न हिन्दू घटे, न मुस्लिम बढ़े, नास्तिकों की जनसंख्या जरुर बढ़ी

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धार्मिक आधार पर जनगणना के आंकड़े आने के बाद राजनीतिक पार्टियों से लेकर तमाम मीडिया हाउसेस में बहस छिड़ी है कि हिन्दुओं की जनसंख्या घटी है या मुस्लिमों की बढ़ी है. इस बहस में एक आंकड़ों को नजरंदाज किया जा रहा है वह है किसी भी धर्म को न मानने वालों की जनसँख्या.
2001 की जनगणना में यह संख्या उपलब्ध नहीं थी लेकिन 2011 में मिले आंकड़ों के मुताबिक भारत में ऐसे लोगों की आबादी बढ़ी है.
2012 के विन-गेलाप ग्लोबल इंडेक्स ऑफ़ रिलिजन 81% भारतीय धार्मिक हैं जबकि 13 % आबादी ऐसी है जो किसी भी धर्म को नहीं मानती, उनमे से भी तीन प्रतिशत अपने आपको नास्तिक मानते हैं.
आपको बता दें कि भारत में किसी भी धर्म को न मानना मौलिक अधिकार में शामिल है.
अगर हम उत्तर प्रदेश की बात करें तो 2011 में ऐसे लोगों की जनसंख्या जिन्होंने किसी भी धर्म को न मानने की बात कही काफी ज्यादा है. इनमे वे लोग भी शामिल है जो नास्तिक हैं. अकेले उत्तर प्रदेश में ऐसे लोगों की संख्या 5, 82, 622 है. अकेले लखनऊ में इनकी संख आठ हजार से ज्यादा है.

वजह क्या है ?

जहां भारत में 79.8 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो हिन्दू धर्म को मानते हैं और 14.2 परसेंट इस्लाम और बाकी के 7.37 प्रतिशत अन्य धर्मों को. ऐसे में इतनी बड़ी संख्या में लोगों का किसी भी धर्म पर विश्वास न करना चौकाने वाला है.
अगर  शिक्षाविदों की माने तो इसके पीछे वजह शिक्षा और सामाजिकस्तर में बदलाव है. उनका मानना हैकि यह वे लोग है जो शिखित, जागरूक आयर सम्पान है. ये अपने आपको किसी धर्म विशेष से नहीं जोड़ना चाहते. इस विरादरी में किसी भी धर्म का इंसान हो सकता है. चाहे हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी या अन्य.

प्रस्तुतकर्ता-सिकन्दर कुमार मेहता
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