गाय के बछड़े का गला काटते रंगे हाथ पकड़े गए दीक्षित बंधु, दंगा होते-होते बचा

गाय के नाम पर पूरे भारत में गौआतंकी निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं…

लखनऊ। गाय के नाम पर पूरे भारत में गौआतंकी निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले का जो मामला सामने आया है उससे पोल खुल गई है कि इस गौआतंक के पीछे किनका हाथ है।

हमने जब गोण्डापुलिस से ट्विटर पर घटना की जानकारी चाही, तो उत्तर मिला –

“इस प्रकरण में अभियुक्तों के खिलाफ धारा 295A,153A, 505b भादवि व 3/8 गोवध निवारण अधिनियम अभियोग पंजीकृत कर माननीय न्यायालय रवाना किया गया।”

शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने फेसबुक पेज पर कुछ चित्र शेयर किए हैं। पूरे घटनाक्रम को उन्होंने इसतरह बयाँ किया है –

रामसेवक दीक्षित, और मंगल दीक्षित ने गॉंव के ही गणेश प्रसाद का बछडा खोलकर उसका गला काट दिया, एक चश्मदीद हिंदू भाई ने इसे देखकर 100 नम्बर डायल कर दिया, संयोग से पुलिस वैन थोडी दूर से गुज़र रही थी, पुलिस ने रंगे हाथ रामसेवक दीक्षित को ख़ून लगे चाकू और काटे गये बछडे के साथ गिरफ़्तार कर लिया!

घटना गोंडा के थाना कटरा बाज़ार के गॉंव देवा पसिया भटपुरवा की है, 1 October रात 12 बजे घटी इस घटना ने पुलिस की सूझबूझ से गोंडा को जलने से बचा लिया !

एडिश्नल SP गोंडा ने गिरफ्तार रामसेवक और मंगल दीक्षित पर रासुका की कार्यवाई करने का आश्वासन दिया है !!

दशहरा, दुर्गापूजा, मुहर्रम, गॉंधी जयंती जैसे महत्वपूर्ण त्यौहारों से तनाव तनाव से गुज़र रहे समाज के लिये ये घटना कितनी भयावह हो सकती थी, अगर असली गुनहगार मौके से ना पकडे जाते तो आप अंदाज़ा लगाइये कि इल्ज़ाम मुललमानों पर जाता और शायद दंगा भी भडक सकता था !

दोस्त जैसे भाई मसूद आलम ने पूरी घटना की जानकारी दी है और तस्वीरें भी भेजी हैं, कुछ तस्वीरें आपसे साझा कर रहा हूँ ! इस घटना की गहराई से जॉंच हो तो शायद कुछ बडे साज़िशकर्ताओं के नाम आयेंगे !

शुक्रिया पुलिस प्रशासन गोंडा

आप लोग भी अपने अपने इलाक़ों में, गॉंवों में सतर्क रहिये, आसपास नज़र रखिये, क्योंकि समाज को जलाने और तोडने की कोशिश वाले गद्दार आपके आसपास ही छुपे हैं !

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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अन्धविश्वास : समाज में घुलता एक जहर

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भारत के गौरवशाली इतिहास में यहाँ की मान्यताओं का भी एक विशेष स्थान रहा है. यह अपने रीति –रिवाज और परम्पराओं के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता रहा है. पहले ये मान्यताएं हमारे हित में हमारे बड़ों द्वारा बनायीं गयी थीं,जो वैज्ञानिक आधार पर भी खरी उतरती थीं. जैसे…भोर की बेला में नहा धोकर तुलसी व् सूर्य को जल अर्पण करना. यहाँ तुलसी एक औषधि के रूप में कारगर है तथा उगते सूरज की किरणों से हमारे शरीर को विटामिन डी मिलता है. ऐसी ही अनेक रीतियाँ हमारे भले के लिए हमारे बुजुर्गों द्वारा बनायीं गई थीं, जिन्होंने आगे चलकर परम्पराओं का रूप ले लिया. लेकिन इन परम्पराओं में किसी दकियानूसी सोच के जुड़ जाने से कुछ गलत परम्पराएँ भी बन गयीं. जिन्हें हम रूढ़िवादिता या अन्धविश्वास कहते हैं.

तो जिन रीति रिवाजों से समाज में किसी का अहित होता हो वे अन्धविश्वास कहलाती हैं. मसलन विधवा स्त्री का किसी शुभ कार्य में शामिल होना अपशकुन माना जाना, या स्त्री का अपने पति की मौत पर सती के रूप में उसके साथ जिंदा जल जाना आदि. ऐसे अनेक कृत्य जो मानवता को तार तार करते हैं आज भी हमारे समाज में प्रचलित हैं. हांलाकि समय समय पर किसी न किसी समाज सुधारक द्वारा इन गलत मान्यताओं को सिरे से नाकारा गया है व् उनके खिलाफ आवाज भी बुलंद की गई है. फिर भी अपने स्वार्थ व् लालच के वशीभूत होकर कुछ लोग आज भी इन मान्यताओं और धर्म के नाम पर भोली भाली जनता को ठगने से बाज नहीं आते हैं. आज के दौर में जहाँ एक तरफ प्रौद्योगिकी व् तकनीकी विकास तेजी से हुआ है वहीँ दूसरी तरफ इन ढोंगी बाबाओं, अघोरियों, तांत्रिकों, पंडितों, ज्योतिषियों, अंकशास्त्रियों आदि काकारोबार भी लाखों, करोड़ों, अरबो, खरबों की शक्ल में फ़ैल चुका है. मजे की बात यह है कि,इन अंधविश्वासों में जकड़े लोग किसी वर्ग विशेष से संबंधित नहीं हैं. चाहे अमीर हो या गरीब, चाहे पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, नौकरीपेशा हो या कोई नेता अभिनेता. सभी इन बाबाओं के मकडजाल में उलझे हैं.

