भूखे बच्चे से भगवान :प्रसिद्ध अश्‍वेत अमेरिकी कवि लैंग्‍सटन ह्यूज की कविताएं

आज पेश है प्रसिद्ध अश्‍वेत अमेरिकी कवि लैंग्‍सटन ह्यूज की पांच कविताएं

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28 सितंबर को झारखंड में एक बच्ची की भूख से मौत इस पूंजीवादी व्यवस्था का विभत्स चेहरा दिखाती है। ह्यूज़ की ‘भूखे बच्चे से भगवान’ कविता इस त्रासदी के पीछे की ढांचागत सच्चाई को बयान करती है
कविताओं के अंत में ह्यूज का एक संक्षिप्‍त परिचय भी दिया गया है। परिचय सत्‍यम द्वारा लिखा गया है और परिकल्‍पना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्‍तक ‘आंखे दुनिया की तरफ देखती है’ से लिया गया है !

(1) भूखे बच्चे से भगवान

भूखे बच्चे!
तुम्हारे लिए नहीं बनायी है
मैंने यह धरती
तुमने तो ख़रीदा ही नहीं है
मेरी रेल कम्पनी का स्टॉक
मेरे कारपोरेशन में
कोई निवेश भी नहीं किया है
स्टैण्डर्ड ऑयल में
कोई शेयर भी तो नहीं है तुम्हारा
इस धरती केा मैंने अमीरों के लिए बनाया है
जो होने वाले अमीर हैं
और जो हमेशा से अमीर हैं
उनके लिए
तुम्हारे लिये नहीं
भूखे बच्चे

(2) इंसा़फ़

इंसा़फ़ एक अन्धी देवी है
इसे हम काले लोग बख़ूबी समझते हैं:
उसकी बँधी हुई पट्टी के पीछे छिपे हैं दो सड़ते घाव
जहाँ शायद कभी हुआ करती थी आँखें।

(3) ज़ुुल्म

सपने
अब नहीं आते
स्वप्नद्रष्टाओं के पास,
न ही गीत आते हैं
गाने वालों के पास।
कुछ देशों में
काली रात
और सर्द लोहा ही पसरा हुआ है
हर ओर।
लेकिन सपने
वापस लौटेंगे,
और गीत
तोड़ डालेंगे
इनके कैदखानों को।

(4) सपने

सपनों को कसकर पकड़ रखो
क्योंकि अगर सपने मर गये
तो जीवन है टूटे पंखों वाली इक चिड़िया
जो उड़ नहीं सकती।
सपनों को कसकर पकड़ रखो
क्योंकि जो सपने नहीं रहे
तो जीवन है बर्फ से ढँका
एक बंजर खेत।

(5) मैं एक सपना देखता हूँ इस धरती का

मैं एक ऐसी धरती का सपना देखता हूँ
जहाँ आदमी आदमी से घृणा नहीं करे
जहाँ धरती प्रेम के आशीर्वाद से पगी हो
और रास्ते शान्ति की अल्पना से सुसज्जित

मैं एक ऐसी धरती का सपना देखता हूँ
जहाँ सभी को आज़ादी की मिठास मिले
जहाँ अन्तरात्मा को लालच मार नहीं सके
जहाँ धन का लोभ हमारे दिनों को नष्ट नहीं कर सके

मैं एक ऐसी धरती का सपना देखता हूँ
जहाँ काले या गोरे चाहे जिस भी नस्ल के तुम रहो
धरती की सम्पदा का तुम्हारा हिस्सा तुम्हें मिले

जहाँ हर आदमी आज़ाद हो
जहाँ सिर झुकाये खड़ी हो दुरावस्था
जहाँ मोतियों-सा अच्छल हो आनन्द
और सबकी ज़रूरतें पूरी हों

