अंधविश्वास का बढ़ता कारोबार

डायन कुप्रथा के खिलाफ कानून है लेकिन उसका कोई खास असर नहीं हो रहा है।
Follow Tweets by @1manatheist

image
हालत यह है कि चाहे सफर हो, बाजार हो हर तरफ इस तरह के विज्ञापन और साइट नजर आ रहे हैं जो एक क्लिक के साथ जीवन को खुशियों से भरने का दावा कर रहे हैं।

हमें बचपन से किताबों में यही पढ़ाया जाता रहा है कि सच बोलो, झूठपाप के समान है। मगर इसी झूठ से अंधविश्वास की दुकानों में खूब नफा कमाया जा रहा है, वह भी उसी धर्म-मजहब के नाम पर जिसमें सच बोलने की सीख दी जाती है। जो लोग मजहब के रहनुमा बनने की बात करते हैं, उन्हीं की नाक के नीचे अंधविश्वास का यह कारोबार फल-फूल रहा है। ऐसे में यह तो नहीं कहा जा सकता कि उन्हें इसकी खबर नहीं,मगर यह सवाल जरूर उठताहै कि अंधविश्वास फैलाने वाले ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं का विरोध पुरजोर तरीके से क्यों नहीं किया जाता, ऐसे लोगों के खिलाफ कोई मुहिम या फतवा जारी क्यों नहीं होता।

21वीं सदी में विज्ञान इंसान को चांद पर बसाने की कोशिश कर रहा है। कोई ठीक नहीं कि कुछ समय में चांद पर पहुंचाने के दावे ढोंगी तांत्रिक बाबाओं की ओर से किए जाने लगें, क्योंकि विज्ञान से ज्यादा आज लोग अंधविश्वास और जादू-टोने में अपनी मुसीबतों का इलाज तलाश रहे हैं।

इसकी वजह है कि लोगों में पैसा कमाने की जल्दी और जल्द से जल्द दिक्कतों को दूर कराने की होड़। इसका हलवे अपने प्रयासों में कम, इन ढोंगियों के पास ज्यादा ढुंढने लगे हैं। यही वजह है कि अभी तक कुछ आसूमल, निर्मल बाबाओं की एक खेप लोगों को झूठे ख्वाब दिखा कर उल्लू बना रही थी। अब बाबाजी, मौलानाजी जैसे फर्जी दावे वाले लोग भी अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के बाजार में पूरी तरह उतर आए हैं। इनके हौसले भी इतने बुलंद हैं कि अभी तक इनकी पहुंच मुहल्लों, कस्बों तक थी पर अब इनका मायाजालशहरों की चकाचौंध तक जा पहुंचा है।

इसकी एक वजह यह भी है कि इन ढोंगियों को मीडिया का सहयोग हासिल है। जैसे सरकारें सिगरेट, तंबाकू, शराब से बचने की ताकीद विज्ञापनों के जरिए करती हैं और वही इनको बेचने का लाइसेंस भी वही मुहैया कराती हैं। ऐसे ही मीडिया भी एक तरफ अंधविश्वास की खबरों को दिखाकर उसका विरोध करता हैं और दूसरी तरफ अखबारों और चैनलों में तांत्रिकों, बाबाओं के विज्ञापन भी छापता और दिखाता है। मीडिया झूठे दावों को प्रचार-प्रसार भी करता है, क्योंकि सरकार को भी मीडिया से कर के रूप में आमदनी होती है। शायद सरकार भी इसीलिए चुप रहती है।
यही वजह है कि इन अंधविश्वास फैलाने वालों के हौसले बुलंद हैं और इनका जाल अब अशिक्षित, गरीब लोगों के दायरे से बढ़कर शिक्षित युवाओं और विदेशों तक फैल चुका है। इनकी साइटें हैं, ब्लॉग हैं और जिन पर गरीबी, बीमारी को दूर करने से लेकर हर समस्या के समाधान की बात लिखी हुई है। साथ ही एक बड़ी फेहरिस्त उन दावों की है जिससे प्रभावित होकर लोग इनके जाल में फंसते हैं। अभी तक इनके दावे घरेलू कलह, बेटा पैदा कराने, मनचाहा प्यार पाने और दुश्मन के नाशतक सीमित थे, अब जमीन से जुड़े विवादों का निपटारा कराने, दुश्मन से बदला लेने और विदेशों में नौकरी दिलाने जैसी बातें भी लोगों को फंसाने का जरिया बन रही हैं। दुनिया में किसी के पास कोई भी दुख-समस्याओं उनके पास हर परेशानी का इलाज तैयार रखा होता है। आश्चर्य यह है कि इस तंत्र-मंत्र के चक्कर में सिर्फ गरीब या अशिक्षित लोग ही नहीं पड़ रहे हैं, बल्कि पढ़े-लिखे और संपन्न तबके के लोग भी बहुत बार ऐसे ही लोगों की शरण में जाकर अपनी परेशानियों का हल तलाशते हैं और ठगी के शिकार होते हैं। ऐसे लोगों से ठगी के शिकार लोग कई बार शिकायत करना भी चाहते हैं तो उनकी समझ में नहीं आता कि कहां जाएं और कैसे करें?