नित नए बढ़ते चैनलों में भी मीडिया द्वारा लगातार ऐसे बाबाओं के प्रवचन व् प्रोग्राम रात दिन दिखाए जाते हैं, जो साफ़ साफ़ आडम्बरयुक्त नजर आते हैं. ये भक्तों के नाम पर सिर्फ अपने व्यापारिक ग्राहकों की संख्या बढ़ाते हैं. निकम्में, बेकार, मनमौजी व् आलसी व्यक्ति के पास एक यही बेहतर विकल्प होता है कि, बाबा बन कर लोगों को ठगा जाय. ये वो व्यापार है जिसमे कोई रिस्क नहीं होता, और ना ही रुपयों का कोई बड़ा इन्वेस्टमेंट. भक्तों से मिले दान व् चढ़ावे से इनकी रोजी रोटी चलती है और एक दिन इसी की बदौलत ये ख्यात बाबाजी का चोला धारण कर लोगों पर बड़ी आसानी से राज करते हैं. आलीशान गाड़ियों और बड़े बड़े आश्रमों के मालिक ये बाबा जल्द ही अपनी ताकत के बल पर सिद्ध पुरुष या किसी भगवान् का अवतार बन जाते हैं. और भोली भाली जनता इन्हें पूजकर अपने आपको धन्य मानती है.
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इन बातों का ये मतलब कतई नहीं है कि आज के सभी संत महात्मा ऐसे ही ठग हैं. परन्तु संतों की जमात में ६०-७०% तक ऐसे ही लोग शामिल हैं. जो आमजन की परेशानियों व् तकलीफों की आंच पर अपने मतलब की रोटी सेंकने से बाज नहीं आते.

आजकल इंटरनेट के उपयोग में भी हमें इन अंधविश्वासों की झलक आसानी से देखने को मिल जाती है. उदाहरण के तौर पर फेसबुक और व्हाट्सअप  पर ऐसे सैकड़ों सन्देश रोजाना पोस्ट होते हैं जिनमे लिखा रहता है, तुरंत लाइक करें, नकारें नहीं. शाम तक कोई गुड न्यूज मिलेगी. या फिर ये मैसेज पढने के १५ सेकंड के भीतर ९ लोगों को सेंड करें, चमत्कार होगा. और फिर शाम तक ऐसी पोस्ट को लाखों लाइक मिल चुके होते हैं.

इसी तरह का एक वाकया मेरे साथ हुआ. अभी कुछ दिन पहले एक भाभीजी का व्हाट्सअप पर मैसेज आया, जिसमे एक विशाल पेड़ के अन्दर गणेश जी दिखाई दे रहे थे. लिखा था, ये फोटो तीन ग्रुप में सेंड करें. फोटो देखकर साफ़ लग रहा था कि ये ट्रिक फोटोग्राफी का कमाल है.जब कब उन भाभी जी के ऐसे ही मैसेज आते रहते थे. मैं परेशान हो चुकी थी. उस दिन मैंने कुछ हिम्मत जुटाकर उन्हें मैसेज किया कि मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करती, कृपया आगे से मुझे ऐसे मैसेज न भेजें. फिर तो जैसे मेरी शामत आ गई. जवाब में तुरंत उन भाभी जी का फ़ोन आया, जिस पर उन्होंने मुझे खूब खरी खोटी सुनाई कि ज्यादा पढ़े लिखे होने से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी तुम हिन्दू देवता का अपमान कर रही हो. मेरे लाख समझाने पर भी उन्होंने मुझे जी भर कोसा.

आज समाज में ऐसे कई उदाहरण रोजाना ही हमें देखने को मिलते हैं. क्या हम आशाराम बापू के घिनौने कृत्यों से वाकिफ़ नहीं हैं? फिर भी अंधभक्ति में जुटे कई लोगों को आज भी वे ईश्वरतुल्य नजर आते हैं. ये उजले वस्त्रधारी किन-किन संगीन गुनाहों में लिप्त हैं, ये कोई नहीं जानता या तो जानकर भी अपने फ़ायदे के लिए अनजान बना रहता है.

आज वक्त आ चुका है कि हम अपनी आधुनिकता का सही मायने में उपयोग कर समाज को इस गोरखधंधे से मुक्त करवायें. परम्पराओं और रूढ़िवादिता में अंतर समझें. विश्वास और अन्धविश्वास के बीच का महीन फ़र्क पहचानें. तभी हम अपने देश को दुनिया में आगे की पंक्ति में खड़ा कर पाएंगे.