ऐसा ही सपना देखता हूँ मैं इस धरती का

🔴🔴परिचय🔴🔴
अमेरिकी साहित्य की दुनिया में रंगभेद का प्रतिनिधि उदाहरण लैंग्स्टन ह्यूज (1902-1967) के कृतित्व के प्रति वहाँ के आलोचकों और प्रकाशकों का उपेक्षापूर्ण रवैया रहा है।
कविताएँ, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, निबन्ध – ह्यूज़ ने इन सभी विधाओं में विपुल मात्रा में लिखा और उनके रचना संसार का वर्णक्रम भी का़फ़ी वैविध्यपूर्ण था, पर अंग्रेज़ी के साहित्य संसार में उसका समुचित मूल्यांकन वस्तुतः कभी नहीं हुआ। इसका कारण महज इतना ही नहीं था कि ह्यूज अश्वेत थे और अश्वेतों के उत्पीड़न के मुखर विरोधी थे। इससे भी अहम कारण यह था कि वह विचारों से वामपंथी थे और इस सच्चाई को उन्होंने कभी छुपाया नहीं। इसका ख़ामियाज़ा उन्हें मैकार्थीकाल में ही नहीं बल्कि उसके बाद भी चुकाना पड़ा।
ह्यूज की मृत्यु 1967 में जब हुई, तब अमेरिका में अश्वेतों का आन्दोलन अपने शीर्ष पर था और मेहनतकशों और युवाओं की भारी आबादी भी सड़कों पर थी। यह समय था जब अफ्रीकी देश प्रचण्ड मुक्ति संघर्ष चलाते हुए एक के बाद एक औपनिवेशिक दासता की जंजीरों को तोड़ते जा रहे थे। उधर चीन में सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति का तू़फ़ान शिखर पर था। ह्यूज की कविताओं के सपनों को धरती पर रिहाइश मिलने की उम्मीदें प्रबल हो उठी थीं। बेशक ह्यूज ने तसल्ली और चैन के साथ यह दुनिया छोड़ी होगी।
लैंग्स्टन ह्यूज की कविता एक अफ्रीकी-अमेरिकी कवि के रूप में अपनी जड़ों की तलाश करती हुई एक ओर जहाँ अफ्रीकी धरती और वहाँ के कवियों तक पहुँचती थी, तो दूसरी ओर अमेरिकी इतिहास में मुक्ति-स्वप्नों का सन्धान करते हुए लिंकन की राजनीति और वाल्ट ह्निटमैन की कविता तक से जुड़ती थी। औपनिवेशिक उत्पीड़न और ऐतिहासिक विस्मृति के विरुद्ध टकराती हुई वह एक ओर पूरे अमेरिकी महाद्वीप की परम्परा से – रुबेन दारियो से लेकर पाब्लो नेरूदा और निकोलस गीयेन तक की कविता से जीवन्त रिश्ता बनाती थी तो दूसरी ओर सर्वहारा के ऐतिहासिक मिशन से जुड़ाव उसे सोवियत संघ और चीन के जीवन से, वहाँ की गौरवशाली क्रान्तियों से और मयाकोव्स्की से लेकर कुओ मो-जो तक की कविताओं से जोड़ता था।
लैंग्स्टन ह्यूज जीवन, संघर्ष और सृजन के सहज प्रवाह के कवि हैं। सादगी और सहज अभिव्यक्ति का सौन्दर्य उनकी कविता की शक्ति है। लैंग्स्टन ह्यूज की कविताओं का हिन्दी में छिटफुट और का़फ़ी कम अनुवाद हुआ है।

लैंग्स्टन ह्यूज हम लोगों के प्रिय साथी, कवि और अनुवादक रामकृष्ण पाण्डेय के पसन्दीदा कवियों में से एक थे। उनकी हार्दिक इच्छा थी कि लैंग्स्टन ह्यूज की ज़्यादा से ज़्यादा कविताएँ जुटाकर उनका हिन्दी अनुवाद किया जाये। ‘परिकल्पना’ के लिए उन्होंने उपलब्ध कविताओं के अनुवाद पर 2008 में ही काम शुरू कर दिया था। इनमेें से पच्चीस कविताओं के अनुवाद ‘जनपथ’ पत्रिका की ओर से एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित भी हो चुके हैं। इसके बाद पाण्डेय जी ने कुछ और कविताओं के अनुवाद भी किये। उन सबको मिलाकर यह संकलन प्रकाशित किया जा रहा है। 16 नवम्बर 2009 को दिल के गम्भीर दौरे ने पाण्डेय जी को हम सभी से हमेशा के लिए छीन लिया और उन ढेर सारी परियोजनाओं की तरह, जिन पर पत्रकारिता की नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद पाण्डेय जी ज़ोर-शोर से काम शुरू करना चाहते थे, ह्यूज की कविताओं के अनुवाद की परियोजना भी अधूरी रह गयी। बहरहाल, जितनी कविताओं के अनुवाद पाण्डेय जी छोड़ गये, उन्हें पुस्तकाकार प्रकाशित किया जा रहा है। यह अपने प्रिय साथी और सहकर्मी को हमारी ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि भी है।

सत्यम

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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पराविज्ञान पर वैज्ञानिक शोध व चुनौतियाँ

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सन 1922 में ‘साइंटिफिक अमेरिकन पत्रिका ने घोषणा की थी कि जो कोई भी जांच के दायरे में आकर १. आत्मा की फोटो लेगा या २. किसी भी अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन करेगा, उसे वह 2,500 US$ ईनाम के रूप में देगी! सबसे पहले जॉर्ज वालेंटीन की जांच की गयी, जिसे जाँच टीम के द्वारा धोखा करते हुए पकड़ लिया गया और वह ईनाम नहीं जीत पाए! तब से लेकर अभी तक दुनियाभर के पचासों व्यक्तियों और संगठनों नें इस प्रकार के ईनाम की घोषणा की, मगर आज तक ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं हुआ,जो किसी भी व्यक्ति या संगठन से ईनाम की रकम जीत सका हो! हालाँकि चुनौती हजारों लोग स्वीकार चुके हैं, मगर सब कुछ तय करने के बाद प्रदर्शन के समय उनमें से कई आते ही नहीं, कुछ अलग अलग प्रकार के बहाने बनाते हैं, कुछ जवाब ही नहीं देते, और कुछ धोखा करते हुए पकड़ लिए जाते हैं! मतलब इन 92 वर्षो में (सन 2014 तक) ऐसा एक भी बाशिंदा नहीं मिला जिसका दावा सच निकला हो! ऊपरी नजर से देखने में सीधे-सीधे यह बात सिद्ध हो जाती है कि जितने भी व्यक्ति ऐसा दावा करते हैं, वो सभी धोखा करते हैं, उनके पास कोई अलौकिक शक्ति नहीं होती!

जॉर्ज वालेंटीन (George Valiantine) सन 1920 के आसपास चर्चा में आये क्योंकि इन्होने दावा किया था कि एलिएंस धरती पर आते हैं और उनका हाक चीफ और कोकम (Hawk Chief and Kokum) नाम के देवदूतों (Spirit-Guides) से संपर्क है!

