अंधविश्वास का बढ़ता कारोबार

डायन कुप्रथा के खिलाफ कानून है लेकिन उसका कोई खास असर नहीं हो रहा है।
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हालत यह है कि चाहे सफर हो, बाजार हो हर तरफ इस तरह के विज्ञापन और साइट नजर आ रहे हैं जो एक क्लिक के साथ जीवन को खुशियों से भरने का दावा कर रहे हैं।

हमें बचपन से किताबों में यही पढ़ाया जाता रहा है कि सच बोलो, झूठपाप के समान है। मगर इसी झूठ से अंधविश्वास की दुकानों में खूब नफा कमाया जा रहा है, वह भी उसी धर्म-मजहब के नाम पर जिसमें सच बोलने की सीख दी जाती है। जो लोग मजहब के रहनुमा बनने की बात करते हैं, उन्हीं की नाक के नीचे अंधविश्वास का यह कारोबार फल-फूल रहा है। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्हें इसकी खबर नहीं,मगर यह सवाल जरूर उठताहै कि अंधविश्वास फैलाने वाले ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं का विरोध पुरजोर तरीके से क्यों नहीं किया जाता, ऐसे लोगों के खिलाफ कोई मुहिम या फतवा जारी क्यों नहीं होता।

21वीं सदी में विज्ञान इंसान को चांद पर बसाने की कोशिश कर रहा है। कोई ठीक नहीं कि कुछ समय में चांद पर पहुंचाने के दावे ढोंगी तांत्रिक बाबाओं की ओर से किए जाने लगें, क्योंकि विज्ञान से ज्यादा आज लोग अंधविश्वास और जादू-टोने में अपनी मुसीबतों का इलाज तलाश रहे हैं।

इसकी वजह है कि लोगों में पैसा कमाने की जल्दी और जल्द से जल्द दिक्कतों को दूर कराने की होड़। इसका हलवे अपने प्रयासों में कम, इन ढोंगियों के पास ज्यादा ढुंढने लगे हैं। यही वजह है कि अभी तक कुछ आसूमल, निर्मल बाबाओं की एक खेप लोगों को झूठे ख्वाब दिखा कर उल्लू बना रही थी। अब बाबाजी, मौलानाजी जैसे फर्जी दावे वाले लोग भी अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के बाजार में पूरी तरह उतर आए हैं। इनके हौसले भी इतने बुलंद हैं कि अभी तक इनकी पहुंच मुहल्लों, कस्बों तक थी पर अब इनका मायाजालशहरों की चकाचौंध तक जा पहुंचा है।

इसकी एक वजह यह भी है कि इन ढोंगियों को मीडिया का सहयोग हासिल है। जैसे सरकारें सिगरेट, तंबाकू, शराब से बचने की ताकीद विज्ञापनों के जरिए करती हैं और वही इनको बेचने का लाइसेंस भी वही मुहैया कराती हैं। ऐसे ही मीडिया भी एक तरफ अंधविश्वास की खबरों को दिखाकर उसका विरोध करता हैं और दूसरी तरफ अखबारों और चैनलों में तांत्रिकों, बाबाओं के विज्ञापन भी छापता और दिखाता है। मीडिया झूठे दावों को प्रचार-प्रसार भी करता है, क्योंकि सरकार को भी मीडिया से कर के रूप में आमदनी होती है। शायद सरकार भी इसीलिए चुप रहती है।
यही वजह है कि इन अंधविश्वास फैलाने वालों के हौसले बुलंद हैं और इनका जाल अब अशिक्षित, गरीब लोगों के दायरे से बढ़कर शिक्षित युवाओं और विदेशों तक फैल चुका है। इनकी साइटें हैं, ब्लॉग हैं और जिन पर गरीबी, बीमारी को दूर करने से लेकर हर समस्या के समाधान की बात लिखी हुई है। साथ ही एक बड़ी फेहरिस्त उन दावों की है जिससे प्रभावित होकर लोग इनके जाल में फंसते हैं। अभी तक इनके दावे घरेलू कलह, बेटा पैदा कराने, मनचाहा प्यार पाने और दुश्मन के नाशतक सीमित थे, अब जमीन से जुड़े विवादों का निपटारा कराने, दुश्मन से बदला लेने और विदेशों में नौकरी दिलाने जैसी बातें भी लोगों को फंसाने का जरिया बन रही हैं। दुनिया में किसी के पास कोई भी दुख-समस्याओं उनके पास हर परेशानी का इलाज तैयार रखा होता है। आश्चर्य यह है कि इस तंत्र-मंत्र के चक्कर में सिर्फ गरीब या अशिक्षित लोग ही नहीं पड़ रहे हैं, बल्कि पढ़े-लिखे और संपन्न तबके के लोग भी बहुत बार ऐसे ही लोगों की शरण में जाकर अपनी परेशानियों का हल तलाशते हैं और ठगी के शिकार होते हैं। ऐसे लोगों से ठगी के शिकार लोग कई बार शिकायत करना भी चाहते हैं तो उनकी समझ में नहीं आता कि कहां जाएं और कैसे करें?

कई बार तो लोग इन अंधविश्वासों के चक्कर में पड़कर कभी अपने तो कभी दूसरे के बच्चों की बलि तक दे देते हैं। ऐसी खबरें अखबारों में अक्सर हमें देख्रने को मिलती हैं।कायदे से तो मीडिया कोतंत्र-मंत्र और जादू-टोने के जरिए फैलाए जा रहे अंधविश्वास को मिटाने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन वह इन्हें बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में खुद जिम्मेदारी लोगों पर है, उन्हें समझना चाहिए कि जो लोग अपनी जिंदगी को बेहतर नहीं बना सके, उनमें दूसरों की दिक्कतों को दूर करने की सलाहियत कहां से समा गई।

अठारहवीं, उन्नीसवीं शताब्दी में समाज में ऐसे आंदोलन चले थे, जिसमें अंधविश्वास, आडंबर का जमकर विरोध किया गया। सर सैयद अहमद खां ऐसी ही एक शख्सियत थे जिन्होंने मदरसों में दी जाने वाली अरबी-फारसी तालीम का विरोध इसलिए किया ताकि लोग दायरों से बाहर निकलें और नई तालीम हासिल करते हुए जमाने की जरूरतों को समझें। हालांकि अपने इन विचारों के लिए उन्हें मुसलिम समाज के विरोध का सामना करना पड़ा। मगर धीरे-धीरे बदलाव की बयार चली और लोगों ने तालीम लेनी शुरू की। इसके बावजूद अगर कुछ नहीं बदला तो वह अंधविश्वास है।

