गोवर्धन पर्वत को छोटी ऊँगली पर उठाना – सत्य है या फिर ?

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कृष्ण जी द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाया जाना मेरे लिए हमेशा ही संदेह का विषय रहा। इसलिए नहीं की मुझे उनकी शक्ति पर कोई संदेह था बल्कि इसलिए कि जिस कारण से उन्होंने इस पर्वत को उठाया वो बिल्कुल आधारहीन था।

कथा बताती है कि गोकुलवासियों द्वारा इंद्र को यथोचित सम्मान न देने के कारण उनको इंद्र के कोपभाजन का शिकार बनना पड़ा। जिसके फलस्वरूप हुई मूसलाधार वर्षा ने जनजीवन अस्तव्यस्त कर दिया। तब कृष्ण ने गोकुलवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर धारण किया। जिसके नीचे सभी गोकुलवासियों ने शरण ली। और इस प्रकार उनकी अति वृष्टि और बाढ़ से रक्षा हुयी।

कथा बड़ी मनोरम है, अगर धर्मान्ध होकर दिमाग और लॉजिक का निषेध कर सुनी जाए तो बिल्कुल हॉलीवुड ऐड्वेंचर मूवी का सा मजा देती है। लेकिन जरा लॉजिक लगाया तो फिर पूरी कथा ताश के पत्तों के ढेर जैसे भरभरा के गिर जाती है। आइये देखें कैसे?

हम ये मान के चलते हैं कि श्री कृष्ण में पर्वत को उठाने लायक शक्ति थी, लेकिन फिर भी केवल शक्ति होने भर से पर्वत नहीं उठ सकता। इसके लिए कई अन्य फैक्टर भी हैं जिनका विचार करना जरूरी है।

पहले तो पर्वतीय संरचना को समझें। पर्वत कोई पृथ्वी के धरातल पर रखी कोई पेपरवेट जैसी संरचना नहीं है। पर्वतों का निर्माण टेक्टोनिक प्लेटों के टकराने तथा ज्वालामुखी के कारण होता है, और दोनों ही प्रकार से बनने वाली पर्वतीय संरचनाएं भूगर्भ में गहरे तक जुडी होती हैं। यानी जितना हिस्सा आपको धरातल के ऊपर दिखता है उससे बहुत बहुत बड़ा हिस्सा धरती के भीतर विद्दमान होता है। …….तो अब इस स्थिति में पर्वत उठाने के लिए आपको उस हिस्से को ‘जो की धरातल के ऊपर है’ नीचे वाले हिस्से से अलग करना होगा।

अगर ये मान भी लें कि श्री कृष्ण में इतना बल था की वो इस पूरे पर्वत को धरातल से तोड़कर अलग कर सकते थे तो भी कुछ अन्य फैक्टर आड़े आते हैं। जैसे श्री कृष्ण का आकार पर्वत की तुलना में बहुत बहुत छोटा है। अब यदि वो हाथ से इस पर्वत को उठाने की कोशिश करते हैं तो उनके हाथ द्वारा पर्वत पर लगाया गया बल उनके हाथ जितने क्षेत्रफल पर लगेगा जो की पर्वत के आकार की तुलना में बहुत ही कम है। जिससे पड़ने वाला प्रेशर पर्वत की स्ट्रक्चरल स्ट्रेंथ से बहुत बहुत ज्यादा होगा, इससे होगा यह की पर्वत उठने के स्थान पर पर्वत का वह हिस्सा जो हाथ से पकड़ा गया है वो टूटकर हाथ में आ जाएगा। ये कुछ ऐसा होगा जैसे कोई मक्खन के बड़े से ढले को आलपिन से उठाने की कोशिश करे। और कमाल की बात ये है कि कथा बताती है कि उन्होंने इस पर्वत को अपनी सबसे छोटी अंगुली पर धारण किया ? …..यानि क्षेत्रफल और कम हो गया।

दूसरा जिस स्थान पर खड़े होकर ये बल लगाया जा रहा है वो स्थान भी इतना मजबूत होना चाहिए की उस भारी प्रेशर को एक छोटे से क्षेत्रफल में झेल सके, अन्यथा होगा ये की बल लगाने वाला पर्वत को उठाने के स्थान पर स्वयं धरती में धंस जाएगा।

चलिए सब छोड़िये हम मान ही लेते हैं कि श्री कृष्ण ने किसी प्रकार उस पर्वत को उठा लिया, लेकिन फिर भी बाढ़ और अति वृष्टि से बचाव के लिए पर्वत उठाना और फिर उसके नीचे आश्रय लेना बिल्कुल अतर्कसंगत है क्योंकि इससे बाढ़ और अति-वृष्टि से बचाव नहीं हो सकता।…….विज्ञान बताता है कि द्रव्य गुरुत्वाकर्षण के कारण ऊँचे स्थान से नीचे स्थान की ओर गति करता है। अत: इस स्थिति में पर्वत के ऊपर और बाहर गिरा पानी बह कर अंत में पर्वत के तल पर ही जमा हो जाएगा और जिन्होंने उसके नीचे आश्रय लिया है उन्हें डूबा के मार देगा। ऐसी स्थिति में पर्वत उठाने के स्थान पर पर्वत के ऊपर शरण लेना ज्यादा ठीक है।

चलिए छोड़िये… धर्म की बातों में लॉजिक नहीं ढूंढते।

स्रोत : व्हाट्स ऐप
प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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