— पूनम पाठक ‘पलक’

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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Why I Hate Vivekananda : 17 Castiest Quotes of Vivekananda

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Vivekananda’s ”Ideological” Yatra

1. I do not propose any levelling of castes. Caste is a very good thing. Caste is the plan we want to follow.

2. The plan in India is to make everybody a Brahmin, the Brahmin being the ideal of humanity.

3.  Indian caste is better than the caste which prevails in Europe or America.

→ Which caste system prevails in Europe or America Mr. Vivekananda? Here he glorifies caste system in India!

4.  Where would you be if there were no caste? Where would be your learning and other things, if there were no caste? There would be nothing left for the Europeans to study if caste had never existed!

→ We would have been better off without caste, our situations would have been better. What learning so called caste system gave to Dalits? Caste system taught only discrimination.

→ Yeah, you guys invented caste system so that Europeans have something to study because poor Europeans didn’t have anything to study!

5. Caste should not go; but should only be readjusted occasionally. Within the old structure is to be found life enough for the building of two hundred thousand new ones. It is sheer nonsense to desire the abolition of caste.

6. Brainy Vivekananda suggested to lower castes that are fighting and writing against higher castes is of no use, learn Sanskrit and you problems will be solved! Sucha brainy was our Swami!

7. The Brahminhood is the ideal of humanity in India, as wonderfully put forward by Shankaracharya at the beginning of his commentary on the Gitâ, where he speaks about the reason for Krishna’s coming as a preacher for the preservation of Brahminhood, of Brahminness.

→  Dr. Ambedkar was against Brahminhood and Brahminism, which is a mentality of people that makes them to suppress and discriminate. Vivekananda supported Brahminism.

→ Yes, Vivekananda is against anyone fighting casteism, because fighting casteism is fighting against Brahmins, who are, of course, according to him, Gods on earth.

8. In India, even the lowest caste never does any hard work. They generally have an easy lot compared to the same class in other nations; and as to ploughing, they never do it.

→ Dalits and Shudras, in Vivekananda’s opinion, do no work. The fields plough themselves, by magic! And only hard work is done by Brahmins sitting in A.C. Temples and earning millions, sitting in A.C. is very tough work!

9. Why is India not a superpower? Of course, because we “abolished caste”: “Then what was the cause of India’s downfall? — The giving up of this idea of caste.As Gitâ says, with the extinction of caste the world will be destroyed. Now does it seem true that with the stoppage of these variations the world will be destroyed… Therefore what I have to tell you, my countrymen, is this: that India fell because you prevented and abolished caste… Let Jati have its sway; break down every barrier in the way of caste, and we shall rise.”

10. So what is the basis of the Indian’s social order? It is the caste law. I am born for the caste, I live for the caste. I donot mean myself, because, having joined an Order, we are outside. I mean those that live in civil society. Born in the caste, the whole life must be lived according to caste regulation.

11. Now look at Europe. When it succeeded in giving free scope to caste and took away most of the barriers that stood in the way of individuals, each developing his caste — Europe rose. In America, there is the best scope for caste (real Jati) to develop, and so the people are great.

→ Here Mr. Vivekananda again glorifies the caste system! First thing first, Mr. Vivekananda, there was/is no caste in western societies.

12. “As Manu says, all these privileges and honours are given to the Brahmin, because “with him is the treasury of virtue”. He must open that treasury and distribute its valuables to the world. It is true that he was the earliest preacher to the Indian races, he was the first to renounce everything in order to attain to the higher realisation of life before others could reach to the idea. It was not his fault that he marched ahead of the other caste. Why did not the other castes so understand and do as he did? Why did they sit down and be lazy, and let the Brahmins win the race?”

→ Vivekananda is a defender of Manu, the “great” law-giver, and blames the lower castes for their sorry lot. Is it surprising that most of the followers of the cult of Vivekananda are high caste Hindus?

13. The only safety, I tell you men who belong to the lower castes, the only way to raise your condition is to study Sanskrit, and this fighting and writing and frothing against the higher castes is in vain…

→ Vivekananda doesn’t want that Dalits write against their oppressors and he wants that Dalits keep on suffering silently! Lower castes fight is for equality and Sanskrit is a language of discrimination and it originated to maintain the caste discrimination. How learning Sanskrit will help lower castes get jobs, respectand dignity and how it will solve the problem of caste discrimination? I am not able to understand, can you?

14. To the non-Brahmin castes I say, wait, be not in a hurry. Do not seize every opportunity of fighting the Brahmin, because, as I have shown, you are suffering from your own fault.

15. Vivekananda blames lower castes for their suffering. Yeah, as if while studying, lower castes themselves poured lead in their own ears, cut their own tongue and plucked their own eyes after reading.

16. This Brahmin, the man of God, he who has known Brahman, the ideal man, the perfect man, must remain; he must not go.

→ Yes, Vivekananda is against anyone fighting casteism, because fighting casteism is fighting against Brahmins, who are, of course, according to him, Gods on earth.