कई बार तो लोग इन अंधविश्वासों के चक्कर में पड़कर कभी अपने तो कभी दूसरे के बच्चों की बलि तक दे देते हैं। ऐसी खबरें अखबारों में अक्सर हमें देख्रने को मिलती हैं।कायदे से तो मीडिया कोतंत्र-मंत्र और जादू-टोने के जरिए फैलाए जा रहे अंधविश्वास को मिटाने की कोशिश करनी चाहिए थी, लेकिन वह इन्हें बढ़ावा दे रहा है। ऐसे में खुद जिम्मेदारी लोगों पर है, उन्हें समझना चाहिए कि जो लोग अपनी जिंदगी को बेहतर नहीं बना सके, उनमें दूसरों की दिक्कतों को दूर करने की सलाहियत कहां से समा गई।

अठारहवीं, उन्नीसवीं शताब्दी में समाज में ऐसे आंदोलन चले थे, जिसमें अंधविश्वास, आडंबर का जमकर विरोध किया गया। सर सैयद अहमद खां ऐसी ही एक शख्सियत थे जिन्होंने मदरसों में दी जाने वाली अरबी-फारसी तालीम का विरोध इसलिए किया ताकि लोग दायरों से बाहर निकलें और नई तालीम हासिल करते हुए जमाने की जरूरतों को समझें। हालांकि अपने इन विचारों के लिए उन्हें मुसलिम समाज के विरोध का सामना करना पड़ा। मगर धीरे-धीरे बदलाव की बयार चली और लोगों ने तालीम लेनी शुरू की। इसके बावजूद अगर कुछ नहीं बदला तो वह अंधविश्वास है।

आज के तकनीकी युग में भी यह लोगों के जहन में जगह बनाए हुए है। अखबारों में विज्ञापन देकर अंधविश्वास फैलाया जाता है। अंधविश्वास बना रहेगा तो ढोंगियों की जेब भी भारी रहेगी। इसलिए इंटरनेट पर बाबाओं की साइट, न्यूज पोर्टल लोगों तक पहुंच बनाने के लिए तैयार हैं। इनमें संपर्क की सुविधा के लिए इ-मेल दर्ज है ताकि लोग घर बैठे अपनी दिक्कतों के समाधान के लिए संपर्क कर सकें।इतना ही नहीं लोग अंधविश्वास के जाल से निकल न पाएं, इसके लिए घर पर ही फोन कॉल के जरिए सहूलियत देने के दावे भी जारी हैं। इनके पास सुविधा तंत्र-मंत्र की भी है तो जादू-टोने, तावीज, वशीकरण, सिफली जैसे जादू की भी। इसके लिए लोगों को इनके पास जाने की जरूरत भी नहींहै। लोग घर बैठे अपनी समस्याएं बताकर उनका हल पा सकते हैं जैसा कि इनका दावा है। जमीन के विवाद हों या किसी को सजा देनी हो, बिना अदालत, कानून के इन ढोंगियों के पास हर समस्या का समाधान है। इसके लिए लोग बिना अपना वक्त जाया किए अपने ‘दुश्मनों’ की जानकारी, फोटो इंटरनेट के जरिए इन बाबाओं को भेज देते हैं और फिर शुरू होता है अंधविश्वास का घिनौना खेल। लोगों का विश्वास इन ढोंगियों से न डगमगाए, इसके लिए ये लोगों से पहली बार में रुपयों की मांग नहीं करते। पहले उन्हें उनकी दिक्कतों के हल करने का ख्वाब दिखाते हैं और जब आदमी अंधविश्वास में धीरे-धीरे धंसने लगता है तब एक बड़ी रकम की मांग रख देते हैं जो इनके खाते में डाल दी जाती है। अंधविश्वास का यह कारोबार बिना कोई लागत लगाए दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है।

