समाज से शिकायत

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शिकायत है मुझे उस समाज से,
अंधविश्वास में जीते हर
उस इन्सान से,
दिल में बसे उनके मंद – बुद्धि
जज़्बात से…

कहते हैं वो,
पुरखों से चली आई
परम्परागत विद्या,ये महान है।
करेंगे सब कुछ इसे ही मानते वो
अपनी आन हैं,सत्य से ना जाने,
वो क्यों अंजान हैं,
मेरी नज़रों में,
ये मूर्खता अति महान है।

शिकायत है मुझे उस समाज से,
आँखों पे अँधा नकाब ओढ़े,
अंधेरों में राह तलाशने के प्रयास से।
पाखन्डी बाबाओं में ढूंढते,
वो तेरा स्वरुप निरंकार हैं,
विज्ञान का ज्ञान नहीं,
परम ज्ञान का जिन्हे अहंकार है।

ना जाने समस्या का,
ये कैसा समाधान है,
जहाँ नर बलि जैसी प्रथा भी
लगती आम है।

शिकायत है मुझे उस समाज से,
अन्धें कुंए में डूब,
प्यास बुझाने के रस्म-ओ-रिवाज़ से।
वंश बढ़ाने को वो तत्पर,
हर बार हैं,
पर एक नन्ही परी के आगमन को,
मानते वो एक अभिशाप हैं।

वासना की हवस में,
करते हैं वो, जो दुष्कर्म,
तुम्हीं कहो,क्या नहीं वो
सबसे घिनौना पाप है।
पर मानो या ना मानो,
अंधविश्वासों की इस दुनिया में,
सब कुछ माफ़ है।

एक अंधी बस्ती है,
अँधेरे में भटकता,
एक अधमरा समाज है।
दिनों दिन बढ़ता रहता,
ऐसा ये अन्धविश्वास है।

अँधेरे को चीरती रौशनी की,
मुझे एक आस है।
अंधविश्वासों को तोड़,
ज्ञान की एक प्यास है,
होंगें कामयाब हम,अब एक दिन
दिल को मेरे ये विश्वास है।
– राजेश रौशन

प्रस्तुतकर्ता –सिकन्दर कुमार मेहता
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धर्म – एक मीठा जहर

~धर्म में ठहराव है और आगे बढ़ना जिंदगी है~

धर्म की तुलना हम ठहरे हुए पानी से कर सकते है। सभी धर्मो में ईश्वर अल्लाह भगवान इत्यादि की कल्पना के आगे कुछ नहीं है, धर्म यहीं पर आकर ठहर चूका है। इनमे ऊपरी या अंदरुनी तौर पर कुछ नया होने की कोई संभावनाएं नहीं है। धर्म सतह से उतना ही निर्मल स्वच्छ दीखता है जिस तरह ठहरे हुए पानी की सतह साफ़ और निर्मल दीखती है, पर जैसे ही आप उस पानी में प्रवेश करते है आपको पानी के नीचे के दलदल का आभास हो जाता है।

अब इस दलदल में उतरनेे के बाद लोग बाहर निकलने की कोशिश करना छोड़ देते है क्योंकि उस स्थिति में आपके डूबने का खतरा अधिक होता है।

बच सकते है अगर “कोई आपको किनारे से हाथ देकर बाहर निकाल लेता है।”
“दूसरी परिस्थिति में अगर इस दलदल में आप साथी ढूंढ लेते है तो दोनों एक दूसरे की मदद से बाहर निकल सकते है।”

फिर भी यदि आप निकलने की उम्मीद ही छोड़ देते है तो आपका भविष्य अंत में उस दलदल में समा जाना है।

विचार करे देश में जितने भी दंगे हुए उसका कारण अगर धर्म नहीं तो क्या है? और धर्म ही अगर कारण है तो इस कारण को जीवित कौन रखने में आपका कितना सहयोग है। दंगो में या आतंकवाद में आज तक आप सुरीक्षित रहे अच्छी बात है पर जो लोग मारे गए वो किसी दूसरे देश या आसमान से आये लोग नहीं थे। वो भी आप और हम लोगो की तरह आम लोग ही थे।

