Hyderabad: Superstition led to man’s murder

Police said that Devendra Prasad Misra’s brothers beat him to death as they believed tha the was possessed by a demon.
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Devendra Prasad had been reportedly behaving erratically inrecent days as he developed psychological problems.

Hyderabad : The investigation into the murder of Devendra Prasad Misra, a security guard at an MNC in Madhapur, revealed that his brothers beat him to death as they believed that he was possessed by a demon.

Devendra Prasad had been reportedly behaving erratically in recent days as he developed psychological problems. He had claimed that he killed his mother and would kill his brothers also.

“All the four brothers were extremely superstitious and religious. They also had psychological problems. Devender Prasad suffered a serious mental disorder recently and had been visiting a Dargah in the city.He came back to their room in Madhapur and told his brothers that he was going to kill them. He claimed that he was a baba from ancient times, and had killed his own mother,” said inspector R. Kalinga Rao.

“It led to a fight. His three brothers, Birendra Prasad Misra, Mahendra Prasad Misra and Dharmendra Prasad Misra, who thought that a demon had possessed their brother, started hitting him with things available in the house.
They assaulted him till he collapsed. The victim tried to attack Dharmendra and inflicted an injury on his neck,” the inspector added. Police said the four brothers, who hail from MP, do not go to doctors. Instead they visit temples and Dargas.

Source : Deccan Chronicle

Brought To You By : Sikandar Kumar Mehta

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मेरे धार्मिक मामलों में दखल देने का किसी को अधिकार नहीं : टीएस ठाकुर

नई दिल्ली, जेएनएन। देश-दुनिया में बढ़ती धार्मिक असहिष्णुता से चिंतित सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा है कि इंसान और भगवान के बीच रिश्ता बेहद निजी होता है। इससे किसी अन्य का कोई मतलबनहीं होना चाहिए।

उनका कहना था, ‘मेरा धर्म क्या है? मैं अपने ईश्वर के साथ कैसे जुड़ता हूं? उनकी इबादत किस तरह से करता हूं? यह बेहद निजी मामला है। मेरे धार्मिक मामलों में दखल देने का किसी को कोई अधिकार नहीं है।’ जस्टिस ठाकुर रविवार को सर्वोच्च न्यायालय के जज रोहिंटन एफ नरीमन द्वारा पारसी धर्म पर लिखित एक पुस्तक का लोकार्पण कर रहे थे। उन्होंने समाज में शांति के लिए सहिष्णुता की भावना विकसित करने पर जोर दिया।

प्रधान न्यायाधीश के अनुसार, ‘इस दुनिया में राजनीतिक संघर्ष के मुकाबले धार्मिक लड़ाइयों में ज्यादा लोग मारे गए हैं। लोगों ने एक-दूसरे को नास्तिक और काफिर कह कर मार दिया। धार्मिक मान्यताओं के कारण संसार में ज्यादा तबाही और नरसंहार हुए हैं।’वह बोले, ‘मैं ईश्वर की पूजा कैसे करता हूं? उनसे क्या रिश्ता रखता हूं। इससे किसी का कोई लेना देना नहीं होना चाहिए।’

न्यायमूर्ति ठाकुर ने कहा, ‘मैं सोचता हूं कि आपसी भाईचारा, सहिष्णुता के संदेश के साथ यह बात अगर जन-जन तक जाए कि सभी धर्मों के रास्ते एक ही ईश्वर को जाते हैं तो विश्वमें शांति, समृद्धि बढ़ेगी। इस दिशा में जस्टिस रोहिंटन ने महत्वपूर्ण कार्य किया है।’

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

Source : http://www.jagran.com/

Burn Your Money

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Here in India we have the festival of lights, Diwali. These days it wouldn’t be wrong to call it the festival of sound as well. Sometimes I think, it would be right to call it the “Money Burning Festival”. I’ll tell you how.

“It’s not about the money. It’s about sending a message.” As the Joker put it aptly. What we’re doing during this festival, is just that. Burning money. We light crackers (or as some would say, ‘burst’ them) all through the evenings. Some people don’t stop till 1 in the morning. But why do we partake in this act of futility?

Because a lot of us don’t fucking care. We don’t care about the people and animals who we are troubling. We don’t care about the air and the environment we’re destroying. It’s evident in Delhi, where the air quality index has more than doubled since Diwali started. In Mumbai, where I live, the pollution isn’t that bad because it’s near the coast, while Delhi is in the interior.

This year I did not light a single cracker, nor did my little sister, who would, until last year, put up tantrums if not allowed to light some. But others? Oh well. What kind of message do they want to send?

As a sidenote to anyone reading this who is not acquainted with practices in India, it’s not a tradition to light crackers during diwali. Since centuries people only used to light lamps, candles and diyas, in remembrance of Ram’s return to the city that he ruled. But during the early 19oos, some apparently sociopathic businessman who was into the matches industry started promoting crackers as a way to ‘celebrate’ the festival. And a lot of us Indians have fallen prey to this sinister plan of his, not bright enough to understand that it’s a waste of money and resources, and in no way does it represent the spirit of the festival. So until there’s a reform, feel free to burn your money and send a message !

Courtesy : Effusion Of Perceptions

Brought To You By : Sikandar Kumar Mehta

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गोवर्धन पर्वत को छोटी ऊँगली पर उठाना – सत्य है या फिर ?

