियड्स के दौरान भगवान को छूने या फिर पूजा के किसी भी काम में शामिल न होने को कहा गया तब मुझे अखर रहा था। पूजा ना करना मेरे लिए मुद्दा नहीं था, ज़बरदस्ती ना करने को कहना मुद्दा था। फ़िर पता चलाकि हर कोई इसी नियम से चलता है। क्लास में दोस्तों से पूछा तो उनसे पता चला कि उनके यहां भी यही नियम है। मेरी कई दोस्त मारवाड़ी समुदाय की थीं। उनके यहां तो नियम और भी सख़्त थे। पीरियड्स के दौरान महिलाओं और लड़कियों को रसोई में जाने, घर के रोज़ाना के बर्तनों में खाने, बिस्तर पर सोने या घर की किसी चीज को हाथ लगाने तक की मनाही थी। मुझे समझ ही नहीं आया तब कि इस बात का मतलब और तुक क्या है? अजीब था बस मेरे लिए। एक तो मुझे उतना ही पता था जितना मां ने बताया था। इतना सा कि एक उम्र में आने के बाद सबको होता है। बस। और कुछ नहीं। और पता था कि कैसे रहते हैं। समय-समय पर देखना होता था कि पैड बदलने की ज़रूरत तो नहीं है, कपड़े में तो नहीं लगा वग़ैरह-वग़ैरह। मुझे यह सब बहुत बड़ी एक मुसीबत ही लगती थी। पहले कभी स्कूल में खेलते वक़्त सोचना नहीं होता था। धूल-मिट्टी, कीचड़, इंक… इन सबसे कपड़े रोज़ ही गंदे होतेथे, लेकिन कोई मज़ाक नहीं उड़ाता था । मुझसे कहा गया था कि पीरियड्स में अगर कपड़े गंदे हुए, मतलब अगर कहीं किसी ने खून लगा देख लिया तो शर्मिंदगी की बात है।मैंने छोटी क्लास में कई बच्चों को यूनिफॉर्म में ही पेशाब करते देखा था। मुझे पता था कि ऐसा करने पर मजाक उड़ता है। जब मैं छोटी थी तब सोते समय एक ही सपना रोज़ देखती थी कि पापा के दोस्त घर आए हैं औरउन्होंने मुझसे पानी मांगा है। मुझे बाथरूम जाना है, लेकिन मैं पहले उनको पानी देती हूं और फिर भागकर बाथरूम जाती हूं। वहां पहुंचकर मैं टॉयलेट करती हूं। सपने में ठीक इसी जगह यह देखते हुए मैं असली में अपने बिस्तर पर टॉयलेट कर देती थी। छोटी थी तब मैं बहुत, फिर भी मुझे लगा था कि यह गंदी बात होती है। जल्दी ही आदत छूट गई। पर पीरियड्स में कपड़े पर हल्का-सा भी निशान न लग जाए, यह मेरे वश में नहीं था। एक दिन की बाततो थी नहीं, हर महीने की चीज़ थी। इतना संभालना मुश्किल था। चिढ़ होती थी मुझे। एक तो दर्द, ऊपर से इतना फूंक-फूंक कर चलना-रहना और उससे भी बढ़कर ऐसे-न-करो-वैसे-न-करो की टोकाटाकी ।

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हुआ फिर यह कि कुछ महीने बाद मैंने मां को बताना ही बंद कर दिया। मैं स्वाभाविक रहती, हावभाव से जताती ही नहीं और दर्द हो रहा है यह भी नहीं बोलती। एक-दो बार जब ऐसा कर लिया और मां को पता नहीं चला तब मुझे लगा कि यह नाटक उतना भी नामुमकिन नहीं है। मां को जब पता ही नहीं चलता तो फिर अपनी आदत के मुताबिक़ वह मुझे पूजा में शामिल करतीं। पहले-पहल अंदर धुकधुकी-सी लगी रहती थी। छोटी ही थी, सो लगता था कि कहीं देवता नाराज़न हो जाएं। पर मेरा रिज़ल्ट भी वैसा ही आया, जैसा आता था। सबकुछ मस्त था ज़िदगी में, वैसा ही जैसा हुआ करता था। तब लगा कि अरे, भगवान को तो कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ा  पीरियड्स में मेरे हाथों छू लिए जाने पर। फ़िर तो आदत ही बन गई। मां पूछती थीं कई बार, फ़िर उनको लगता था कि मैं शर्मा रही हूं सो नहीं बताती हूं। सो धीरे-धीरे उन्होंने पूछना भी छोड़ दिया।मेरी मां अपनी आस्तिकता के मामले में अपने लिए बेहद कट्टर हैं, लेकिन औरों पर वह अपनी कट्टरता थोपती नहीं हैं। सो शायद उनको लग गया कि मैं पीरियड्स में भी सब छूती हूं और मुझे रोक-टोक अच्छी नहीं लगती। दो-तीन बार उन्होंने अपना पक्ष समझाने की कोशिश की, लेकिन यह समझकर कि मुझे अपने तरीके से चीज़ेंकरना अच्छा लगता है, उन्होंने टोकना छोड़ दिया। मुझे याद है कि कई बार उन्होंने अपने मन को समझाने के लिए दादी को मेरे बारे में बताते हुए यह भी कहा कि उसको जैसा करना है करने दीजिए, आख़िर देवी तो जानती ही होंगी। हमारा परिवार शाक्त है, सो शक्ति ही उनकी कुलदेवी हैं। मुझे अपनी मां का तर्क जंचा था। मैं तब भी आस्तिक नहीं थी, लेकिन तब मैं नास्तिक भी नहीं थी। बावजूद इसके फ़ालतू के  रस्म-ओ-रिवाज़ मानने से मुझे एक तरह की कोफ़्त हुआ करती थी ।मेरे पापा के मौसेरे भाई की बीवी ऐसे लोगों में से हैं जो अपनी कट्टरता दूसरों पर थोपकर ही मानती हैं। एक बार उनके घर पर थी जब मुझे पीरियड्स हुए थे। मैं उनको भीन बताती, लेकिन मेरे पास नैपकिन नहीं था। सो उनसे मंगवाने के लिए कहते समय उनको बताना पड़ा। उन्होंने मुझे कपड़ा इस्तेमाल करने को कहा, लेकिन मेरे इनकार करने पर उन्होंने मजबूरी में मंगवा दिया। पूरे चार दिन तक बहुत परेशान किया उन्होंने मुझे। चटाई पर सुलातीं, ज़मीन पर बिठातीं, अलग बर्तन में अलग से एक कोने में बैठाकर खाना देतीं मुझे।