सन 1882 में United Kingdomमें Society for Psychical Research नाम से अपने प्रकार की संसार की पहली संस्था का जन्म हुआ, जिसका उद्देश्य विभिन्न प्रकार के अलौकिक चमत्कारों वपरामनोवैज्ञानिक विषयों के सम्बन्ध में शोध करना था! यह संस्था आज भी सक्रिय है, इसके हजारों सदस्यों नें आजतक ढ़ेरों शोध किये हैं, और विभिन्न प्रकार के दावों की सच्चाई सामने लायी है जिसका निष्कर्ष है कि इन सभी घटनाओं के पीछे एक वैज्ञानिक कारण होता है, अलौकिक जैसी कोई भी चीज नहीं होती! इस संगठन की स्थापना के बाद इस विषय में शोध और लोगों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए समय-समय पर दुनियाभर में सैकड़ों संगठनों का जन्म हुआ! जिनमे से कुछ प्रमुख संगठनों के नाम इस प्रकार हैं

अमेरिका

  1. Center for Inquiry
  2. Committee for Skeptical Inquiry
  3. Independent Investigations Group
  4. James Randi Educational Foundation
  5. New England Skeptical Society
  6. The Skeptics Society

यूरोप

  1. Swedish Skeptics’ Association
  2. Hungarian Skeptical Society
  3. Irish Skeptics Society
  4. Italian Committee for the Investigation of Claims of the Paranormal
  5. Edinburgh Skeptics Society
  6. Merseyside Skeptics Society

भारत

  1. Federation of Indian Rationalist Associations
  2. Kerala Yukthivadi Sangham
  3. Maharashtra Andhashraddha Nirmoolan Samiti
  4. Science and Rationalists’ Association of India
  5. Dakshina Kannada Rationalist Association
  6. Tarksheel Society

अन्य

  1. Australian Skeptics
  2. Young Australian Skeptics
  3. Centre for Inquiry Canada
  4. New Zealand Skeptics
  5. Richard Dawkins Foundation for Reason and Science
  6. Brazilian society of skeptics and rationalists

पुनः ध्यान दें, इस सूची में सौ से अधिक संगठन हैं, यहाँ केवल कुछ महत्वपूर्ण संगठनों को नामांकित किया गया है! इन संगठनों का कार्य परामनोवैज्ञानिक विषयों पर शोध करना है! इन सभी के शोध का बस एक ही निष्कर्ष है, कि कुछ भी अलौकिक नहीं होता! हर घटना के पीछे एक कारण होता है, जिसकी व्याख्या वर्त्तमान वैज्ञानिक नियमों से की जा सकती है! तब भी कुछ साधूसन्यासी, ज्योतिषपण्डे और अलौकिक शक्तियों का दावा करने वाले दुसरे लोग लोगों को झूठ बोलकर भ्रमित करते हैं और चालबाजी से उन्हें कुछ न कुछ ऐसा करके दिखा देते हैं जिससे लोगों को उनपर विश्वास हो जाता है! ऐसे लोग हमेशा इन संगठनों से बचने की कोशिश करते हैं! कई बार ऐसे लोगों को इन संगठनों के द्वारा अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का न्यौता भी दिया जाता है, मगर ये कभी भी उसका जवाब तक नहीं देते!

लोगों को इन जैसे धूर्तों के चंगुल से बचाने के लिए इनमें से आधे संगठनों ने ईनाम की घोषणा भी की हुई है! उनके ईनाम की धनराशी इतनी अधिक है,की अगर एक भी आदमी जीत जाए तो उनका संगठन ही बंद हो जाए, मगर न ही आजतक कोई जीत सका है और न ही कोई जीत पायेगा, क्योंकि कोई चमत्कार होता ही नहीं है! ईनाम देनें वाले कुछ बड़े संगठनों की सूची इस प्रकार है

भारत में

  1. तर्कशील सोसाइटी, पंजाब : एक करोड़ रूपए
  2. पबीर घोष : पचीस लाख रूपए
  3. Humanist Rationalist Association, Godhra: 50 लाख रूपए यह सिद्ध करने पर कि भूत होते हैं! [TOI]

भारत से बाहर

  1. James Randi Educational Foundation : दस लाख अमेरिकी डॉलर
    Update: जेम्स रांडी के रेटायर हो जाने के कारण जेम्स रांडी फ़ाउंडेशन के बोर्ड ने इस चैलेंज को बंद करने का फ़ैसला लिया है। अब यह बोर्ड प्रतिवर्ष लगभग एक लाख डालर विश्व भर की उन संस्थाओं को दान में देगा जो अंधविश्वास को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
  2. Australian Skeptics : एक लाख आस्ट्रेलियन डॉलर (करीब 50 लाख रूपए) [बीस हज़ार डॉलर उसे जो किसी का नाम घोषित करेगा तथा अस्सी हज़ार डॉलर उसे जो चुनौती पूरी करेगा. अगर किसी स्थिति में व्यक्ति अपना नाम खुद घोषित करता है, तो उसे ही पूरे एक लाख डॉलर मिलेंगे!] यह केवल आस्ट्रेलिया के नागरिकों के लिए ही है।
  3. Stuart Landsborough : 1,00,000 NZ$ (करीब 51 लाख रूपए)
  4. The Independent Investigations Group : 1,00,000 US$ (करीब 65 लाख रूपए) इसके अलावा उस व्यक्ति को 5000 US$ जो ऐसे किसी चमत्कारी व्यक्ति का पता बताएगा।
  5. Daniel Zepeda : 20,000 MX$ (करीब पांच लाख रूपए)
  6. Les Sceptiques du Québec : 10,000 CAD$ (करीब पांच लाख रूपए)
  7. Harry Houdini Prize : 1,000,000 RUB (क़रीब 12 लाख रुपए)