17. This Brahmin, the man of God, he who has known Brahman, the ideal man, the perfect man, must remain; he must not go. And with all the defects of the caste now, we know that we must all be ready to give to the Brahmins this credit, that from them have come more men with real Brahminness in them than from all the other castes. That is true. That is the credit due to them from all the other castes.

References –

Swami Vivekananda, “The Abroad and the Problems at Home”, The Hindu, Madras, February 1987, in “Interviews”, The Complete Works of Swami Vivekananda,Volume 5.

Swami Vivekananda, in “The Future of India”, Delivered at Victoria Hall, Madras, in “Lectures from Colombo to Almora”, Complete Works of Swami Vivekananda, Volume 3.

Swami Vivekananda, in “Women of India”, Delivered at the Shakespeare Club House, in Pasadena, California, on January 18, 1900, in “Lectures and Discourses”, Complete Works of Swami Vivekananda, Volume 8.

Swami Vivekananda, in “A Plan of Work for India”, in “Writings: Prose”, The Complete Works of Swami Vivekananda, Volume 4.

Credit : nastiknation.org

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Why Millennial Women Are Embracing Atheism

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Danielle Schacter never thought she would become an un-Christian. “I slowly became more and more disgusted by the way I saw people treating others,” says the 32-year-old, who was raised Baptist. “I didn’t want to be associated with a religion that preached so much hate.”

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Danielle Schacter, who identifies as agnostic, is one of a growing number of people who identify with no religion. Photo courtesy of Danielle Schacter.

Schacter, like so many millennials, has chosen a secular life, and she’s not alone: according to the Pew Research Center, only four in 10 millennials say that religion is very important to them, compared with six in 10 Baby Boomers.

The numbers of religiously unaffiliated support this, too : 23 percent of the population identifies with no religion. This number is up from 2007, when it was only 16 percent.Of older millennials, 35 percent are religiously unaffiliated— and they’re driving the overall growth of the nonreligiously affiliated in America.

“I didn’t want to be associated with a religion that preached so much hate.”

This is a big deal. To be religiously unaffiliated means you not only avoid identifying as a Christian or Jew or Muslim, but that you eschew organized faith altogether. From there,”nonreligious” can be broken down into four categories: secularism (the belief in separation of church and state and that all beliefs are equal), agnosticism (the belief that it’s impossible to know if there is a god), humanism (the idea that human reason drives us, not higher powers), and atheism (the belief that there is no god). This last group,the atheists, has become increasingly vocal in recent years. They are fighting to keep religion separated from laws that affect them and to shift society away from religious trappings.

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Kayley Whalen, a queer transgender Latinx woman who identifies as “a humanist and an existentialist and an atheist.” Photo courtesy of Kayley Whalen.

What’s fascinating is that while millennials are moving away from religion, they are moving toward spirituality. This demographic considers itself just as spiritual as older demographics, even as they represent an exodus out of organized religion and into the throes of secularism. When you consider the issues facing young people today, the reasons for the exodus are easy to understand. In rejecting religion, millennials are asserting their progressive attitudes and passion for social justice. They’re committed to the idea that they don’t need religion to know the difference between right and wrong.

Perhaps no one represents this cultural shift better than millennial atheist women. While they may sit at the most extreme side of the nonreligious spectrum, atheist women are fueled by the same concerns plaguing millennials in general: a quest for independence and a rejection of the status quo.

The Atheism and Feminism Connection

Lauryn Seering, 27, has never been religious, but she found atheism in high school in reaction to mainstream fundamentalist Christian ideas that condemn her lesbian mother. “Millennial women want autonomy over their own bodies,” says Seering, communications coordinator for the Freedom From Religion Foundation, which is dedicated to protecting the separation of church and state.

“They recognize that all the arguments against this autonomy (contraception, birth control, marriage) are religiously fueled,” Seering continued.”Women aren’t being pressured by society anymore to get married at a young age, have children right away, and tend house while their husbands work.”

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Lauryn Seering, an atheist who works for the Freedom From Religion Foundation. Photo courtesy of Lauryn Seering.

Schacter identifies as agnostic. She’s based in Kansas City, MO, where she founded a digital marketing agency called Boxer & Mutt. To her, growing secularism is a sign of independent women. “It’s becoming more socially acceptable for women to think for themselves and really question why things are the way they are rather than blindly accepting them,” she says.

Kayley Whalen, 31, is a queer transgender Latinx woman who identifies as “a humanist and an existentialist and an atheist.” These different identities certainly influence how she approaches the world.

“We have ethical values without the need for the supernatural,”

Whalen says. “We believe in social justice,that we can live a life with meaning, purpose,and dedication to social justice without the need for supernatural guidance.”
Unsurprisingly, Whalen’s beliefs are tied up in her activist work: she’s the digital strategy and social media manager for the National LGBT Task Force and is on the board of directors for both the Secular Students Allians and the Trans United Fund.

As Whalen epitomizes, many young women who do not believe in God share a point of view that goes beyond just being atheist or just being a woman. The two are intertwined identities oppressed similarly in the United States.

“We have ethical values without the need for the supernatural.”