आज के तकनीकी युग में भी यह लोगों के जहन में जगह बनाए हुए है। अखबारों में विज्ञापन देकर अंधविश्वास फैलाया जाता है। अंधविश्वास बना रहेगा तो ढोंगियों की जेब भी भारी रहेगी। इसलिए इंटरनेट पर बाबाओं की साइट, न्यूज पोर्टल लोगों तक पहुंच बनाने के लिए तैयार हैं। इनमें संपर्क की सुविधा के लिए इ-मेल दर्ज है ताकि लोग घर बैठे अपनी दिक्कतों के समाधान के लिए संपर्क कर सकें।इतना ही नहीं लोग अंधविश्वास के जाल से निकल न पाएं, इसके लिए घर पर ही फोन कॉल के जरिए सहूलियत देने के दावे भी जारी हैं। इनके पास सुविधा तंत्र-मंत्र की भी है तो जादू-टोने, तावीज, वशीकरण, सिफली जैसे जादू की भी। इसके लिए लोगों को इनके पास जाने की जरूरत भी नहींहै। लोग घर बैठे अपनी समस्याएं बताकर उनका हल पा सकते हैं जैसा कि इनका दावा है। जमीन के विवाद हों या किसी को सजा देनी हो, बिना अदालत, कानून के इन ढोंगियों के पास हर समस्या का समाधान है। इसके लिए लोग बिना अपना वक्त जाया किए अपने ‘दुश्मनों’ की जानकारी, फोटो इंटरनेट के जरिए इन बाबाओं को भेज देते हैं और फिर शुरू होता है अंधविश्वास का घिनौना खेल। लोगों का विश्वास इन ढोंगियों से न डगमगाए, इसके लिए ये लोगों से पहली बार में रुपयों की मांग नहीं करते। पहले उन्हें उनकी दिक्कतों के हल करने का ख्वाब दिखाते हैं और जब आदमी अंधविश्वास में धीरे-धीरे धंसने लगता है तब एक बड़ी रकम की मांग रख देते हैं जो इनके खाते में डाल दी जाती है। अंधविश्वास का यह कारोबार बिना कोई लागत लगाए दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है।

यही वजह है कि लोगों को फंसाने के इनके मंसूबे भी मजबूत होते जा रहे हैं। टीवी पर शॉपिंग साइट पर अब अल्लाह लॉकेट बेचा जा रहा है, लोगों की समस्याएं हल करने और बरकत होने के नाम पर। वहीं ट्रेनों, बसों में पैंफलेट चस्पा करके चमत्कार करने की बातें परोसी जा रही हैं। कमाल बाबा और दाढ़ी-टोपीधारी कितने ही फर्जी मजहबी रहनुमा बने लोग इंटरनेट से लेकर दुकानों, बाजारों, शहरों में छा गए हैं।ऐसे में सवाल उन मजहबी मरकजों पर भी है, जहां से किसी समस्या के जवाब में फतवे तो जारी होते हैं लेकिन इस अंधविश्वास के खिलाफ बुलंद आवाज अब तक नहीं सुनाई दी। क्या वजह है कि इनकी नाक के नीचे इस तरह के लोग न सिर्फ फल-फूल रहे हैं बल्कि इस्लाम के नाम पर लोगों को गुमराह करते आ रहे हैं। मगर इन पर कोई बंदिश अभी तक लागू नहीं। बल्कि धड़ल्ले से और खुलेआम यह खेल जारी है। हालत यह है कि अंधविश्वासी लोगों की भीड़ इन बाबाओं के दरों के चक्कर लगा रही है। बड़ी संख्या में लोग अपनी सारी परेशानियों का हल इन्हीं के पास जाकर ढ़ूंढ़ने लगे हैं। इससे साफ है कि लोग मजहब से कट कर अंधविश्वास में हल ढ़ूंढ़ने लगे हैं।

हाल का महाराष्ट्र का हसनैन वरेकर कांड जिसमें परिवार के चौदह लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। यह निराशा में उपजे तनाव का नतीजा था जिसे बढ़ाने का काम इसी अंधविश्वास ने किया। यह अकेला मामला नहीं है, ऐसे बहुत-से उदाहरण हैं जब लोगों ने इन्हीं ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं के बहकावे में आकर अपने परिवार बर्बाद कर लिए।जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, भूत, जिन्न आदि का इस वैज्ञानिक और तार्किक युग में मौजूद रहना समाज के लिए खतरे की घंटी है। इनको सच बताकर अपनी तिजारत चमकाने वालों की तादाद दिनों दिन बढ़ती जा रही है। फिर चाहे विज्ञान को ईश्वर की तरह पेश करने वाले यूरोपीय देश अमेरिका, ब्रिटेन आदि हों या जादू, तंत्र-मंत्र को कुफ्र की संज्ञा देने वाले अरब देश और या फिर अपना ही मुल्क। हर जगह टोटकों,चमत्कारों और मनचाही मुराद पूरी करने वालों की लंबी जमात नजर आती है।
उनका दावा यहीं तक नहीं रुकता, बल्कि कैंसर जैसी बीमारियों को ठीक करने से लेकर मनचाही शादी, प्रेम, व्यापार में तरक्की, किसी को आकर्षित करना, दुश्मन का नाश, वशीकरण जैसे तमाम इरादों को बल देता है। मजहब के नाम पर जादू-टोना तंत्र-मंत्र को करने वाले मौलाना, आलिम अपने इन्हीं दावों की बुनियाद पर अपना नेटवर्क न सिर्फ-देश के हर राज्य, शहरों-गांवों में चला रहे हैं, बल्कि आनलाइन सेवा देने की बात कहकर विदेशों में भी अपने शिकार फंसाने में लगे हैं।

इक्कीसवीं सदी में अंधविश्वास वैज्ञानिक सोच वालों के लिए चुनौती है। अंधविश्वास के दूसरे दर्जे भी हैं, जिनमें इसमें भूत है, चुड़ैल है और जिन्न आदि हैं। लोग मानते हैं कि यही सब जब किसी इंसान की जिस्म में जगह बनाकर रहने लग जाते हैं तो इसे असर होना, भूत, चुड़ैल आना कहते हैं। दुनिया की कोई सभ्यता,धर्म-मजहब इस बुराई से बची नहीं है। मुसलिमों में जिन्न का साया या बुरी आत्मा के असरात हों या हिंदुओं में चुड़ैल का साया, या फिर ईसाइयों में घोस्ट की डरावनी छाया। हर तबके में यह अजाना डर था।