यहाँ सिर्फ दस संस्थानों के नाम और उनके द्वारा दी जाने वाली ईनाम की धनराशि लिखी गयी है! अगर आप उनकी चुनौती स्वीकार करना चाहें, तो उनके नाम पर क्लिक करके उनके घोषणा पृष्ठ पर पहुँच सकते हैं, मैंने सभी की डायरेक्ट लिंक लगा दी है! इसके अलावा अभी और भी कई सारे संस्थान हैं, मगर आप केवल इन दस से ही करीब तीन करोड़ रूपए कमा सकते हैं,यदि आपके पास एक भी अलौकिक शक्ति है!

आप इतनी देर से सोंच रहे होंगे कि ईनाम तो ठीक है, मगर इसे जीता कैसे जाए? वैसे तो ये सभी पुरस्कार किसी भी एक ऐसे चमत्कार को दिखाकर प्राप्त किये जा सकते हैं, जिसमें कोई चालबाजी न की गयी हो, जो अलौकिक हो! मगर यदि आप या आपका कोई परिचित देव पुरुष, संत,योगी, सिद्ध गुरु, स्वामी या अन्य दुसरे जिन्होंने आत्मिक क्रिया कलापों से या परमात्मा की शक्ति से शक्ति प्राप्त की हो, वह निम्नलिखित में से किसी भी एक का प्रदर्शन करके ईनाम की रकम जीत सकते हैं-

  1. जो सील बंद करेंसी नोट का क्रमांक पढ़ सकता हो!
  2. जो किसी करेंसी नोट की ठीक नक़ल पैदा कर सकता हो!
  3. जो जलती हुई आग पर, अपने देवता के सहारे आधे मिनट से अधिक तक नंगे पैर खड़ा हो सकता हो!
  4. ऐसी वस्तु, जिसकी मांग की जाए, हवा से पैदा कर सकता हो!
  5. मानसिक शक्ति से किसी वस्तु को हिला या मोड़ सकता हो!
  6. टेलीपैथी के माध्यम से किसी दुसरे व्यक्ति के विचार पढ़ सकता हो!
  7. प्रार्थना, आत्मिक शक्ति, गंगा जल या पवित्र राख से अपने शरीर के किसी अंग को एक इंच बढ़ा सकता हो!
  8. जो योग शक्ति से हवा में उड़ सकता हो!
  9. जो योग शक्ति से पांच मिनट के लिए अपनी नब्ज रोंक सकता हो!
  10. पानी के ऊपर पैदल चल सकता हो!
  11. अपना शरीर एक स्थान पर छोड़कर दुसरे स्थान पर प्रकट कर सकता हो!
  12. योग शक्ति से अपनी श्वसन क्रिया तीस मिनट तक रोंक सकता हो!
  13. रचनात्मक बुद्धि का विकास करे! भक्ति या अज्ञात शक्ति से आत्म ज्ञान प्राप्त करे!
  14. पुनर्जन्म के कारण कोई अद्भुद भाषा बोल सकता हो!
  15. ऐसी आत्मा या प्रेत को पेश कर सके जिसकी फोटो ली जा सके!
  16. फोटो लेने के उपरांत फोटो से गायब हो सकता हो!
  17. किसी वस्तु का भर बढ़ा सकता हो!
  18. ताला लगे कमरे में से अलौकिक शक्ति से बाहर आ सकता हो!
  19. किसी छिपी हुई वस्तु को खोज सकता हो!
  20. पानी को शराब या पेट्रोल में परिवर्तित कर सकता हो!
  21. शराब को खून में परिवर्तित कर सकता हो!
  22. ज्योतिषियों के लिए विशेष : ऐसे ज्योतिषी एवं पण्डे जो यह कहकर लोगों को गुमराह करते हैं कि ज्योतिष और हस्त रेखा एक विज्ञान है, वह भी इस ईनाम को जीत सकते हैं अगर वे दस हस्त चित्रों या दस ज्योतिष पत्रिकाओं को देखकर आदमी और औरत की अलग अलग संख्या, जीवित और मृत लोगों की अलग अलग संख्या, और उन सभी के जन्म का ठीक समय व स्थान, अक्षांश–रेखांश के साथ बात दें! इसमें पांच प्रतिशत की गलती माफ़ होगी!

उपरोक्त सभी 22 चुनौतियाँ डा. अब्राहम कोवूर नें सन 1963 में दी थीं, जिनमे से एक को भी पूरा करने वाले को वो बदले में एक लाख श्रीलंकन रूपए, जो उनकी जिंदगी भर की सारी कमाई थी, देने को तैयार थे! उनकी यह घोषणा उस समय दुनिया भर के सभी समाचार पत्रों में छपी थी! यह चुनौती उनकी म्रत्यु तक जारी रही, मगर कोई भी इसे जीत न सका! 1978 में उनकी म्रत्यु के बाद बसवा प्रेमानंद ने उनकी चुनौती को एक लाख भारतीय रूपए के रूप में चालू रखा! मगर 2009 में उनकी म्रत्यु भी हो गयी, मगर फिर भी इसे कोई न जीत सका! फिर दो वर्षो बाद अब्राहम कोवूर द्वारा श्रीलंका में स्थापित की गयी Sri Lanka Rationalist Association ने 2012 में उनकी चुनौती को दस लाख श्रीलंकन रूपए के ईनाम के साथ पुनः प्रारंभ कर दिया, जो कि अभी तक चल रही है! वहीँ दूसरी तरफ 1984 में मेघराज मित्र की अध्यक्षता में गठित ‘तर्कशील सोसाइटी, पंजाब‘ ने भी डा. कोवूर की चुनौती को अपने गठन के बाद से ही प्रारंभ रखा! ईनाम की रकम को बढ़ाते हुए आज 2014 में तर्कशील सोसाइटी ने इसे एक करोड़ रूपए तक बढ़ा दिया है! मगर आज तक कोई भी व्यक्ति इनमे से एक रूपए भी नहीं कमा पाया है!

