[कविता] : धर्म

Follow Tweets by @1manatheist नफरत हिंसा द्वेष घृणा का ढूंढा तो आधार धर्म । जितना खून बहा है जग में उसका भी आधार धर्म । विश्व विवादों की जा जड़ में देखा तो आधार धर्म । भूख गरीबी और शोषण का इनका भी आधार धर्म । आतंकवाद का पहन के चोला करता नरसंहार धर्म । …

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[कविता]: ना भगवान दिखा ना अल्लाह

ना भगवान दिखा ना अल्लाह Follow Tweets by @1manatheist मंदिर देखा मस्जिद देखा देखा हर गल्ली मोहल्ला ना भगवान दिखा ना अल्ला ना भगवान दिखा ना अल्ला बह रहा था दूध कहाँ चदर कही बिछा था घी से भरी रोटी पड़ी थी बाहर भूखा, रोता बच्चा था बाहर भीक माँगती भिकारन अंदर, बिना माँगे भरा …

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[कविता] – बन्दर बने रहें

Follow Tweets by @1manatheistं हम बंदरो की जात हैं, बन्दर बने रहें। अच्छा हो अपनी खाल के अन्दर बने रहें। बन्दर की जान जान है, हर जान की तरह। बन्दर का खून गरम है, इन्सान की तरह। बाहें वही, सीना वही, सिर में वही दिमाग। बन्दर की आन बान है, हनुमान की तरह। हर दिल …

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नयी दुनिया के नए खुदा, तेरी जय हो – बलदेव राज दावर

यहाँ मैं Baldev Raj Dawar (उनका परिचय अंत में दिया है) की एक बहुत ही ज्ञानवर्धक रचना पोस्ट कर रहा हूँ. प्लीज् अवश्य पढ़ें. आज उनका 85वां जन्मदिन भी है. इस उम्र में भी वे वैज्ञानिक सोच के प्रचार-प्रसार में बहुत सक्रिय हैं. सर, जन्मदिन बहुत-बहुत मुबारक हो !!! ---------------------------------------------------- ~ नयी दुनिया के नए …

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समाज से शिकायत

शिकायत है मुझे उस समाज से, अंधविश्वास में जीते हर उस इन्सान से, दिल में बसे उनके मंद – बुद्धि जज़्बात से… कहते हैं वो, पुरखों से चली आई परम्परागत विद्या,ये महान है। करेंगे सब कुछ इसे ही मानते वो अपनी आन हैं,सत्य से ना जाने, वो क्यों अंजान हैं, मेरी नज़रों में, ये मूर्खता …

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Yes,I’m an atheistं

हाँ मैं नास्तिक हूँ नहीं बजाती रोज़ मंदिरों की घंटियाँ ना ही जलाती हूँ आस का दीपक नहीं देती ईश्वर को दुखों की दुहाई ना ही करती हूँ क्षणिक सुखों की कामना नहीं चढ़ाती जल फूल फल मेवा ना ही जपती हूँ आस्था के मनके की माला हाँ मैं दूर बैठ मांगती हूँ अपने कर्मों …

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विरह-वेदना

सिकन्दर कुमार मेहता न जाने अब भी मुझे तू क्यों याद आती है, तुझसे बिछड़े तो हो गए बरषों । उस विरह की वेदना आज भी मुझे सताती है, न जाने अब भी मुझे तू क्यों याद आती है ॥ पास होता तो दूर जाने की कोशिश करती, दूर हूँ तो तू क्यूं तड़पती । …

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