Lee Blackwolf, who runsthe popular Facebook Page Black Atheists, constantly copes with this intersection. “It’s important to me because, as a black bisexual woman, there’s not many of us who are atheist,” explains Blackwolf, a 29-year-old stay-at-home mother in Twinsburg, OH. “We’re not welcomed in most spaces that are atheists. We already have a lot of hurdles to jump through in life so it takes a lot of strength. I lost an entire family because of it. I actually have the luxury to say that I’m better off without them. It’s not the same for most.”

Blackwolf’s concerns hint at societal assumptions about atheist women, which every woman we spoke with touched on: being a woman who isn’t religious breaks away from the social norms that frame femininity. Emily Greene, an artist and activist working in promotional marketing in Augusta, summed it up best. “You’re probably seen as less feminine,” the 32-year-old said. “You’re definitely judged, looked at more harshly.It’s an assumption that it’s a negative thing.”

Ironically, being atheist can mirror being religious, as it plays a role in many aspects of young life. “That was very important to me inchoosing a partner,” says Katherine, a 32-year-old HR manager in California.”I have gotten into some debate with friends before where they’re like, ‘If you’re an atheist, why do you care if the other person is of faith?’ I’m like, ‘You— as, say, a Christian person — would not want to marry a non-Christian person.”

Why Are Young Women Interested in Atheism?

Phil Zuckerman, professor of sociology and secular studies at Pitzer College, believes that young people are turning away from religion as a result of how closed-minded andconservative many congregations can be, particularly when they are responsible for enabling xenophobic and queerphobic mindsets. For instance, many churches reject the idea of same-sex marriage, while 71 percent of millennials support it (in comparison with only 46 percent of Baby Boomers).

“A lot of young people are being turned off of by that brand of Christianity,” he explains. “They’re just seeing religion as an institution and saying, ‘Ah, screw it.’ Even though that brand of Christianity is not the majority — most Christians are decent, kind people who aren’t anti-gay and aren’t racist and aren’t anti-Islamic. But they don’t make the headlines. They’re not dominating the news.”

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Emily Greene, an artist, activist, and atheist. Photo courtesy of Emily Greene.

The internet is also serving as a conduit for less religion. As technology occupies more of our time, says Zuckerman, it chips away at “religion’s ability to maintain a monopoly on truth . . . It’s really corroding religion’s ability to dominate our culture and dominate people’s lives.”

While there have always been religious skeptics — the farthest back is believed to be the Charvaka movement in 7th century BC — the present shift away from religion is notable because the numbers of religiously unaffiliated and atheists are way up. Although the movement is still predominately male and white, more women are stepping forward as religion reveals itself to be optional in their lives —and sometimes to stand in the way of their independence.

Zuckerman believes this has to do with traditional organized religions’ male-centrism: teaching women that they’re second class, must remain virginal, and must stay out of leadership positions. Pair this with the amount of women in the workplace rivaling men, and the group doesn’t need to turn to a church for social or financial support that churches typically offer.

Being an Atheist Is a Political Act

Molly Hanson grew up in a Catholic household but has always been skeptical of the”invisible man in the sky” who tells people what to do. The 23-year-old Hanson, like many atheists, finds that questioning faith and religion makes people wonder ifsomething is wrong with her womanness.”

If a woman doesn’t bow down to this god and lord, she must have an issue with that god or lord,” says Hanson, an editorial assistant at the Freedom For Religion Foundation. “She must have been damaged. There’s a reason why she decided to leave that god. She might have been morally corrupted by another man or might have — I don’t know — been wronged.”

This issue isn’t confinedto religious communities. One woman — a 30-year-oldIndian American writer in New York who declined to give her name — finds this flaw in atheist leaders, too.

“The movement itself is really alienating toward women,” she says.”Leaders like Richard Dawkins are pretty sexist and condescending and talkdown to women. Women have been left out in those major discussions of atheism.”

The nonreligious believe that, once the church is taken out of the state, equality can be achieved.

Whalen agrees: “It’s really difficult that one person like a Richard Dawkins or a Bill Maher can be seen as the face of atheism. The difference between a woman who is an atheist, and a male, cisgender atheist is that a woman doesn’t have the choice to be a single issue. She can’t say, ‘Oh, religious discrimination is the most important thing —and being a woman comes second.'”

For women who are atheists, discrimination is complicated further by the many ways their identities intersect. Gender as it relates to religious affiliation is complex, and it’s even more complicated as it relates to black female atheists, as Blackwolf can attest. “A lot of black atheist men are often heard saying, ‘Black women sure do love them some church!'” she says.”When we start having adiscussion, there are implications about where my place in the community should be, and that’s behind the man.”

Atheist Women Want a Future of Equality

In speaking with young atheist and secular women, some through lines appear, among them a hope for equality that could be stymied by religion’s grasp on society. There is a desire to normalize differing points of view, from LGBTQ people to atheists.

Katherine sees public events like the inauguration of President Donald Trump as a perfect example. “I was really struck by so much praying happening,” she says. “I’d like to seeus move kind of away from that and use logic and science and that holistic definition of freedom.”

