[कविता] : धर्म

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Pic - ©vaidambh

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नफरत हिंसा द्वेष घृणा का ढूंढा तो आधार धर्म ।
जितना खून बहा है जग में उसका भी आधार धर्म ।
विश्व विवादों की जा जड़ में देखा तो आधार धर्म ।
भूख गरीबी और शोषण का इनका भी आधार धर्म ।
आतंकवाद का पहन के चोला करता नरसंहार धर्म ।
रूढिवाद पाखंडवाद पाषाणवाद का खोल धर्म ।
छल प्रपंच का जाल रचाकर ठगने का ब्यापार धर्म ।
सारे पाप माफ हो जाते लगता यह पचनोल धर्म ।
पोप पुजारी जी को करता देखो मालामाल धर्म ।
आंख के अंधे भक्त गणों को करता यह कंगाल धर्म ।
स्वर्ग नरक भगवान भाग्य का फैला यह भ्रमजाल धर्म ।
तीर्थ और ब्रत में जा देखा पोपो की हर चाल धर्म ।
गांधी को गोली से उडाया इसका भी आधार धर्म ।
ईसा को सूली पे चढाया इसका भी आधार धर्म ।
दयानन्द को जहर पिलाया इसका भी आधार धर्म ।
मोहम्मद साहब को भी सताया इसका भी आधार धर्म ।
किया अहिल्या का मुंह काला इसका भी आधार धर्म ।
एकलव्य का कटा अंगूठा इसका भी आधार धर्म ।
सति बृन्दा के सत को लूटा इसका भी आधार धर्म ।
फिर बचा कौन दुष्कर्म जगत में न जिसका आधार धर्म ।
मंदिर मस्जिद बैर बढाते इतना तो शैतान धर्म ।
इनसे तो अच्छी मधुशाला इतना तो बदनाम धर्म ।
तर्क इसे न अच्छा लगता अक्ल पे ताला पड़ा धर्म ।
सुंदर सुघर सलोना मुखड़ा दिल का काला किन्तु धर्म ।
ढोंगी और पाखंडी कहते हिंदू सिक्ख इस्लाम धर्म ।
संत फकीर सभी यह कहते ईसा मूसा राम धर्म ।
ज्ञानी ध्यानी सव जन कहते वेद पुरान कुरान धर्म ।
सौ बातों की बात एक है मानव का इंसान धर्म ।
कोई कहता है आचार धर्म कोई कहता है ब्यवहार धर्म ।
पर मेरी समझ में यह आया बस मानव का उपकार धर्म ।
मानव सेवा ईश्वर सेवा मानवता ही है सार धर्म ।
कबिरा ने सिखाया प्यार धर्म बरना आडम्बर यार धर्म ।

– Yadunandan Lal Lodhi

प्रस्तुतकर्ता सिकन्दर कुमार मेहता

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