दूसरी ओर, नास्तिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले लोगों का मानना है कि यह सब मजह दिमागी फितूर है, जिसकी आड़ में कुछ ढोंगी बाबाओं, ओझाओं और दरगाहों पर रहने वाले लोगों की रोजी चल रही है। इस्लाम के विद्वान इसे कुफ्र या नाजायज करार देकर इसकी निंदा करते हैं। इस्लाम में किसी भी तरह के तावीज पहनने, बांधने की सख्त मनाही है। इसके बावजूद कुछ लोग अंधविश्वास की दुकानों के जरिए काला जादू, सिफली इल्म, वशीकरण जादू, तंत्र विद्या आदि के फेर मेंपड़ जाते हैं।सरकारें चुप हैं और मीडिया ऐसे ढोंगियों के प्रसार का सहयोगी। इसी अनदेखी का ही नतीजा है कि अंधविश्वास फैलाने वालों का बड़ा नेटवर्क इंटरनेट पर छाया हुआ है। लोग डॉक्टर से ज्यादा ऐसे ढोंगी तांत्रिकों पर यकीन करने लगे हैं। इन बहुरूपियों की शिकार ज्यादातर महिलाएं हो रही है और महिलाओं के जरिए पुरुष भी इनके शिकार बन रहे हैं। विड़ंबना तो यह है कि जिस जादू-टोने को विज्ञान मानने से इनकार करता रहा है आज उसी जन्मी तकनीक के सहारे तंत्र-मंत्र का जाल बिछा हुआ है। लोगों की महत्वकांक्षाएं बढ़ी हैं तो फर्जी लोगों काजाल भी बढ़ रहा है। चूंकि हर हाथ में फोन है और इंटरनेट पहुंच बढ़ रही है तो अंधविश्वास का कारोबार भी इसी के जरिए आपके पास तक पहुंच रहा है।हालत यह है कि चाहे सफर हो, बाजार हो हर तरफ इस तरह के विज्ञापन और साइट नजर आ रहे हैं जो एक क्लिक के साथ जीवन को खुशियों से भरने का दावा कर रहे हैं। किसी पर बेगम आफरीदा के नाम से तो किसी पर बाबाजी, मौलानाजी के नाम से इस्लामिक तंत्र-मंत्र परोस कर लोगों को आमंत्रित किया जाता है, वह भी इस दावे के साथ कि इस्लाम के दायरे में रहकर यह सब किया जाता है।

अब सवाल यह है कि जब इस्लाम में इसकी मनाही है तो किस तरह उसी का इस्तेमाल करके यह कारोबार किया जा रहा है। अब समय आ गया है कि इस्लाम के रहनुमा होने का दम भरने वाले लोग अपने समुदाय की उस गंदगी को दूर करें जो बरसों से अपनी जड़ें जमाती रही है । अपराध ढोती प्रथा अंधविश्वास की भयावह परिणति हत्याओं में होती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुछ सालों पहले एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें भारत में 1987 से 2003 तक 2 हजार 556 महिलाओं को डायन या चुड़ैल कह कर मार देने की बात कही गई थी। इस तरह हत्या करने के मामले झारखंड में सबसे आगे है। दूसरे पर ओड़िशा और तीसरे नंबर पर तमिलनाडु है। एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2011में 240, 2012 में 119, 2013 में 160 हत्याएं अंधविश्वास के नाम पर की गर्इं। अकेले झारखंड में 2001 से 2015 तक चार सौ महिलाओं की हत्या अंधविश्वास से प्रेरित होकर की गई।

डायन कुप्रथा के खिलाफ कानून है लेकिन उसका कोई खास असर नहीं हो रहा है। इसमें मारपीट, प्रताड़ना के साथ-साथ डायन घोषित कीगई महिला को मल-मूत्र पिलाना, निर्वस्त्र करके घुमाना से लेकर बुनियादी संसाधनों से वंचित करके छोड़ देने जैसे मामले सामने आए हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग समय-समय पर अंधविश्वास के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए गोष्ठियां,कार्यशालाएं आयोजित करता रहता है। मगर जो अंधविश्वास हत्याओं तक पहुंच गया हो उसे इस तरह के छोटे-मोटे कार्यक्रमों तक सीमित रखना कहां तक सही है।मामूली तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक से शुरू होने वाला अंधविश्वास लोगों के उत्पीड़न, हत्याओं का कारण बनता जा रहा है। इसकी शुरुआत ढोंगी ओझाओं और तांत्रिकों की बदनीयती और गलत सलाह से शुरू होती है। कई जगह कुछ गलत परंपराएं भी आग में घी का काम करती हैं।

महाराष्ट्र के शोलापुर में बाबा उमर की दरगाह पर बच्चों को ऊंचाई से चादर में फेंकने की प्रथा है क्योंकि यह समझा जाता है कि इससे बच्चे स्वस्थ होते हैं। इससे कई बार बच्चे चुटहिल हो जाते हैं। लोगों का यही अंधविश्वास उन्हें इस मोड़ पर ले आता है, जहां कोई भी ढोंगी उनके भले का हवाला देकर बलि या हत्या के लिए उकसा देता है। पहले इसके पीछे इन लोगों की इच्छा लोगों से धन ऐंठने तक सीमित थी लेकिन आज किसी महिला के शारीरिक शोषण से लेकर उसके घर, जमीन पर कब्जा करने और बदले की भावना के तहत भी ऐसे अपराधों के लिए उकसाया जा रहा है।

सहयोग – नाज़ खान
प्रस्तुतकर्ता- सिकन्दर कुमार मेहता
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Bhagat Singh and Savarkar, Two Petitions that Tell Us the Difference Between Hind and Hindutva

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Eighty-five years ago, on March 23, 1931, Shaheed Bhagat Singh and his two comrades-in-arms, Shaheed Rajguru and Shaheed Sukhdev were hanged in Lahore by the British colonial government. At the time of his martyrdom, Bhagat Singh was barely 23 years old. Despite the fact that he had his whole life ahead of him, he refused to seek clemency from the British as some well-wishers and family members wanted him todo. In his last petition and testament, he demanded that the British be true to the charge they laid against him of waging war against the colonial stateand that he be executed by firing squad and not by hanging. The document also lays out his vision for an India whose working people are free from exploitation by either British or Indian “parasites”.

At a time when the Bharatiya Janata Party national executive has decided to make nationalism its rallying cry, it is useful to compare the patriotic attitude and vision of Bhagat Singh with that ofthe Sangh parivar’s icon, V.D. Savarkar, author and originator of the concept of ‘Hindutva’, which the BJP swears by.

Sent to the notorious Cellular Jail in the Andamans in 1911 for his revolutionary activity, Savarkar first petitioned the British for early release within months of beginning his 50 year sentence. Then again in 1913 and several times till he was finally transferred to a mainland prison in 1921 before his final release in 1924. The burden of his petitions: let me go and I will give up the fight for independence and be loyal to the colonial government.