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कृष्ण जी द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाया जाना मेरे लिए हमेशा ही संदेह का विषय रहा। इसलिए नहीं की मुझे उनकी शक्ति पर कोई संदेह था बल्कि इसलिए कि जिस कारण से उन्होंने इस पर्वत को उठाया वो बिल्कुल आधारहीन था।

कथा बताती है कि गोकुलवासियों द्वारा इंद्र को यथोचित सम्मान न देने के कारण उनको इंद्र के कोपभाजन का शिकार बनना पड़ा। जिसके फलस्वरूप हुई मूसलाधार वर्षा ने जनजीवन अस्तव्यस्त कर दिया। तब कृष्ण ने गोकुलवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर धारण किया। जिसके नीचे सभी गोकुलवासियों ने शरण ली। और इस प्रकार उनकी अति वृष्टि और बाढ़ से रक्षा हुयी।

कथा बड़ी मनोरम है, अगर धर्मान्ध होकर दिमाग और लॉजिक का निषेध कर सुनी जाए तो बिल्कुल हॉलीवुड ऐड्वेंचर मूवी का सा मजा देती है। लेकिन जरा लॉजिक लगाया तो फिर पूरी कथा ताश के पत्तों के ढेर जैसे भरभरा के गिर जाती है। आइये देखें कैसे?

हम ये मान के चलते हैं कि श्री कृष्ण में पर्वत को उठाने लायक शक्ति थी, लेकिन फिर भी केवल शक्ति होने भर से पर्वत नहीं उठ सकता। इसके लिए कई अन्य फैक्टर भी हैं जिनका विचार करना जरूरी है।

पहले तो पर्वतीय संरचना को समझें। पर्वत कोई पृथ्वी के धरातल पर रखी कोई पेपरवेट जैसी संरचना नहीं है। पर्वतों का निर्माण टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने तथा ज्वालामुखी के कारण होता है, और दोनों ही प्रकार से बनने वाली पर्वतीय संरचनाएं भूगर्भ में गहरे तक जुडी होती हैं। यानी जितना हिस्सा आपको धरातल के ऊपर दिखता है उससे बहुत बहुत बड़ा हिस्सा धरती के भीतर विद्दमान होता है। …….तो अब इस स्थिति में पर्वत उठाने के लिए आपको उस हिस्से को ‘जो की धरातल के ऊपर है’ नीचे वाले हिस्से से अलग करना होगा।

अगर ये मान भी लें कि श्री कृष्ण में इतना बल था की वो इस पूरे पर्वत को धरातल से तोड़कर अलग कर सकते थे तो भी कुछ अन्य फैक्टर आड़े आते हैं। जैसे श्री कृष्ण का आकार पर्वत की तुलना में बहुत बहुत छोटा है। अब यदि वो हाथ से इस पर्वत को उठाने की कोशिश करते हैं तो उनके हाथ द्वारा पर्वत पर लगाया गया बल उनके हाथ जितने क्षेत्रफल पर लगेगा जो की पर्वत के आकार की तुलना में बहुत ही कम है। जिससे पड़ने वाला प्रेशर पर्वत की स्ट्रक्चरल स्ट्रेंथ से बहुत बहुत ज्यादा होगा, इससे होगा यह की पर्वत उठने के स्थान पर पर्वत का वह हिस्सा जो हाथ से पकड़ा गया है वो टूटकर हाथ में आ जाएगा। ये कुछ ऐसा होगा जैसे कोई मक्खन के बड़े से ढले को आलपिन से उठाने की कोशिश करे। और कमाल की बात ये है कि कथा बताती है कि उन्होंने इस पर्वत को अपनी सबसे छोटी अंगुली पर धारण किया ? …..यानि क्षेत्रफल और कम हो गया।

दूसरा जिस स्थान पर खड़े होकर ये बल लगाया जा रहा है वो स्थान भी इतना मजबूत होना चाहिए की उस भारी प्रेशर को एक छोटे से क्षेत्रफल में झेल सके, अन्यथा होगा ये की बल लगाने वाला पर्वत को उठाने के स्थान पर स्वयं धरती में धंस जाएगा।

चलिए सब छोड़िये हम मान ही लेते हैं कि श्री कृष्ण ने किसी प्रकार उस पर्वत को उठा लिया, लेकिन फिर भी बाढ़ और अति वृष्टि से बचाव के लिए पर्वत उठाना और फिर उसके नीचे आश्रय लेना बिल्कुल अतर्कसंगत है क्योंकि इससे बाढ़ और अति-वृष्टि से बचाव नहीं हो सकता।…….विज्ञान बताता है कि द्रव्य गुरुत्वाकर्षण के कारण ऊँचे स्थान से नीचे स्थान की ओर गति करता है। अत: इस स्थिति में पर्वत के ऊपर और बाहर गिरा पानी बह कर अंत में पर्वत के तल पर ही जमा हो जाएगा और जिन्होंने उसके नीचे आश्रय लिया है उन्हें डूबा के मार देगा। ऐसी स्थिति में पर्वत उठाने के स्थान पर पर्वत के ऊपर शरण लेना ज्यादा ठीक है।

चलिए छोड़िये… धर्म की बातों में लॉजिक नहीं ढूंढते।

स्रोत : व्हाट्स ऐप
प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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