The nonreligious believe that, once the church is taken out of the state, equality can be achieved. Hanson believes these roadblocks arise as the result of unequal representation.”Women understand what it’s like to be oppressed by laws that are rooted in religious ideas that oppress women and their sexuality,” she explains.”To get more women in government positions is going to be a challenge,especially right now.”

When women hold elected office, it inspires more women to run— and more women in government has a powerful trickle-down effect on women as a whole.

But what if these women leaders were atheists? Would they still succeed?

Surveys have shown that atheism is ine of the traits in a leader that Americans are most biased against. “I cannot imagine a president who identifies as an atheist,”says the Indian-American writer in New York. “I’m a woman anda person of color: a female person of color who is an atheist could never be the president of the United States. It feels like another barrier.”

Others, like Whalen, see these many layers as vital to change: “I want a woman politician to run and say that she’s an atheist and that she’s for reproductive justice, that she’s for transgender rights, and win. I want a transgender woman to be able to do that.”

Ultimately, for atheist women (and atheists in general) to succeed at changing society, they need to continue on the path they are on and not settle for being silenced. Zuckerman draws parallels to the LGBT community.”Coming out does have an effect,” he says.”More and more people feeling comfortable saying ‘I’m not that religious’ has an effect.”Atheists just want to be seen as starting from the same place as any other decent American.

Greene sums it up nicely: “We want to get up, go to work, and enjoy our friends and families and our lifestyles just the same way as the person who gets up on Sunday and goes to church. We have our own ways of self-care. A lot of people find religion and that’s how they take care of themselves — and that’s great. We just do things a different way and that’s OK.”

Source : popsugar.com

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A Brief History Of Priestly Rage

The priests who denounced the Bengal CM as a ‘beef-supporter’ have forgotten that their forebears had welcomed ‘beef-eater’ Lord Mountbatten

A. K. Biswas

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History stands witness to the twists and turns of pol­itical fortune the Puri Jagannath temple has been embroiled in over the centuries. The protests voiced recently against West Bengal chief minister Mamata Banerjee’s entry into the temple to offer puja is in line with the politics the servitors of the deity have always dabbled in. Pre-Mughal Muslim rulers introduced pilgrimtax in India. Emperor Akbar abolished it and Shah Jahan continued this liberal policy. Aurangzeb, however, went back to levying it. Interestingly, the tax continued to be extracted by the Hindu Peshwas who ruled Orissa in the 18th century. Later, the East India Company actually systematised it: a regulation was passed in 1806, classifying pilgrims into four categories, with tax rates varying from Rs 2 to Rs 10 per head. Some Bengali zamindars were known to have visited Puri with a retinue of 2,000 men by paying pilgrim tax.

It was in September 1803 that Wellesley’s army took Orissa—in 14 days flat, without even a shot being fired or a drop of bloodshed. The army marched right up to the outskirts of Puri and camped at Pipili, four miles off the temple town. A delegation of high priests from Puri called on the commanding officer of the victorious army in his camp. Swami Dharma Teertha (1893-1978), whose pre-ascetic name was Parameswara Menon, wrote in History of Hindu Imperial­ism(1941): “The oracle of the Puri Jagannath Temple proclaimed that it was the desire of the deity that the temple too should be controlled by the Company, and the latter under took to maintain the temple buildings, pay the Brahmans and do everything for the service of the deity as was customary.” In the very first year, the institution yielded a net profit to the Company of Rs 1,35,000, the swami wrote. Puri was not the only temple town under the British tax net. The Company earned tax of some two to three lakhs from Gaya. Huge tax in flows also came in from other pilgrimage centres like Tirupati, Kashipur, Sarkara, Sambol etc—the net revenue amounted to anaverage to £75,000 and upwards annually.

By Regulation XI of 1809,the Company banned the entry of the Lolee (or Kasbee), Kalal (or Sunri), Machua, Namasudra (or Chandal), Gazur, Bagdi, Jogi (or Narbaf), Kahar Bauri (or Dulia), Rajbansi, Pirali, Chamar, Dom, Pan, Tior, Bhuimali and Hari castes or sub-castes into the Jagannath temple. The Piralis, considered degraded Brahmins, was the lineage into which Rabindranath Tagore was born. In 1810, the ban against Piralis was revoked. This exercise—the exclusion of many and inclusion of some—was guided by the political wisdom of the priests. The pecuniary gains of the Company, the priests and others concerned were phenomenal. Official reports disclosed that, during the period 1806-32, pilgrim tax collected grossed at Rs 24,57,655 whereas expenditure stood at Rs 12,36,034. The Company treasury swelled during this period by Rs 12,16,174, as quoted in Col Laurie’s article ‘Puri and the Temple of Jagannath’ in The Calcutta Review, September 1848. The average annual gross tax collection aggregated at Rs 1,11,711 and expenditure at Rs 56,183. In Orissa Vol 1(1872), William Hunter wrote that “not less than 20,000 men, women and children live directly or indirectly, by service of Lord Jagannath”. No contemporary industrial establishment, either on the west or east of the Atlantic, perhaps boasted such a large population dependent on a single institution for subsistence.