Savarkar’s defenders insist his promises were a tactical ploy; but his critics say they were not,and that he stayed true to his promise after leaving the Andamans by staying away from the freedom struggle and actually helping the British with his divisive theory of ‘Hindutva’, which was another form of the Muslim League’s Two Nation theory.

Reproduced below are Shaheed Bhagat Singh’s last petition and the petition V.D. Savarkar filed in 1913.

Shaheed Bhagat Singh’s Last Petition
Lahore Jail, 1931

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To: The Punjab Governor

Sir, With due respect we beg to bring to your kind notice the following: That we were sentenced to death on 7th October 1930 by a British Court, L.C.C Tribunal, constituted under the Sp.

Lahore Conspiracy Case Ordinance, promulgated by the H.E. The Viceroy, the Head of the British Government of India, and that the main charge against us was that of having waged war against H.M. King George, the King of England.

The above-mentioned finding of the Court pre-supposed two things:

Firstly, that there exists a state of war between the British Nation and the Indian Nation and, secondly, that we had actually participated in that war and were therefore war prisoners.

The second pre-supposition seems to be a little bit flattering, but nevertheless it is too tempting to resist the desire of acquiescing in it.

As regards the first, weare constrained to go into some detail. Apparently there seems to be no such war as the phrase indicates.

Nevertheless, please allow us to accept the validity of the pre-supposition taking it at its face value. But in order to be correctly understood we must explain it further.

Let us declare that the state of war does exist and shall exist so long as the Indian toiling masses and the natural resources are being exploited by a handful of parasites.

They may be purely British capitalist or mixed British and Indian or even purely Indian. They may be carrying on their insidious exploitation through mixed or evenon purely Indian bureaucratic apparatus. All these things make no difference.

No matter, if your government tries and succeeds in winning over the leaders of theupper strata of the Indian society through petty concessions and compromises and thereby cause a temporary demoralisation in the main body of the forces.No matter, if once again the vanguard of the Indian movement, the Revolutionary Party, finds itself deserted in the thick of the war.

No matter if the leaders to whom personally we are much indebted for the sympathy and feelings they expressed for us, but nevertheless we cannot overlook the fact that they did become so callous as to ignore and not to make a mention in the peace negotiation of even the homeless, friendless and penniless of female workers who are alleged to be belonging to the vanguard and whom the leaders consider to be enemies of their utopian non-violent cult which has already become a thing of the past; the heroines who had ungrudgingly sacrificed or offered for sacrifice their husbands, brothers, and all that were nearest and dearest to them, including themselves, whom your government has declared to be outlaws.

No matter, it your agents stoop so low as to fabricate baseless calumnies against their spotless characters to damage their and their party’s reputation.

The war shall continue.

It may assume different shapes at different times. It may become now open, now hidden, now purely agitational, now fierce life and death struggle.

The choice of the course, whether bloody or comparatively peaceful, which it should adopt rests with you. Choose which ever you like. But that war shall be incessantly waged without taking into consideration the petty (illegible) and the meaningless ethical ideologies.

It shall be waged ever with new vigour, greater audacity and unflinching determination till the Socialist Republic is established and the present social order is completely replaced bya new social order, based on social prosperity and thus every sort of exploitation is put an end to and the humanity is ushered into the era of genuineand permanent peace.

In the very near future the final battle shall be fought and final settlement arrived at.

The days of capitalist and imperialist exploitation are numbered. The war neither began with us nor is it going to end with our lives. It is the inevitable consequence of the historic events and the existing environments.

Our humble sacrifices shall be only a link in the chain that has very accurately been beautified by the unparalleled sacrifice of [Jatin] Das and most tragic but noblest sacrifice of Comrade Bhagawati Charan and the glorious death of our dear warrior [Chandrashekhar] Azad.

As to the question of our fates ,please allow us to say that when you have decided to put us to death, you will certainly do it.

You have got the power in your hands and the power is the greatest justification in this world.

We know that the maxim “Might is right” serves as your guiding motto. The whole of our trial was just a proof of that.

We wanted to point out that according to the verdict of your court we had waged war and were therefore war prisoners. And we claim to be treated as such, i.e., we claim to be shot dead instead of to be hanged.

It rests with you to prove that you really meant what your court has said.

We request and hope that you will very kindly order the military department tosend its detachment toperform our execution.

Yours,
BHAGAT SINGH

Translated by the Shaheed Bhagat Singh Research Committee (shahidbhagatsingh.org)

V.D. Savarkar’s Petition
Cellular Jail, Andamans, 1913

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To: The Home Member of the Government of India

I beg to submit the following points for your kind consideration:
(1) When I came here in 1911 June, I was along with the rest of the convicts of my party taken to the office of the Chief Commissioner. There I was classed as “D” meaning dangerous prisoner; the rest of the convicts were not classed as “D”. Then I had to pass full 6 months in solitary confinement. The other convicts had not. During that time I was put on the coir pounding though my hands were bleeding. Then I was put on the oil-mill – the hardest labour in the jail. Although my conduct during all the time was exceptionally good still at the end of these six months I was not sent out of the jail; though the other convicts who came with me were. From that time to this day I have tried to keep my behaviour as good as possible.
(2) When I petitioned for promotion I was told I was a special class prisoner and so could not be promoted. When any of us asked for better food or any special treatment we were told “You are only ordinary convicts and must eat what the rest do”. Thus Sir, Your Honour would see that only for special disadvantages we are classed as special prisoners.
(3) When the majority of the casemen were sent outside I requested for my release. But, although I had been cased (caned?) hardly twice or thrice and some of those who were released, for a dozen and more times, still I was not released with them because I was their casemen. But when after all, the order for my release was given and when just then some of the political prisoners outside were brought into the troubles I was locked in with them because I was their casemen.
(4) If I was in Indian jails I would have by this time earned much remission, could have sent more letters home, got visits. If I was a transportee pure and simple I would have by this time been released, from this jail and would have been looking forward for ticket-leave, etc. But as it is, I have neither the advantages of the Indian jail nor of this convict colony regulation; though had to undergo the disadvanatges of both.
(5) Therefore will your honour be pleased to put an end to this anomalous situation in which I have been placed, by either sending me to Indian jails or by treating me as a transportee just like any other prisoner. I am not asking for any preferential treatment, though I believe as a political prisoner even that could have been expected in any civilized administration in the Independent nations of the world; but only for the concessions and favour that are shown even to the most depraved of convicts and habitual criminals? This present plan of shutting me up in this jail permanently makes me quite hopeless of any possibility of sustaining life and hope. For those who are term convicts the thing is different, but Sir, I have 50 years staring me in the face ! How can I pull up moral energy enough to pass them in close confinement when even those concessions which the vilest of convicts can claim to smoothen their life are denied to me? Either please to send me to Indian jail for there I would earn (a) remission; (b) would have a visit from my people come every four months for those who had unfortunately been in jail know what a blessing it is to have a sight of one’s nearest and dearest every now and then! (c) and above all a moral – though not a legal – right of being entitled to release in 14 years; (d) also more letters and other little advantages.Or if I cannot be sent to India I should be released and sent outside with a hope, like any other convicts,to visits after 5 years, getting my ticket leave and calling over my family here. If this is granted then only one grievance remains and that is that I should be held responsible only for my own faults and not of others. It is a pity that I have to ask for this – it is such a fundamental right of every human being! For as there are on theone hand, some 20 political prisoners – young, active and restless, and on the other the regulations of a convict colony, by the very nature of them reducing the liberties of thought and expression to lowest minimum possible; it is but inevitable that every now and then some one of them will be found to have contravened a regulation or two and if all be held responsible for that, as now it is actually done – very little chance of being left outside remains for me.