यही वजह है कि लोगों को फंसाने के इनके मंसूबे भी मजबूत होते जा रहे हैं। टीवी पर शॉपिंग साइट पर अब अल्लाह लॉकेट बेचा जा रहा है, लोगों की समस्याएं हल करने और बरकत होने के नाम पर। वहीं ट्रेनों, बसों में पैंफलेट चस्पा करके चमत्कार करने की बातें परोसी जा रही हैं। कमाल बाबा और दाढ़ी-टोपीधारी कितने ही फर्जी मजहबी रहनुमा बने लोग इंटरनेट से लेकर दुकानों, बाजारों, शहरों में छा गए हैं।ऐसे में सवाल उन मजहबी मरकजों पर भी है, जहां से किसी समस्या के जवाब में फतवे तो जारी होते हैं लेकिन इस अंधविश्वास के खिलाफ बुलंद आवाज अब तक नहीं सुनाई दी। क्या वजह है कि इनकी नाक के नीचे इस तरह के लोग न सिर्फ फल-फूल रहे हैं बल्कि इस्लाम के नाम पर लोगों को गुमराह करते आ रहे हैं। मगर इन पर कोई बंदिश अभी तक लागू नहीं। बल्कि धड़ल्ले से और खुलेआम यह खेल जारी है। हालत यह है कि अंधविश्वासी लोगों की भीड़ इन बाबाओं के दरों के चक्कर लगा रही है। बड़ी संख्या में लोग अपनी सारी परेशानियों का हल इन्हीं के पास जाकर ढ़ूंढ़ने लगे हैं। इससे साफ है कि लोग मजहब से कट कर अंधविश्वास में हल ढ़ूंढ़ने लगे हैं।

हाल का महाराष्ट्र का हसनैन वरेकर कांड जिसमें परिवार के चौदह लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। यह निराशा में उपजे तनाव का नतीजा था जिसे बढ़ाने का काम इसी अंधविश्वास ने किया। यह अकेला मामला नहीं है, ऐसे बहुत-से उदाहरण हैं जब लोगों ने इन्हीं ढोंगी मौलानाओं, बाबाओं के बहकावे में आकर अपने परिवार बर्बाद कर लिए।जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, भूत, जिन्न आदि का इस वैज्ञानिक और तार्किक युग में मौजूद रहना समाज के लिए खतरे की घंटी है। इनको सच बताकर अपनी तिजारत चमकाने वालों की तादाद दिनों दिन बढ़ती जा रही है। फिर चाहे विज्ञान को ईश्वर की तरह पेश करने वाले यूरोपीय देश अमेरिका, ब्रिटेन आदि हों या जादू, तंत्र-मंत्र को कुफ्र की संज्ञा देने वाले अरब देश और या फिर अपना ही मुल्क। हर जगह टोटकों,चमत्कारों और मनचाही मुराद पूरी करने वालों की लंबी जमात नजर आती है।
उनका दावा यहीं तक नहीं रुकता, बल्कि कैंसर जैसी बीमारियों को ठीक करने से लेकर मनचाही शादी, प्रेम, व्यापार में तरक्की, किसी को आकर्षित करना, दुश्मन का नाश, वशीकरण जैसे तमाम इरादों को बल देता है। मजहब के नाम पर जादू-टोना तंत्र-मंत्र को करने वाले मौलाना, आलिम अपने इन्हीं दावों की बुनियाद पर अपना नेटवर्क न सिर्फ-देश के हर राज्य, शहरों-गांवों में चला रहे हैं, बल्कि आनलाइन सेवा देने की बात कहकर विदेशों में भी अपने शिकार फंसाने में लगे हैं।

इक्कीसवीं सदी में अंधविश्वास वैज्ञानिक सोच वालों के लिए चुनौती है। अंधविश्वास के दूसरे दर्जे भी हैं, जिनमें इसमें भूत है, चुड़ैल है और जिन्न आदि हैं। लोग मानते हैं कि यही सब जब किसी इंसान की जिस्म में जगह बनाकर रहने लग जाते हैं तो इसे असर होना, भूत, चुड़ैल आना कहते हैं। दुनिया की कोई सभ्यता,धर्म-मजहब इस बुराई से बची नहीं है। मुसलिमों में जिन्न का साया या बुरी आत्मा के असरात हों या हिंदुओं में चुड़ैल का साया, या फिर ईसाइयों में घोस्ट की डरावनी छाया। हर तबके में यह अजाना डर था।