The Company shared a portion of the pilgrim tax with some stake holders. Ten per cent of the gross tax collected from pilgrims of Gaya (Rs 26,078) was paid to the Maharaja of Tekari, who had jurisdiction over the Vishnupad temple, wrote James Peggs in Pilgrim Tax in India (1830). The favour was returned in kind too. On the outbreak of the 1857 revolt in Bihar, a delegation of priests from Vishnupad temple waited on the Gaya district magistrate, Alonzo Money, and offered of 3,000 lathials (club-men) who would defend the Englishmen, their families, treasuries and government properties in that engulfing crises. Money immediately communicated the novel initiative to the Government of Bengal, Calcutta. Dabbling in politics, thus, has hardly been an unknown phenomenon among temple priests in the country over the ages.

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Who’s In, Who’s Out ?

Ambedkar was denied entry into the Puri temple, while Lord Mountbatten was welcomed; Tagore’s clan too was barred entry during 1809-10

Madhu Dandavate, who was railway minister in the government headed by Morarji Desai and finance minister under V.P. Singh, while deposing before the Backward Classes Commission with B.P. Mandal as chairman, stated that Lord Mountbatten, accompanied by Dr B.R. Ambedkar, the Governor-General’s executive council member, visited the Jagannath temple once. The British Paramount was accordeda red carpet reception by the Jagannath temple, while Dr Ambedkar was denied entry.Was Mountbatten a vegetarian? Did he not prefer beef as his staple diet? Then what leg do they have to stand on, this section of the servants of Jagannath who denounced the West Bengal chief minister, who has only defended the freedom of dietary choice for the people of India?

(The writer is a retired IAS officer and former vice-chancellor, B.R. Ambedkar University, Muzaffarpur, Bihar.)

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पुजारियों की पैदावार – मीरा नन्दा

इस लेख में मीरा नंदा ने चर्चा की है कि किस तरह विश्‍वविद्यालय का दर्जा प्राप्‍त अनेक शिक्षा संस्‍थान पंडो, पुजारियों, कर्मकाण्डियों की पूरी जमात तैयार कर रहे हैं। ये लेख फ्रण्‍टलाइन पत्रिका में छपा था व इसका अनुवाद अमर नदीम ने किया।
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मानद विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त कई शैक्षिक संस्थान हिन्दू कर्मकाण्डों के खुदरा व्यापारियों के लिये आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ियों की भूमिका निभा रहे हैं। भारत में जो बाज़ार के लिये फ़ायदेमंद है वही देवताओं के लिये भी फ़ायदेमंद सिद्ध हो रहा है। भारतीय मध्यवर्ग अपनी भौतिक सम्पदा में वृद्धि के अनुपात में ही ‘पूजा’ और ‘होम’ में भी उत्तरोत्तर वृद्धि करना आवश्यक और अनिवार्य समझता है। हर वाहन की ख़रीद के साथ पूजा होती है; ठीक वैसे ही जैसे ज़मीन के छोटे से टुकड़े पर भी किसी निर्माण से पहले ‘भूमि-पूजन’ अनिवार्य होता है। और हर पूजा के साथ एक ज्योतिषाचार्य और एक वास्तुशास्त्री भी जुड़ा ही रहता है। और हर प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य और वास्तुशास्त्री को कम्प्यूटर चलाना  और अंग्रेज़ी बोलना तो आना ही चाहिये ताकि वह अपनी बातों को “वैज्ञानिक” ढंग से प्रस्तुत कर सके।
भारत के लगातार फलते-फूलते ‘देवताओं’  के बाज़ार को देख कर एक प्रश्न सहज ही दिमाग़ में आता है- ये मॉडर्न दिखने वाले पुजारी, ज्योतिषाचार्य, वास्तुशास्त्री, और अन्य कर्मकाण्डी दुकानदार आख़िर आ कहां से रहे हैं? सभी तरह के धार्मिक कर्मकाण्डों के लिये 21वीं सदी के हिन्दुओं की इस अनन्त मांग के लिये कर्मकाण्डी पुरोहितों की आपूर्त्ति  आख़िर होती कहां से है?

मानद विश्वविद्यालय हमेशा से ही पारम्परिक गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं से लेकर घरों, मन्दिरों, दफ़्तरों, दुकानों, और बड़े-बड़े कॉरपोरेट बोर्डरूमों और अनिवासी भारतीयों तक फैली इस भारतीय मध्यवर्गीय श्रँखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते रहे हैं। ये विश्वविद्यालय, जिनमें से अधिकांश करदाताओं के पैसे से चलते हैं, अपने डिप्लोमा और डिग्रियों के द्वारा सक्रिय रूप से हिन्दू पुरोहित-कर्म का एक आधुनिक सँस्करण तैयार कर रहे हैं और उसे मध्यवर्ग के लिये एक आर्थिक रूप से सुविधाजनक रोज़गार के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने माध्यमिक स्तर से आगे की शिक्षा में ज्योतिष और कर्मकाण्ड को सम्मिलित करने के 2001 के अपने एक कुख्यात निर्णय से पहले से ही मौजूद उन सँस्कृत संस्थाओं को एक नया जीवन-दान दे दिया जिन्हें विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त था। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चे की सरकार ने मानद विश्वविद्यालयों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया जो हिन्दू पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिये लगातार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक बना हुआ है। अब भाजपा चाहे अगले कई वर्षों तक भी राजनीतिक सत्ता से दूर रहे फिर भी सत्ता में रहते समय इसने जो संस्थागत ढांचा तैयार कर दिया था वह परम्परागत हिन्दू ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के इसके उद्देश्य की पूर्ति करता रहेगा।