In the end may I remind your honour tobe so good as to go through the petition for clemency, that I had sent in 1911, and to sanction it for being forwarded to the Indian Government?

The latest development of the Indian politics and the conciliating policy of the government have thrown open the constitutional line once more.

Now no man having the good of India and Humanity at heart will blindly step on the thorny paths which in the excited and hopeless situation of India in 1906-1907 beguiled us from the path of peace and progress.

Therefore if the government in their manifold beneficence and mercy release me,I for one can not but be the staunchest advocate of constitutional progress and loyalty to the English government which is the foremost condition of that progress.

As long as we are in jails there cannot be real happiness and joy in hundreds and thousands of homes of His Majesty’s loyal subjects in India, for blood is thicker than water; but if we be released the people will instinctively raise ashout of joy and gratitude to the government, who knows how to forgive and correct, more than how to chastise and avenge.

More over my conversion to the constitutional line would bring back all those misled young men in India and abroad who were once looking up to me as their guide. I am readyto serve the Government in any capacity they like, for as my conversion is conscientious so I hope my future conduct would be. By keeping me in jail nothing can be got in comparison to what would be otherwise.

The Mighty alone can afford to be merciful and therefore where else can the prodigal son return but to the parental doors of the Government?

Hoping your Honour will kindly take into notion these points.

V.D. SAVARKAR

(From R.C. Majumdar,Penal Settlements in the Andamans, Publications Division, 1975)

Author- The Wire Staff

Brought To You By – Sikandar Kumar Mehta
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10 Spooky Japanese Superstitions

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Like any other country, Japan has it’s own unique set of beliefs, superstitions and unusual habits. Some concern themselves with numerology, some relate to death, and some simply defy any logical link to anything whatsoever.
Below are some of the more common superstitions you may come across on your travels in Japan.

1. Hearse / Ambulance

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When a hearse (霊柩車 reikyusha) or an ambulance passes by, and you either see or hear it, in the latter case people tend to tuck in the thumbs into their fists. This action is believed to “protect” their parents, since the word for thumb, “oyayubi” (親指) literally means “parent-thumb”.

2. Cutting Your Nails At Night

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According to this superstition, cutting your nails at night will bring bad luck and you will not be able to be there when your parents pass away. Surely this belief started when electricity was a rare thing, and was meant to avoid cutting yourself due to poor lighting.

3. Whistle At Night And You Attract Burglars

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In old times, whistling was commonly used by burglars and criminals to communicate with each other. Now it is clear why you should not whistle or play a flute – you would invite all the bad into your house.

4. Chopsticks Stuck Vertically Into The Rice Bowl

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This is not only a really bad manner, it is believed to be extremely unlucky to do so. The reason is simple: this is only done during a funeral, when the food is “offered” to the deceased.

5. Breaking A Comb

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If you happen to break a comb, this is a sign of misfortune. Years ago, a comb was an expensive acquisition, so this belief is not that crazy: you would have to spend a lot of money to buy another one!

6. Do Not Step At A Tatami Border

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This also applies to a slide door’s border: it is believed to bring bad luck if stepping on a Japanese tatami mat’s border. If examined more detailed, you will see, that Japanese tatami mats have a silk border, where some families have their family emblem engraved on it. That is why it is considered rude and bad luck to step on them withyour feet!

7. Hide Your Bellybutton

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Where it seems that with this superstition worrying parents try to tame their wild teenage daughter, who is wearing crazy belly-tops, this has a different origin.
According to Japanese mythology, Raijin (雷神/らいじん), the god of thunder, lightning, and storms, would eat the bellybuttons (or entire abdomen) of children. Also, his companion god, Raijuu (雷獣/らいじゅう) is believed to sleep in bellybuttons, and waken up by Raijin by striking a lightning.

8. Never Sleep Facing North

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The body of deceased on a funeral are placed north. To avoid receiving bad luck or even ending up dead, people avoid sleeping in the north direction.

9. Do Not Write A Name With Red Ink

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It is very rude and believed to bring bad luck to write a name in red ink. That is due to the fact, that Japanese tomb stones are having the family members written in black and red ink.

10. Number 4

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“Ichi, ni, san, chi”, that is “one, two, three, four” in Japanese. The number four, “shi” (四) has another meaning as well:“shi” (死) means “death”.
Therefore, anything in relation to four is being avoided. Room Number 4, gifts are chosen either 3 or 5 pieces, and products, in general are usually not sold in sets of four.The more Japanese superstitions you know, the better you get used to the culture and mutual understanding can improve.

Additionally: you understand why people behave differently and can integrate more smoothly once you learn the beliefs, that have dominated Japanese culture for centuries.