इस पोस्ट की समाप्ति डॉ. कोवूर के ही कथन से करते हैं–

“जो मनुष्य अपने चमत्कारों की पड़ताल करने की आज्ञा नहीं देता, धोखेबाज होता है! जिसमें चमत्कारों की पड़ताल करने का साहस नहीं होता, वह अन्धानुयायी होता है! जो बिना पड़ताल किये ही विश्वास कर लेता है, वह मूर्ख होता है!“

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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गाय के बछड़े का गला काटते रंगे हाथ पकड़े गए दीक्षित बंधु, दंगा होते-होते बचा

गाय के नाम पर पूरे भारत में गौआतंकी निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं…

लखनऊ। गाय के नाम पर पूरे भारत में गौआतंकी निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले का जो मामला सामने आया है उससे पोल खुल गई है कि इस गौआतंक के पीछे किनका हाथ है।

हमने जब गोण्डापुलिस से ट्विटर पर घटना की जानकारी चाही, तो उत्तर मिला –

“इस प्रकरण में अभियुक्तों के खिलाफ धारा 295A,153A, 505b भादवि व 3/8 गोवध निवारण अधिनियम अभियोग पंजीकृत कर माननीय न्यायालय रवाना किया गया।”

शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने फेसबुक पेज पर कुछ चित्र शेयर किए हैं। पूरे घटनाक्रम को उन्होंने इसतरह बयाँ किया है –

रामसेवक दीक्षित, और मंगल दीक्षित ने गॉंव के ही गणेश प्रसाद का बछडा खोलकर उसका गला काट दिया, एक चश्मदीद हिंदू भाई ने इसे देखकर 100 नम्बर डायल कर दिया, संयोग से पुलिस वैन थोडी दूर से गुज़र रही थी, पुलिस ने रंगे हाथ रामसेवक दीक्षित को ख़ून लगे चाकू और काटे गये बछडे के साथ गिरफ़्तार कर लिया!

घटना गोंडा के थाना कटरा बाज़ार के गॉंव देवा पसिया भटपुरवा की है, 1 October रात 12 बजे घटी इस घटना ने पुलिस की सूझबूझ से गोंडा को जलने से बचा लिया !

एडिश्नल SP गोंडा ने गिरफ्तार रामसेवक और मंगल दीक्षित पर रासुका की कार्यवाई करने का आश्वासन दिया है !!

दशहरा, दुर्गापूजा, मुहर्रम, गॉंधी जयंती जैसे महत्वपूर्ण त्यौहारों से तनाव तनाव से गुज़र रहे समाज के लिये ये घटना कितनी भयावह हो सकती थी, अगर असली गुनहगार मौके से ना पकडे जाते तो आप अंदाज़ा लगाइये कि इल्ज़ाम मुललमानों पर जाता और शायद दंगा भी भडक सकता था !

दोस्त जैसे भाई मसूद आलम ने पूरी घटना की जानकारी दी है और तस्वीरें भी भेजी हैं, कुछ तस्वीरें आपसे साझा कर रहा हूँ ! इस घटना की गहराई से जॉंच हो तो शायद कुछ बडे साज़िशकर्ताओं के नाम आयेंगे !

शुक्रिया पुलिस प्रशासन गोंडा

आप लोग भी अपने अपने इलाक़ों में, गॉंवों में सतर्क रहिये, आसपास नज़र रखिये, क्योंकि समाज को जलाने और तोडने की कोशिश वाले गद्दार आपके आसपास ही छुपे हैं !

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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बनारस हिन्‍दु विश्‍वविद्यालय की छात्राओं से घबराये संघी फासीवादी

बनारस हिन्‍दु विश्‍वविद्यालय की छात्राओं से घबराये संघी फासीवादी

गौरतलब है कि बनारस हिन्‍दु विश्‍वविद्यालय की कुछ छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटना के बाद भी प्रशासन ने जब कोई कार्रवाई नहीं की तो वहां की छात्राओं ने सड़क पर उतरने की ठानी। पिछले दो दिन से आन्‍दोलन को तोड़ने की तमाम कोशिशों के बावजुद छात्राएं डटी हुई हैं। उनके हॉस्‍टलों पर ताले लगा दिये गये हैं, चारों तरफ पुलिस, आरएएफ बिठा दी गयी है पर फिर भी उनके हौंसले बुलंद हैं। इसी दौरान बीएचयू में मोदी का भी दौरा था। इसी का बहाना बनाकर तमाम संघी इस आन्‍दोलन को बदनाम करने में जुट गये हैं। इस आन्‍दोलन के बारे में दो छोटे पोस्‍ट नीचे दिये हैं। पहला कमेंट मुकेस असीम का है। दूसरा दिशा छात्र संगठन व स्त्री मुक्ति लीग, इलाहाबाद द्वारा जारी पर्चा है।