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मुझे यह सब अपनी बेइज़्ज़ती जैसा लगता था। घर आकर जब मैंने मां को उनके बर्ताव के बारे में बताया तो बेहद शांत रहने वाली मेरी मां ने फ़ोन कर उनको बहुत सुनाया था। पहली बार उनके यहां ही महसूस किया मैंने कि लड़कियों और महिलाओं को कितना कुछ सहना पड़ता है माहवारी के नाम पर। ऐसा महसूस करवाया जाता है कि वे गंदी हो गई हैं इस दौरान और स्वाभाविक ज़िंदगी नहीं जी सकतीं। इतना कुछ हर महीने महसूस करने के बाद कोई ताज़्जुब नहीं कि वे ख़ुद इस फालतू थियरी पर इतना यक़ीन करने लगती हैं कि मौका आने पर अपनी बेटी और बहू के साथ इतनी ही सख़्ती से ऐसा ही व्यवहार करती हैं। पुरुषों के पास इसके लिए कौन सी वजह होती है यह नहीं पता। कामाख्या देवी की कथित माहवारी के कपड़े प्रसाद में लेने के लिए जिनके हाथ बड़ी श्रद्धा में पसर कर ख़ुद को कृतार्थ मानते हैं, वही लोग अपने घर की लड़कियों और महिलाओं को उनकी माहवारी में गंदा मानकर कैसे अछूत मानलेते हैं, यह मेरी समझ के बाहर है। पुरुष कहेंगे कि घर की औरतों का मामला है, औरतें ही मानती हैं और औरतें ही मनवाती हैं। वह नहीं कहते ऐसा करने को। ठीक है, लेकिन कभी ऐसा ना करने को भी तो नहीं कहते। कभी समझाते भी तो नहीं कि क्यों ऐसा करना फ़ालतू और बकवास काम है।
कल एक दोस्त, नीतीश से बात हो रही थी। उसने बताया कि रोमन साम्राज्य के दौरान वेश्यावृत्ति एक पेशे के तौर पर स्वीकार्य थी। शहर के बीचों बीच वेश्यालय हुआ करते थे। एक कॉलोनी की तरह। वहां बाहर एक बोर्ड पर रोज़ लिखा जाता था कि आज इस वेश्या को माहवारी हुई है, किसी को होने की संभावना है। दूर-दूर से किसान, व्यवसायी और भी तमाम लोग इस दौरान आते थे और मुंहमांगी क़ीमत देकर माहवारी का ख़ून ख़रीदा करते थे। वहां मान्यता थी कि माहवारी प्रजनन का प्रतीक है और इसीलिए इसे सम्मान से देखाजाता था। मानते थे कि इसके ख़ून को खेत में छिड़कने से फ़सल अच्छी होती है। मिट्टी भी तो फ़सल को जनती ही है ना। हां ये बात दीग़र है कि मिट्टी को माहवारी नहीं होती है।एक बार फ़िर कहूंगी, अजीब है यह क़ौम। औरतों के साथ तो भेदभाव है ही। जानवर भी इससे अछूते नहीं हैं। दुकानों में कुत्ते बिकते हैं। नस्ल के हिसाब से क़ीमत तय होती है। वहां भी कुत्ते की क़ीमत ज्यादा होती है। कुतिया की क़ीमत कम होती है। आप में से अगर किसी के पास कभी कुतिया रही हो तो आप जानते होंगे कि उसको भी माहवारी होती है। वो पैड तो लगा नहीं सकती, सो जहां बैठती है, वहीं टपकता रहता है। लोगों को इससे आपत्ति है।यह नहीं कि उसे एक चादर दे दें, लोगों को बस घृणा आती है।इसलिए कुतिया पालने से आपत्ति है, और इसलिए ही उनकी क़ीमत कम होती है। गाय का मामला अलग है।गाय क्योंकि दूध देती है इसलिए उसकी क़ीमत और उसका मान ज़्यादा होता है। कहावत है ना कि दुधारु गाय की लात भी सही…वैसे ही। दिक़्क़त बस यही है कि जो लोग देवी की माहवारी को श्रद्धा से देखते हैं, वे यह सब कैसे कर पाते हैं। देवी आपके बच्चे नहीं जनेंगीं, ना ही वह आपका घर और आपका परिवार संभालेंगी। फ़िर क्यों है देवी की ‘गंदगी’ पर इतनी श्रद्धा? और जिस देवी को खुद यह ‘गंदगी’ होती हो, वह किसी और लड़की या महिला के अपने माहवारी के दौरान छू दिए जानेसे कैसे गंदी हो सकती है, यह मेरी समझ के बाहर है।

लेखक को जानें-

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स्वाति मिश्रा

स्वाति मिश्रा

प्रस्तुतकर्ता-सिकन्दर कुमार मेहता
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