Credit – Japan Info

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धर्म और आस्था के नाम पर वेश्यावृति

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आंध्र प्रदेश की लक्ष्मम्मा अधेड़ उम्र की हैं और उनके मां-बाप ने उन्हें मंदिर को देवदासी बनाने के लिए दान कर दिया। इसकी वजह लक्ष्मम्मा कुछ यू बयां करती हैं, ‘मेरे माता-पिता की तीनों संतानें लड़कियां थीं। दो लड़कियों की तो उन्होंने शादी कर दी लेकिन मुझे देवदासी बना दिया ताकि मैं उनके बुढ़ापे का सहारा बन सकूं।’ आज भी आंध्र प्रदेश में, विशेषकर तेलंगाना क्षेत्र में दलित महिलाओं को देवदासी बनाने या देवी देवताओं के नाम पर मंदिरों में छोड़े जाने की रस्म चल रही है। लक्ष्मम्मा मानती हैं कि उनका भी शारीरिक शोषण हुआ लेकिन वो अपना दर्द किसी के साथ बांटना नहीं चाहतीं। जिस शारीरिक शोषण के शिकार होने के सिर्फ जिक्र भर से रुह कांप जाती हैं, उस दिल दहला देने वाले शोषण का सामना ये देवदासियां हर दिन करती हैं। ये दर्द इकलौती लक्ष्मम्मा का नहीं है, आंध्र प्रदेश में लगभग 30 हज़ार देवदासियां हैं जो धर्म के नाम पर शारीरिक शोषण का शिकार होती हैं।

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देवदासी शब्द का प्रथम प्रयोग कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में मिलता है। मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी इस शब्द का उल्लेख मिलता है। फिर भी इस प्रथा की शुरुआत कब हुई, इसके बारे में सुनिश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। भारत में सबसे पहले देवदासी प्रथा के अंतर्गत धर्म के नाम पर औरतों के यौन शोषण को संस्थागत रूप दिया गया था। इतिहास और मानव विज्ञान के अध्येताओं के अनुसार देवदासी प्रथा संभवत: छठी सदी में शुरू हुई थी। ऐसा माना जाता है कि अधिकांश पुराण भी इसी काल में लिखे गए।देवदासी का मतलब है ‘सर्वेंट ऑफ गॉड’, यानी देव की दासी या पत्नी ।

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देवदासियां मंदिरों की देख-रेख, पूजा-पाठ के लिए सामग्री-संयोजन,मंदिरों में नृत्य आदि के अलावा प्रमुख पुजारी, सहायक पुजारियों,प्रभावशाली अधिकारियों, सामंतों एवं कुलीन अभ्यागतों के साथ संभोग करती थीं, पर उनका दर्जा वेश्याओं वाला नहीं था। इसका प्रचलन दक्षिण भारत में प्रधान रूप से था ।इस अश्लील तमाशे के पीछे लोगों का यह विश्वास था कि मंदिर में देवदासी के साथ प्रणय-क्रीड़ा करने से गांव पर कोई विपत्ति नहीं आती और सुख-शांति बनी रहती है।यह कुप्रथा भारत में आज भी महाराष्ट्र और कर्नाटक के कोल्हापुर, शोलापुर, सांगली, उस्मानाबाद, बेलगाम, बीजापुर, गुलबर्ग आदि में बेरोकटोक जारी है। कर्नाटक के बेलगाम जिले के सौदती स्थित येल्लमा देवी के मंदिर में हर वर्ष माघ पुर्णिमा जिसे ‘रण्डी पूर्णिमा’ भी कहते है,के दिन किशोरियों को देवदासियां बनाया जाता है। उस दिन लाखों की संख्या में भक्तजन पहुँच कर आदिवासी लड़कियों के शरीर के साथ सरेआम छेड़छाड़ करते हैं। शराब के नशे में धूत हो अपनी काम पिपासा बुझाते हैं।

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यहां बेटी बनती है अपनी मां की सौतन, सालों से जारी है परंपरा कालिदास के ‘मेघदूतम्’ में मंदिरों में नृत्य करने वाली आजीवन कुंआरी कन्याओं का वर्णन मिलता है, जो संभवत: देवदासियां ही रही होंगी। प्रख्यात लेखक दुबॉइस ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू मैनर्स, कस्टम्स एंड सेरेमनीज़’ में लिखा है कि प्रत्येक देवदासी को देवालय में नाचना-गाना पड़ता था। साथ ही, मंदिरों में आने वाले खास मेहमानों के साथ शयन करना पड़ता था। इसके बदले में उन्हें अनाज या धनराशि दी जाती थी। प्राय: देवदासियों की नियुक्ति मासिक अथवा वार्षिक वेतन पर की जाती थी। मध्ययुग में देवदासी प्रथा और भी परवान चढ़ी। सन् 1351 में भारत भ्रमण के लिए आए अरब के दो यात्रियों ने वेश्याओं को ही ‘देवदासी’ कहा। उन्होंने लिखा है कि संतान की मनोकामना रखने वाली औरत को यदि सुंदर पुत्री हुई तो वह ‘बोंड’ नाम से जानी जाने वाली मूर्ति को उसे समर्पित कर देती है। वह कन्या रजस्वला होने के बाद किसी सार्वजनिक स्थान पर निवास करने लगती है और वहां से गुजरने वाले राहगीरों से, चाहे वो किसी भी धर्म अथवा संप्रदाय के हों, मोल-भाव कर कीमत तय कर उनके साथ संभोग करती है। यह राशि वह मंदिर के पुजारी को सौंपती है।

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देवदासियों को अतीत की बात मान लेना गलत होगा। दक्षिण भारतीय मंदिरों में किसी न किसी रूप में आज भी उनका अस्तित्व है। स्वतंत्रता के बाद पैंतीस वर्ष की अवधि में ही लगभग डेढ़ लाख कन्याएं देवी-देवताओं को समर्पित की गईं। ऐसी बात नहीं है कि अब यह कुप्रथा पूरी तरह समाप्त हो गई है। अभी भी यह कई रूपों में जारी है। कर्नाटक सरकार ने 1982 में और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था, लेकिन मंदिरों में देवदासियों का गुजारा बहुत पहले से ही मुश्किल हो गया था। 1990 में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 45.9 फीसदी देवदासियां महानगरों में वेश्यावृत्ति में संलग्न मिलीं, बाकी ग्रामीण क्षेत्रों में खेतिहर मजदूरी और दिहाड़ी पर काम करती पाई गईं।

स्रोत –लाइव इंडिया हिन्दी

प्रस्तुतकर्ता-सिकन्दर कुमार मेहता

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Five Thousand Dead Gods

No god I know is still alive –
all five thousand and seven
appear to have died.

The great god Huitzilopochtli
led the Aztecs’ divine pack –
but He departed awhile back.

Zeus was fun, and had His run,
but while disguised as a swan,
they say, His neck got wrung.

Pluto – God of the Underworld,
offended the ladies of Hades,
and got buried in his own Hell.

Thor, I’m told, was big and bold,
but going out without a cloak,
they say, He died of the cold.

And ghosts of dead Indian gods
can’t even haunt a decent tepee,
and many die on late night T.V.

No prisoners tremble on the altar
when their beating hearts are torn
to join Tezcatlipoca in the sky.

And no children scream as they
are loaded onto the simple machine
that feeds them to Moloch’s fire.

And for ancient Greece’s Dionysus,
no drums sound, no flute plays –
but, oh, weren’t those the days !

The goddesses, too, we must include,
for all were dear to some, and
lived in our hearts until the time had come.