1⃣ बीएचयू की छात्राओं द्वारा यौन अपराधियों के खिलाफ आंदोलन को एबीवीपी जब मोदी विरोधी आंदोलन बताता है तो वह यह सच्चाई ही बयान कर रहा होता है कि मोदी-योगी, आदि की संघी सरकारें खुद को पितृसत्ता से लेकर तमाम प्रतिक्रियावादी विचारों के वाहक ब्राह्मणवादी विचार के लम्पटों-लुच्चों का संरक्षक मानती हैं; और उनके विरोध को अपना विरोध|

यही वजह है कि बीएचयू का वाइस चांसलर पूरी बेशर्मी और प्रशासनिक ताकत के साथ लम्पटों, अपराधियों के साथ खड़ा है, अपराध की शिकार छात्रा के साथ झूठी हमदर्दी तक व्यक्त करने को तैयार नहीं है बल्कि उसे ही अपराध के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है, और विरोध में बहादुरी से डटीं छात्राओं (और छात्रों) पर हर तरह के दबाव-डराने-धमकाने के साथ ही दमन की भी तैयारी है|

हॉस्टलों पर ताले लगा दिए गए हैं, पीने के पानी के नल और शौचालय पर ताला लगा दिया गया है| साफ है कि कि ये हिन्दुत्वी लम्पट भी भारतीय विश्वविद्यालयों का वही हाल करना चाहते हैं जो ईरानी कठमुल्लाओं ने तेहरान और तालिबानियों ने काबुल विवि का किया था| पर हैदराबाद, दिल्ली, जेएनयू, मद्रास आईआईटी, जादवपुर, पंजाब (चंडीगढ़) से बीएचयू तक छात्र भी बता रहे हैं कि ऐसा नहीं होने दिया जायेगा|

2⃣ बी.एच.यू की बहनो, साथियो! तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं!! बी.एच.यू. प्रशासन मुर्दाबाद! पूँजीवादी पितृसत्ता का नाश हो! बहरी सरकार के कानों में आवाज़ पहुँचाने के लिए अपनी आवाज़ और ऊँचा करो!

देह नहीं होती है

एक दिन स्त्री

और उलट-पुलट जाती है

सारी दुनिया अचानक!

-कात्यायनी

बहनो, साथियो! बी.एच.यू. में एक छात्रा के साथ छेड़खानी की घटना के बाद बी.एच.यू की छात्राओं ने जिस तरह से जुझारू संगठित प्रतिरोध को जन्म दिया है वो एक मिसाल है।

*यह प्रतिरोध चढ्ढीधारी कुलपति और उसकी सरपरस्ती में पलने वाले लम्पटों के मुँह पर एक करारा तमाचा है जो छात्राओं के साथ होने वाली बदसलूकियों के लिए छात्राओं को ही ‘‘संस्कार’’ और ‘‘चरित्र’’ का पाठ पढ़ाते हैं।*

वास्तव में छात्राओं का फूट पड़ा ये आक्रोश गुण्डागर्दी-लम्पटई व प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ़ अरसे से इकट्ठा हुये गुस्से की अभिव्यक्ति है। बी.एच.यू. में यौन हिंसा और महिला विरोधी अपराधों को आलम यह है कि एक लड़की का रेप होता है और प्रशासन अपराधियों पर कार्यवाही करने के बजाय लड़की को ही मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर देता है। जब ‘नवीन गर्ल्स हॉस्टल’ की लड़कियाँ हॉस्टल की खिड़कियों के सामने खड़े लम्पट लड़कों की गन्दी हरकतों की शिकायत करती हैं तो वार्डन महोदया कहती हैं कि खिड़कियाँ बन्द कर लो।

एक अन्य शिकायत पर प्रॉक्टोरियल बोर्ड का एक कर्मचारी छात्रा से कहता है कि-‘आप हॉस्टल जायेंगी या रेप होने का इंतजार करेंगी।’

अब जब छात्राओं ने आन्दोलन का रास्ता पकड़ा तो सनातनी मूल्यों का ठेकेदार बना बी.एच.यू प्रशासन, वी.सी. के नेतृत्व में प्रॉक्टोरियल बोर्ड, मनुवादी छात्रों का गुण्डा गिरोह, सत्ता के तलवाचाट अखबार व चैनलों की झूठी रिपोर्टिंग, ज़रूरत पड़ी तो पुलिस इस आन्दोलन को कुचलने के लिए तैयार है।

हमें इससे यह भी समझ लेना चाहिए कि हमें संगठित होने और इस आन्दोलन को सतत आगे ले जाने की ज़रूरत है। क्योंकि शासन-प्रशासन कभी भी हमारे साथ नहीं खड़ा होने वाला। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का जुमला फेंकने वाले जुमलेन्द्र बनारस में मौजूद थे। लेकिन इतनी बड़ी घटना पर चूँ तक नहीं किये।

स्त्रियों के उत्पीड़न की घटनाओं के खि़लाफ़ हमें संगठित होकर एक हाथ से पितृसत्ता का गर्दन दबोचना होगा दूसरे हाथ से मौजूदा व्यवस्था का, जो पितृसत्ता को निरन्तर खाद पानी देने का काम रहती है। हमें अपने आन्दोलन को सही दिशा देना होगा, संगठित होना होगा और स्त्री उत्पीड़न के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष को व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई से जोड़ देना होगा।

