अंधविश्वास के चुभते ‘कांटे’ !

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बैतूल : हमारी उंगली में एक कांटा भी चुभ जाता है तो हम कराह उठते हैं लेकिन बैतूल में कुछ ऐसे गांव हैं जहां के लोग आस्था के नाम पर कांटों पर नंगे बदन लेटते हैं।

दरअसल ज़िले के कई गांव में रज्जढ़ समुदाय के लोग रहते हैं जो सालों से इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं।

अगहन मास में 5 दिन तक रज्जढ़ समाज के लोग कांटों पर लेटकर अपनी खुशी और दुख व्यक्त करते हैं।

रज्जढ़ समाज के लोगों का मानना है कि वो पांडवों के वंशज हैं पांडव वन गमन के समय जंगल में भटक रहे थे।

प्यास लगने पर उनकी नाहल समुदाय के लोगों से मुलाकात हुई पानी देने के लिए नाहल ने एक शर्त रखी थी कि पांडव अपनी बहन रज्जढ़ भोंदई बाई की शादी उनसे कर दें।

जिसके बाद पांडवों ने शर्त मानते हुए शादी कर दी और पीने के लिए पानी ले लिया इसी को लेकर रज्जढ़ समाज पांडवों का वंशज होने की खुशी मनाता है।

तो साथ ही नाहल से बहन की शादी होने का दुख मनाते हैं बेरी और बबूल के कांटों पर नंगे बदन लेटने से रज्जढ समाज के लोग घायल भी हो जाते हैं।

आस्था के नाम पर ऐसी परंपरा को डॉक्टर जानलेवा बता रहे हैं, डॉक्टरों का कहना है कीये परंपरा रक्त संबंधी बीमारियों और त्वचा रोग का कारण बन सकती है।

अब सवाल ये है कि क्या आस्था के नाम पर अपनी जान को जोखिम में डालकर कांटों पर लेटना और पलटना ठीक है?

स्रोत : ज़ी मीडिया ब्यूरो

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता
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