There was Athena , Gaia, and Kore,
Xochiquetzal, Minerva, and Astarte,
Ixtab, Kuan Yin, and Kali of course.

Five thousand gods and goddesses –
may be ten or a hundred fifty thousand
or more, there might have been.

But the goddesses and gods have allg
one, one by one, until there are none
but those that are still willed alive.

-Gods and goddesses kept alive
by people still believing – still
trusting – in their own creations.

Pinocchio becomes god of the wood,
while Pygmalion falls on his knees
before his goddess of stone, Galatea.

We remember the Loving Mother
and the Father the All-Mighty
looming large in an infant’s eyes.

For each girl-woman makes the God
she craves and needs – then kneels
before Him and says, “Oh, please!

“And each boy-man makes himself
a Goddess that he wishes,
giving a Mother’s hugs and kisses.

And older men and women tend
to make our gods with
wrinkled brow and constant pout.

Still we always make our gods
to look a lot like me and you –
one head, one mouth, two eyes.

But the god of song birds flies,
and the gods of all the fishes
must swim through ocean skies.

The god of cattle may be a bull,
or just maybe it’s a cow –
I can’t hope to settle that now.

But I am well informed by
one who ought to know:
the god of dogs is a bitch!

God laughs ? Not on your life !
The joke’s on us – but I’m told
She’s heard this joke before !

This poem is fromPrayer to a Dead God :125 Poems,“published in January of 2001 by North American International, and available from online book sellers.

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क्या मैं अंदर आ सकती हूं , भगवन् !

राम पुनियानी

यह अजीब संयोग है कि इन दिनों मुसलमान और हिन्दू समुदायों की महिलाओं को एक ही मुद्दे पर संघर्ष करना पड़ रहा है आराधनास्थलों में प्रवेश के मुद्दे पर।
जहां ‘भूमाता बिग्रेड‘ की महिलाएं, शनि शिगनापुर (अहमदनगर, महाराष्ट्र) मंदिर में प्रवेश का अधिकार पाने के लिए संर्घषरत हैं वहीं मुंबई में हाजी अली की दरगाह तक फिर से पहुंच पाने के लिए महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं।
सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मसला तो गरमाया हुआ है ही। अनुकरणनीय साहस प्रदर्शित करते हुए हाल में बड़ी संख्या में महिलाएं कई बसों में शनि शिगनापुर मंदिर पहुंची परंतु उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया।

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शनि शिगनापुर में पुरूषों को तो चबूतरे पर चढ़ने का अधिकार है परंतु महिलाओं के लिए इसकी मनाही है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि चबूतरे पर चढ़ने वाली महिलाओं को शनि महाराज की बुरी नजर लग जाएगी। इस तरह यह दावा किया जाता है कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के पीछे आध्यात्मिक कारण हैं। दक्षिणपंथी दैनिक ‘सनातन प्रभात’ ने लिखा कि हिन्दू परंपराओं की रक्षा के लिए महिलाओं के आंदोलन को रोका जाना चाहिए। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर’ ने मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को उचित ठहराया। भूमाता ब्रिग्रेड की तृप्ति देसाई के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक गुरू श्री  श्री रविशंकर ने महिलाओं के संगठनों और मंदिर के ट्रस्टियों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ की यह राय है कि वर्तमान में लागू किसी भी नियम को बदलने के पूर्व, संबंधित धर्मस्थलों की परंपरा और प्रतिष्ठा का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

सबरीमला के बारे में तर्क यह है कि मंदिर के अधिष्ठाता देवब्रम्हचारी हैं और प्रजनन योग्य आयु समूह की महिलाओं से उनका ध्यान बंटेगा। हम सबको याद है कि कुछ वर्षों पहले एक महिला आईएएस अधिकारी, जो अपनी आधिकारिक हैसियत से मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा के लिए इंतजामात का निरीक्षण करने पहुंची थी, को भी मंदिर में नहीं घुसने दिया गया था। मुंबई की हाजी अली दरगाह के मामले में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संगठन ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर यह मांग की है कि वहां महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को बहाल किया जाए।

दरगाह में महिलाओं का प्रवेश सन् 2012 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। महिला समूहों ने संविधान के विभिन्न प्रावधानों को उद्धत किया है जो लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करते हैं। दरगाह के ट्रस्टियों का यह कहना है कि यह प्रतिबंध महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से लगाया गया है। यह तर्क निहायत बेहूदा है। उसी तरह, सबरीमला के बारे में पहले यह तर्क दिया जाता था कि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है और महिलाओं के लिए उसे तय करना मुश्किल होगा। बाद में देवस्वम् बोर्ड त्रावणकोर ने यह स्पष्टीकरण दिया कि महिलाओं का प्रवेश इसलिए प्रतिबंधित है क्योंकि भगवान अय्यपा ब्रम्हचारी हैं।मंदिर के संचालकों का कहना था कि प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की उपस्थिति से ब्रहमचारी  भगवान का मन भटकेगा।

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मस्जिदों में प्रवेश के मामले में महिलाओं की स्थिति अलग-अलग देशों में अलग-अलग है। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया के देश सबसे खराब और तुर्की आदि सबसे बेहतर हैं। हिन्दू मंदिरों में भी एक से नियम नहीं हैं। आराधनास्थलों में महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित या सीमित करने के लिए कई बहाने किए जाते हैं। कई देशों में कानूनी तौर पर महिलाओं और पुरूषों को समान दर्जा प्राप्त है परंतु परंपरा के नाम पर इन आराधनास्थलों के संचालकगण महिलाओं को पूर्ण पहुंच देने से बचते आए हैं। आराधनास्थलों में पितृसत्तात्मकता का बोलबाला है।चर्चों के मामले में स्थिति कुछ अलग है। वहां महिलाओं के प्रवेश पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है परंतु महिलाओं को पादरियों के पदक्रम में उच्च स्थान नहीं दिया जाता। उसी तरह, हिन्दू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों में महिलाएं पंडित व मौलवी नहीं होतीं। अगर एकाध जगह ऐसा है भी तो वह अपवाद स्वरूप ही है।हमारा संविधान महिलाओं और पुरूषों की समानता की गारंटी देता है। परंतु हमारे कानून शायद आराधनास्थलों पर लागू नहीं होते, जिनके कर्ताधर्ता अक्सर दकियानूसी होते हैं।