दिशा छात्र संगठन

स्त्री मुक्ति लीग

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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चोटी काटने वाली चुड़ैल नहीं बल्कि है ये कीड़ा,लोगों ने पकड़ा ऐसा कीड़ा जो काटता है बाल..देखें वीडियो

जालंधर: इस समय देश के कुछ राज्यों में चोटी काटने वाली चुड़ैल का खौफ छाया हुआ है। लोगों में इतनी दहशत है कि वह रात के समय घर से बाहर भी नहीं निकल रहे हैं। कुछ दिन पहले कुछ पुरुषों ने भी दावा किया कि चोटी काटने वाली चुड़ैल या गैंग ने अब लगेपुरुषों को भी बनाना शुरूकर दिया है। लोगों का कहना है कि रात के समय चुड़ैल आती है और चुपके से चोटी काटकर चली जातीहै और किसी को इसके बारे में पता ही नहीं चलता है। peak cutter insects.

लोग लेने लगे हैं तांत्रिकों का सहारा:

सुबह जागने पर उनकी चोटी कटी हुई मिलती है। लोगों में इसका इतना खौफ फैला हुआ है कि लोग अब इसके उपाय के लिए तांत्रिकों का भी सहारा लेने लगे हैं। कुछ लोग चुड़ैल से बचने के लिए अपने घरों के मुख्य दरवाजे पर मेहन्दी के छाप भी लगाने लगे हैं। हालांकि यह एक अफवाह मात्र ही है या ऐसा सच में हो रहा है, इसके बारे में अभी तक कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं। पुलिस भी इस गुत्थी को अब तक सुलझाने में नाकामयाब रही है।

इस कड़ी में एक नया खुलासा हुआ है, जिसके बारे में जानकर आप हैरान हो जायेंगे।हाल ही में देर रात शहर के पुरानी सब्जी मंडी में लोगों ने एक कीड़े को पकड़ा और दावा किया कि यह कीड़ा चोटी काटता है। कुछ लोग इस बात से काफी खुश है कि आखिर पता चल गया कि कौन चोटी काट रहा है। घटना की सुचना मिलते ही मौके पर पहुँचे थाना 2के एस. आई. बलविंदर सिंह के कीड़े को कब्जे में लेकर जाँच शुरू कर दी है।

कीड़ा पीठ पर चढ़कर जा रहा था बालों की तरफ:

मंडी में दूकानदार के पास काम करने वाले अखिलेश यादव का कहना है कि उसनें दोपहर में सोशल मीडिया पर देखा कि एक कीड़ा महिलाओं की चोटी काटता है।उसने बताया कि देर रात उसका साथी दुकान में काम करता है। वह उस दिन भी काम कर रहा था, तभी एक कीड़ा उसके पीठ पर चढ़कर उसके बालों की तरफ बढ़ रहा था। उसनें उस कीड़े को पहचान लिया, जो सोशल मीडिया पर दिख रहे कीड़े से मिलता जुलता था।

यह देखते ही उसनें झट से कीड़े को कुलदीप के पीठ से नीचे गिरा दिया। इसके बाद कीड़े को मारने के लिए उसनें उसके ऊपर ईंट से भी प्रहारकिया, लेकिन कीड़ा मरा नहीं। यह देखकर उसनें शोर मचाना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में वहाँ आस-पास के कई दूकानदार इकठ्ठा हो गए। सभी ने मिलकर कीड़े को पकड़कर एक प्लास्टिक के डिब्बे में डाला।

एस. आई. बलविंदर सिंह का कहना है कि कीड़े को हिरासत में लेकर वह जंगल विभाग के अधिकारीयों से इसके बारे में बात करेंगे और पता लगायेंगे कि क्या सच में यह कीड़ा बाल काट सकता है या नहीं? इससे पहले कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।

वीडियो-

https://1manatheist.files.wordpress.com/2017/08/hair_cutting_insect.3gp

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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Atheists in Muslim world: Silent, resentful and growing in number

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Photo by: Oded Balilty

BABYLON, Iraq — Lara Ahmed wears a headscarf and behaves like a pious Muslim.

But the 21-year-old Iraqi woman hides a secret from her peers at the University of Babylon: her atheism.

“I was not convinced by the creation story in the Quran,” she said. “Besides, I feel religions are unjust, violate our human rights and devalue women’s identities.”

She doesn’t dare share her strong beliefs with strangers.

“I wear a headscarf despite being an atheist,” said Ms. Ahmed, who studies biology at the school, about 115 miles south of Baghdad. “It is difficult not to wear it in southern Iraq. Few women take the risk not to cover their hair. They face harassment everywhere.”

Her fears stem from the remarks of powerful politicians such as Ammar al-Hakim, the head of Iraq’s Islamic Supreme Council, a major Shiite political party and the president of the National Alliance, a Shiite parliamentary bloc.

“Some are resentful of Iraqi society’s adherence to its religious constants and its connection to God Almighty,” Mr. al-Hakim said on his party’s TV channel in May, claiming a rising tide of atheism was threatening the Arab world. “Combat these foreign ideas.”

Statistics on atheism in the Middle East and North Africa are hazy, but analysts say Ms. Ahmed represents an increasing trend basedon recent developments.

In 2014, an Egyptian government-run Islamic legal institute, citing a dubious international study, said that only 866 atheists lived in the country of more than 90 million. Recently released court statistics saying thousands of Egyptian women sought divorce in 2015 claiming their husbands were atheists — one of the few ways women can initiate divorce under Islam — suggested the numbers might be far higher.