दंगों और आतंकवाद को चलाने के लिए हथियारों की जरूरत होती है। तो इन हथियारों के लिए पैसा कहाँ से आता है और धर्म के नाम पर इकठ्ठा किया पैसा कहाँ जाता है? कहीं हम खुद ही तो अपनी कब्र नहीं खोद रहे। ये सवाल हर उस व्यक्ति के लिए है जो बिना सोचे बिना परिणाम की परवाह किये धर्म के पीछे दौड़ रहा है। (कोई भी धर्म चंदे का हिसाब सार्वजानिक नहीं करता।)

अब कृपा करके दौड़ना बंद कीजिये। रुकिए और कुछ पल के लिए सोचिये। धर्म किसी के घर का चूल्हा नहीं जलवा पाता मगर एक दिन ये धर्म लोगो घर जरूर जलवा देता है। तब जिस किसी भी देवी देवता भगवान अल्लाह ईश्वर या किसी को भी आप पूजते या मानते है वो भी बचाने नहीं आता। क्योंकि अब तक कोई भगवान अल्लाह किसी को बचाने नहीं आया (गुजरात UP जैसे दंगो की त्रासदियां हो या फिर केदारनाथ, नेपाल, तमिलनाडु और मक्का जैसी प्राकृतिक आपदाएं)। अगर भगवान अल्लाह बचाने ही आते तो देश की सेना को हर आपदा में तैनात नहीं करना पड़ता।

हम फिर भी नफरतो में उलझे है, हिन्दू ने मदद की या मुसलमान ने। अरे भाई, हिन्दू मुसलमान दोनों मरे, न अल्लाह ने मदद की न भगवान ने। ये नफरत धर्म की फैलाई हुई है, बस। समझाना मुश्किल नहीं, असुरक्षा के भ्रम में असुरक्षा हम लोगो की ही पैदा की हुई है। जिस हिन्दू या मुसलमान ने कभी किसी दूसरे मुसलमान या हिन्दू का कुछ बुरा नहीं किया वो आपस में एक दूसरे से नफरत क्यों पाल रहे है।

ब्लड डोनेट (रक्तदान) करने वाले हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई सभी लोग इंसान ही होते है। क्योंकि इंसानो में गायो या किसी जानवर का खून नहीं चढ़ाया जाता। स्वीकार करे, हम शुरू में और अंत में सिर्फ इंसान ही होते है।
कपिल कान्त~
शेयर करे, एक समझदार शिक्षित और बेहतर देश के निर्माण के लिए।
Note-
I would not mind if anyone translate this article in regional language and publish with his her own name. But, this article is not for sale purpose and not for any commercial use.
ध्यान दे-
आप इस लेख को अपनी क्षेत्रीय भाषा में अनुवाद करके आपके नाम से शेयर करे इस पर मेरी कोई आपत्ति नहीं है। पर इसका कोई भी व्यापारिक उपयोग प्रतिबंधित किया जाता है।

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Brad Pitt Turned Atheist Because of ‘Christian Guilt’ from Strict Upbringing

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Brad Pitt became an atheist because he developed”Christian guilt” from his upbringing, the actor revealed in a recent interview.
Speaking to the Telegraph on Saturday, Brad Pitt expressed his views on religion and recalled how he was raised asa Southern Baptist by his father. However, he grew up as an atheist because of the”Christian guilt” instilled in him, according to Breitbart.
The Hollywood actor said he chose not to stick to any religion later on in life due tothe Christian guilt that alwaysdictated what he should and should not do. In 2007, Pitt told Parade in an interview how he would feel the same emotion when he was touched by the Holy Spirit during Christian revivals and when he went to rock concerts.
“I’d go to Christian revivals and be moved by the Holy Spirit, and I’d go to rock concerts and feel the same fervor,” Breitart quotes Pitt’s statement to Parade. “Then I’d be told, ‘That’s the Devil’s music! Don’t partake in that!’ I wanted to experience things religion said not to experience.
“However, the 51-year-old actor maintained that his father taught him the value of working hard. His father, Bill Pitt, who managed a trucking business in Springfield, Missouri, always reminded him to preserve his integrity and develop his ability to do things for himself. His mother used to work as a family counselor, the International Business Times reports.
It is worth noting that Pitt’s wife, Angelina Jolie, believes that a higher being exists. She says World War II hero Louis Zamperini influenced her spiritual beliefs. The late war hero is the inspiration behind her movie”Unbroken,” the report details.
Despite their difference in religious belief, Brad Pitt thinks they are doing great inthe parenting department. He says his wife and six kids have made him a better person and helped him excel in his career even more.

Brought to you By – Sikandar Kumar Mehta
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