सामान्यतः, भारत में आराधनास्थलों के संचालक मंडलों में महिलाओं को कोई जगह नहीं मिलती। हिन्दुओं के मामले में जाति एक अन्य कारक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यावहारिक तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों में भी जातियां हैं परंतु इन धर्मों के आराधनास्थलों के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। इसके विपरीत, बाबा साहेब आम्बेडकर को दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलवाने के लिए कालाराम मंदिर आंदोलन चलाना पड़ा था और अंततः वे इतने निराश हो गए कि उन्होंने हिन्दू धर्म ही त्याग दिया। उनका कहना था कि हिन्दू धर्म, ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र पर आधारित है व मूलतः पदानुक्रमित है। सच तो यह है कि अधिकांश धर्मों के सांगठनिक ढांचे में पदानुक्रम आम है ।

अगर हम संपूर्ण दक्षिण एशिया की बात करें तो मस्जिदों, दरगाहों और मंदिरों में महिलाओं के मामले में कई कठोर नियम हैं। इन्हें परंपरा के नाम पर थोपा जाता है। यद्यपि विभिन्न धर्मों में इस मामले में कुछ अंतर हैं परंतु जहां तक महिलाओं के साथ व्यवहार का प्रश्न है, सभी धर्म उनके साथ भेदभाव करते हैं। इस भेदभाव की गहनता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित राष्ट्र या क्षेत्र कितना धर्मनिरपेक्ष है। यहां धर्मनिरपेक्षता से अर्थ है जमींदारों और पुरोहित वर्ग के चंगुल से मुक्ति। यद्यपि यह सभी के बारे में सही नहीं है परंतु समाज का एक बड़ा वर्ग महिलाओं को पुरूषों से कमतर और पुरूषों की संपत्ति मानता है। इस दृष्टि से महिलाओं द्वारा आराधनास्थलों में प्रवेश का अधिकार हासिल करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन स्वागतयोग्य हैं।

लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यात्रा को हमेशा दकियानूसी तत्वों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। दकियानूसी तत्व, जाति और लिंग के सामंती पदक्रम को बनाए रखना चाहते हैं। चाहे वह बीसवीं सदी की शुरूआत का अमरीका का ईसाई कट्टरवाद हो या अफगानिस्तान, ईरान या पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरवाद या भारत में हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढ़ते कदम  –  ये सभी महिलाओं को पराधीन रखना चाहते हैं। हमें आशा है कि इन समस्याओं और रोड़ों के बावजूद, लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यह यात्रा तब तक जारी रहेगी जब  तक कि उन्हें पुरूषों के समकक्ष दर्जा और अधिकार हासिल न हो जाएं।

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)
प्रस्तुतकर्ता –सिकन्दर कुमार मेहता
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समलैंगिकता अपराध नहीं !

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समलैंगिकता को अपराध बताने से पहले निम्न बातों पर गौर करें….

1. इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है की आप समलैंगिक या विषमलैंगिक होने के बीच चुनाव कर सकते हैं। समलैंगिकता इस बारे में है की आप अंदर से कैसा महसूस करते हैं, जो जन्म से भी निर्धारित हो सकता है।

“मतलब साफ है कि यह कोई शौक नहीं है।”

2. समलैंगिकता मानव यौनिकता का एक प्राकृतिक हिस्सा है।
यह विचार गलत है कि गे एवं लेस्बियन लोगों के साथ कुछ गड़बड़ या गलत है और अगर कुछ गलत या गड़बड़ है भी तो इसमें उन लोगों का क्या दोष है ???

3. चिकित्सीय या मनोवैज्ञानिक नज़रिए से, समलैंगिक होना पूरी तरह सामान्य है।
समलैंगिकता प्रकृति का हिस्सा है, और केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि बहुत सारे जानवरों की प्रजातियों जिनमें कीट, मछलियाँ एवं स्तनधारी जीव शामिल हैं  जैसे कि- हाथियों, डाल्फि़न, भालुओं, भैसों में भी समलैंगिक रिश्ते होते हैं।

4. समलैंगिकता कोई बीमारी नहीं है अतः इसका इलाज नहीं हो सकता है। इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है की कोई भी चीज़ आपको समलैंगिक से विषमलैंगिक होने में बदल सकती है।
कोई लोग बस जन्म से ऐसे ही होते हैं।

5. कुछ समलैंगिक लोग धार्मिक कारणों या सामाजिक एवं सांस्कृतिक दबाव के कारण अपनी यौनिक भावनाओं का दमन करना या उन्हें छिपाना सीख लेते हैं।

6. कोई व्यक्ति गे या लेस्बियन हैं इसका अर्थ यह नहीं होता की वे अपने लिंग के हर व्यक्ति के साथ सेक्स करना चाहते हैं।

7. यदि आप गंभीर यौन उत्पीड़न को लेकर चिंतित हैं तो यह ध्यान में रखें की ज़्यादातर पुरुष जो पुरुषों का बलात्कार करते हैं, वे विषमलैंगिक ही होते हैं।

8. यदि आपको समलैंगिक सेक्स खराब या घिनौना लगता है तो यह सिर्फ इसलिए है क्योंकि आप अपने ही दृष्टिकोण से इसकी आलोचना कर रहे हैं।
कुछ उसी प्रकार से जैसे, आपका पसंदीदा खाना जो आपको बहुत स्वादिष्ट लगता हो, पर किसी दूसरे व्यक्ति के लिए घृणित हो सकता है।

9. यदि आप एक लड़का हो तो ज़रा सोच के देखो कि अगर आपसे ये कहा जाए कि लड़कियों की तरह कपड़े पहनो व उनकी तरह ही रहन सहन रखो अपना जबकि आपकी भावनाएं (फिलिंग्स) और आपका शरीर तो लड़कों वाला है तो उस स्थिति में आपको कैसा लगेगा ?

चलो मैं तुमसे कह रहा हूँ कि किसी लड़के से शादी कर लो और लड़के के साथ शारीरिक संबंध बनाओ ?
बोलो क्या करोगे ?

कैसा लगा जब ऐसा सुना ? और कितना गुस्सा आया ?

ठीक वैसा ही उन लोगों को भी लगता होगा।

10. यदि आप एक लड़की हो तो सोच के देखो कि अगर आपसे ये कहा जाए कि लड़कों की तरह कपड़े पहनो व उनकी तरह ही रहन सहन रखो अपना जबकि आपकी भावनाएं और आपका शरीर तो लड़कियों वाला है तो उस स्थिति में आपको कैसा लगेगा ???

चलो मैं तुमसे कह रहा हूँ कि किसी लड़की से शादी कर लो और लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाओ ??? बोलो क्या करोगी ???

कैसा लगा जब ऐसा सुना ????? और कितना गुस्सा आया ????

ठीक वैसा ही उन लोगों को भी लगता होगा जैसा आपको लगा।

प्रस्तुतकर्ता – सिकन्दर कुमार मेहता

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