In 2011, the now-defunct Kurdish news agency AK news published a survey finding that 67 percent of Iraqis believed in God and 21 percent said God probably existed, while 7 percent said they did not believe in God and 4 percent said God probably did not exist.

Today, the information revolution fueled by the internet, the freedoms released by the Arab Spring, the growing power of sectarian religious parties and the rise of the harsh orthodoxy ofthe Islamic State have all fueled growing unbelief in God and traditional religions, said atheists and others.

“For youths, who are the majority of new atheists, the savagery of the Islamic caliphate established by the Islamic State of Iraq and Syria in 2014 created a reaction that [has] shaken the religion’s image,” said Ali Abdul kareem Majeed, 22, a non atheist Iraqi sociology student who conducted a study on atheism for a religious body that he asked not to be identified for his safety.

Social Media Shutdown

Last year, Facebook shut down more than 50 atheist, Arabic-language pages in after extremist Muslim groups campaigned to remove them, according to a petition sent to Facebook by the Atheist Alliance-Middle East and North Africa, a U.S.-based global atheist federation.

Many of those Facebook pages have been since been relaunched.

In March 2015, U.S.-based Iraqi and other Arab atheists launched the Arabic and English-language Free Mind television and magazine websites, which promote atheistic view points and have recorded more than 1 million visits so far.

That led scholars at Al-Azhar University, a pre-eminent Sunni Muslim center of learning in Cairo, to call on Egyptian President Abdel Fattahel-Sissi to push Free Mind organizers to repent or face execution by beheading. Mr. el-Sissi responded by suggesting that those who insulted religion should lose their Egyptian citizenship.

Even so, online atheist programming is easily available in Arabic now.

Atheism is not illegal in Egypt or Iraq, but officials often level blasphemy or other charges against atheists in those countries. Those rejecting the faith face the death sentence in Saudi Arabia, Iran, theUnited Arab Emirates, Qatar, Yemen, Somalia, Sudan and Mauritania.

Many atheists in the region say their bigger fear is not being punished for their beliefs but that they will become targets of violent sectarian groups seeking political support from the faithful.

“It is a distraction from the fact that Islamists were not able to accomplish anything over the past 13 years,” said Faisal al-Mutar, a U.S.-based Iraqi human rights activist who heads Ideas Beyond Borders,a nonprofit that supports minorities in the Middle East. “So they want to create ‘anenemy’ to keep [the] constituency united against and avoid being held accountable for their mistakes.”

Keeping their beliefs secret is the norm for atheists of all backgrounds throughout the region.

In Jordan, an Amman-based writer at the Free Mind Magazine — whose last name is Farouki but who asked to keep her first name secret — said she is nearly estranged from her family, angered by her rebellion against religion. “They see me as insane,” said Farouki, 50.

“Jordanians can not accept atheists, and it is highly possible to be killed if you are one.”

Social media has provided atheists with a meeting place and source of information.

“Most of my atheist friends have not changed all of a sudden,” said Osama Dakhel, 21, a fine arts student in Baghdad. “Some were so devoted at first exploring the religion’s minute details. They start to read for Islamic reformers. Then they start to accept other opinions, discuss atheists online and end up atheists.”

Ahmed Abdul-Aziz, 22,a medical student in upper Egypt, also writes openly for the Free Mind Magazine on atheism. “It is easier to announce your ideas in Cairo,” he said. “Nobody would look after you, but in small rural towns, everyone watches the other.”

Even so, Mr. Abdul-Aziz said, he hides his beliefs from his own family.

“They will feel angry even modern Islamic ideas,”he said. “I am forced to attend the Friday prayers and fast during Ramadan. I feel uneasy to practice things I do not believe in.”

Ms. Ahmed paid a price for unwittingly drawing notice for not praying or fasting during Ramadan at the University of Babylon. “A colleague called me an ‘infidel’ and insisted on waking me up at dawn to pray,” she said. “I faced problems even for not using the name of Allah to swear.”

Source : The Washington Times, LLC

Brought To You By : Sikandar Kumar Mehta

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The little girl has been dead for 96 years. But then she opens her eyes

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In Palermo, Sicily, there’s a 100-year-old cloister built by Capuchin monks that’s famous for its crypt, filled with 2,000 mummies. Stored in a glass sarcophagus is one very particular person who found her final resting place there, a little girl.

Rosalia Lombardo was just two years old when she died of pneumonia in 1920. Her father, an Italian military officer named Mario Lombardo, almost died of grief after his little girl was taken away. Then he decided to do something that would preserve the beautiful child he loved so much: he commissioned an embalmer called Alfredo Salafia to prepare his daughter’s body. This involved replacing her bodily fluids with formaldehyde and treating the corpse with alcohol. The result is astonishing.

Watch the strange phenomenon for yourself in slow motion Watch Video

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The toddler with sweet blond locks and a peaceful look seems like she might have just dozed off and could wake up at any moment, despite having died nearly 100 years ago. And this body has a creepy secret that’s made quite a few people wonder if it’s really dead or not.

Numerous visitors have witnessed what should be impossible: Rosalia opens and closes her eyes!

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Experts explain that it’s caused by an optical illusion from light and her already slightly open eyelids. But when you see it, you’ll get goosebumps just as generations of other visitors have.

Rosalia Lombardo, the sleeping beauty of the crypt, is one of the best preserved mummies on Earth and has fascinated people from all over the world. This little girl’s legend may just survive for another hundred years…

Brought To You By : Sikandar Kumar Mehta

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