दूसरी ओर, नास्तिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले लोगों का मानना है कि यह सब मजह दिमागी फितूर है, जिसकी आड़ में कुछ ढोंगी बाबाओं, ओझाओं और दरगाहों पर रहने वाले लोगों की रोजी चल रही है। इस्लाम के विद्वान इसे कुफ्र या नाजायज करार देकर इसकी निंदा करते हैं। इस्लाम में किसी भी तरह के तावीज पहनने, बांधने की सख्त मनाही है। इसके बावजूद कुछ लोग अंधविश्वास की दुकानों के जरिए काला जादू, सिफली इल्म, वशीकरण जादू, तंत्र विद्या आदि के फेर मेंपड़ जाते हैं।सरकारें चुप हैं और मीडिया ऐसे ढोंगियों के प्रसार का सहयोगी। इसी अनदेखी का ही नतीजा है कि अंधविश्वास फैलाने वालों का बड़ा नेटवर्क इंटरनेट पर छाया हुआ है। लोग डॉक्टर से ज्यादा ऐसे ढोंगी तांत्रिकों पर यकीन करने लगे हैं। इन बहुरूपियों की शिकार ज्यादातर महिलाएं हो रही है और महिलाओं के जरिए पुरुष भी इनके शिकार बन रहे हैं। विड़ंबना तो यह है कि जिस जादू-टोने को विज्ञान मानने से इनकार करता रहा है आज उसी जन्मी तकनीक के सहारे तंत्र-मंत्र का जाल बिछा हुआ है। लोगों की महत्वकांक्षाएं बढ़ी हैं तो फर्जी लोगों काजाल भी बढ़ रहा है। चूंकि हर हाथ में फोन है और इंटरनेट पहुंच बढ़ रही है तो अंधविश्वास का कारोबार भी इसी के जरिए आपके पास तक पहुंच रहा है।हालत यह है कि चाहे सफर हो, बाजार हो हर तरफ इस तरह के विज्ञापन और साइट नजर आ रहे हैं जो एक क्लिक के साथ जीवन को खुशियों से भरने का दावा कर रहे हैं। किसी पर बेगम आफरीदा के नाम से तो किसी पर बाबाजी, मौलानाजी के नाम से इस्लामिक तंत्र-मंत्र परोस कर लोगों को आमंत्रित किया जाता है, वह भी इस दावे के साथ कि इस्लाम के दायरे में रहकर यह सब किया जाता है।

अब सवाल यह है कि जब इस्लाम में इसकी मनाही है तो किस तरह उसी का इस्तेमाल करके यह कारोबार किया जा रहा है। अब समय आ गया है कि इस्लाम के रहनुमा होने का दम भरने वाले लोग अपने समुदाय की उस गंदगी को दूर करें जो बरसों से अपनी जड़ें जमाती रही है । अपराध ढोती प्रथा अंधविश्वास की भयावह परिणति हत्याओं में होती है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुछ सालों पहले एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें भारत में 1987 से 2003 तक 2 हजार 556 महिलाओं को डायन या चुड़ैल कह कर मार देने की बात कही गई थी। इस तरह हत्या करने के मामले झारखंड में सबसे आगे है। दूसरे पर ओड़िशा और तीसरे नंबर पर तमिलनाडु है। एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2011में 240, 2012 में 119, 2013 में 160 हत्याएं अंधविश्वास के नाम पर की गर्इं। अकेले झारखंड में 2001 से 2015 तक चार सौ महिलाओं की हत्या अंधविश्वास से प्रेरित होकर की गई।

डायन कुप्रथा के खिलाफ कानून है लेकिन उसका कोई खास असर नहीं हो रहा है। इसमें मारपीट, प्रताड़ना के साथ-साथ डायन घोषित कीगई महिला को मल-मूत्र पिलाना, निर्वस्त्र करके घुमाना से लेकर बुनियादी संसाधनों से वंचित करके छोड़ देने जैसे मामले सामने आए हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग समय-समय पर अंधविश्वास के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए गोष्ठियां,कार्यशालाएं आयोजित करता रहता है। मगर जो अंधविश्वास हत्याओं तक पहुंच गया हो उसे इस तरह के छोटे-मोटे कार्यक्रमों तक सीमित रखना कहां तक सही है।मामूली तंत्र-मंत्र, झाड़-फूंक से शुरू होने वाला अंधविश्वास लोगों के उत्पीड़न, हत्याओं का कारण बनता जा रहा है। इसकी शुरुआत ढोंगी ओझाओं और तांत्रिकों की बदनीयती और गलत सलाह से शुरू होती है। कई जगह कुछ गलत परंपराएं भी आग में घी का काम करती हैं।

महाराष्ट्र के शोलापुर में बाबा उमर की दरगाह पर बच्चों को ऊंचाई से चादर में फेंकने की प्रथा है क्योंकि यह समझा जाता है कि इससे बच्चे स्वस्थ होते हैं। इससे कई बार बच्चे चुटहिल हो जाते हैं। लोगों का यही अंधविश्वास उन्हें इस मोड़ पर ले आता है, जहां कोई भी ढोंगी उनके भले का हवाला देकर बलि या हत्या के लिए उकसा देता है। पहले इसके पीछे इन लोगों की इच्छा लोगों से धन ऐंठने तक सीमित थी लेकिन आज किसी महिला के शारीरिक शोषण से लेकर उसके घर, जमीन पर कब्जा करने और बदले की भावना के तहत भी ऐसे अपराधों के लिए उकसाया जा रहा है।

सहयोग – नाज़ खान
प्रस्तुतकर्ता- सिकन्दर कुमार मेहता
हमसे जुड़ें –
फेसबुक – एक नास्तिक -1manatheist
ट्विटर- @1manatheist

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s