कविता

[कविता] – बन्दर बने रहें

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हम बंदरो की जात हैं, बन्दर बने रहें।
अच्छा हो अपनी खाल के अन्दर बने रहें।
बन्दर की जान जान है, हर जान की तरह।
बन्दर का खून गरम है, इन्सान की तरह।
बाहें वही, सीना वही, सिर में वही दिमाग।
बन्दर की आन बान है, हनुमान की तरह।
हर दिल में उस माहन के मंदिर बने रहें।
हम बंदरों की जात ……
नंगा नहीं वह पैंट या सलवार के बिना।
ढकी है शर्म पत्ते की दरकार के बिना।
काजल नहीं, बिंदी नहीं, गहना नहीं कोई।
है खूबसूरत किसी भी श्रृंगार के बिना।
हम भी उसी के रूप में सुन्दर बने रहें।
हम बंदरों की जात ……
रहता नहीं बन्दर कभी परिवार के बिना
बन्दर समाज है मगर सरकार के बिना।
डंडा नहीं, थाना नहीं, न कोर्ट है, न जेल।
झगड़े मिटाए जाते हैं तलवार के बिना।
ऐसे ही हम भी मस्त कलंदर बने रहें।
हम बंदरों की जात …..
बन्दर सभी किसान हों, बन्दर जवान हों।
बन्दर सभी हों मंतरी, बन्दर प्रधान हों।
अफसर सभी, बाबु सभी, मजदूर भी सभी।
सारा जहान आज से बन्दरस्तान हो।
धरती पर आसमान के चंदर बने रहें।
हम बंदरों की जात ….
हिन्दू न हो, न सिख, न कोई मुसलमान हो।
न हिन्दी, चीनी, पाकी अपनी पहचान हो।
बन्दर की पूंछ चूम कर खाएं कसम सभी
‘बन्दर का सहज धरम ही अपना ईमान हो’
बन्दर थे हम, बन्दर हैं हम, बन्दर बने रहें।
हम बंदरों की जात हैं, बन्दर बने रहें।
अच्छा हो अपनी खाल के अन्दर बने रहें।

– बलदेव राज दावर, 2012

प्रस्तुतकर्ता- सिकन्दर कुमार मेहता

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