2001 में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा में ज्योतिष शास्त्र को शामिल करने का निर्णय लिया तब तक अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड सम्बन्धी पाठ्यक्रम के लिये जाने माने तीन अखिल भारतीय संस्थानों को मानद विश्वविद्यालय की मान्यता मिल चुकी थी। वे संस्थान हैं- श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,तिरुपति, और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार।

इन संस्थानों की विशेषज्ञता शास्त्रीय ज्ञान के बारे में है जिसमें ज्योतिष, पौरोहित्य और योग के उच्चतर पाठ्यक्रम भी शामिल हैं- वेद-वेदांग के नियमित पाठ्यक्रम के एक भाग और विशिष्ट डिप्लोमा या सर्टीफ़िकेट पाठ्यक्रमों के रूप में भी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (और तदोपरान्त उच्चतम न्यायालय) द्वारा ज्योतिष पाठ्यक्रम को हरी झण्डी दिखाये जाने के बाद से इनका अच्छा-ख़ासा विस्तार देखने में आया। उदाहरण के लिये श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ने 10वीं पंचवर्षीय योजना(2002-07) के दौरान ही अपने ज्योतिष विभाग के लिये नये उपकरण ख़रीदे और एक जन्म-कुण्डली बैंक स्थापित किया। ज्योतिष और पौरोहित्य में अंश-कालिक डिप्लोमा और सर्टीफ़िकेट कार्यक्रमों को प्रारंभ  करके भी इसने अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया। पर यह तो पानी पर तैरते हिमशैल का शिखर मात्र था।

मई 2002  में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान(आर एस एस) को विश्वविद्यालय की  मान्यता मिल गई। यह पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था (स्थापना-1970) जो लम्बे समय से प्राचीन  संस्कृत पाण्डुलिपियों और संस्कृत विद्वानों के संरक्षण के कार्य में लगी हुई थीअब नये पाठ्यक्रम बनाने, नये कोर्स प्रारम्भ करने और नई डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत कर दी गई। इसके दसों कैम्पसों (इलाहाबाद,पुरी,जम्मू,त्रिचूर,जयपुर,लखनऊ,श्रिंगेरी,गरली,भोपाल,मुम्बई) को भी विश्वविद्यालयों के समकक्ष होने की मान्यता मिली हुई है अर्थात उनमें से प्रत्येक (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले से ही परम उदार दिशा-निर्देशों के दायरे के अन्तर्गत) नये पाठ्यक्रम तैयार करने और डिग्रियां और डिप्लोमा प्रदान करने के लिये अधिकृत है। संस्थान इन कैम्पसों और नई दिल्ली और तिरुपति के उपरोक्त विद्यापीठों की गतिविधियों को समेकित करने के लिये केन्द्रक की भूमिका निभाता है। ग़ैर सरकारी गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को अनुदान और वित्तीय सहायता देना इसके कार्यभारों में से एक है। संस्कृत डिग्री धारकों के लिये रोज़गार के अवसर बेहतर करने के लिये संस्थान ज्योतिष और कर्मकाण्ड से जुड़े पाठ्यक्रमों के लिये छात्र वृत्तियां भी देता है। इसी सन्दर्भ में उन दो संस्थाओं को अभी हाल में ही ‘योग विश्वविद्यालय’ की मान्यता दिये जाने का उल्लेख भी आवश्यक है जो सीधे-सीधे ज्योतिष और कर्म-काण्ड से तो नहीं जुड़े हैं परन्तु फिर भी पुजारियों की अनवरत आपूर्ति सुनिश्चित करने में जिनकी भूमिका  महत्वपूर्ण है। वे संस्थायें हैं- बेंगलुरु स्थित स्वामी विवेकानन्द योग अनुसन्धान संस्था(SVYAS)  जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2001 में मान्यता प्रदान की थी, और मुंगेर फ़ोर्ट, बिहार स्थित बिहार योग भारती जिसे 2000 में विश्वविद्यालय के समकक्ष होने की मान्यता मिली।

पुरोहित-प्रशिक्षण संस्थानों के इस उलझे हुये ताने-बाने में दो और धागे भी हैं। केन्द्र सरकार उज्जैन स्थित महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान को वित्तपोषित करती है जो देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उगती ग़ैर सरकारी वैदिक पाठशालाओं और गुरुकुलों को मान्यता और धन उपलब्ध कराने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है। इन गुरुकुलों का मानकीकरण और उदीयमान पुरोहितों के लिये परीक्षाएं आयोजित करना इस संस्था के कार्यभारों में से हैं। इस संस्था से मान्यता मिलना गुरुकुलों की दुकान चलाने के लिए माने रखता है।

पूर्वोक्त मानद विश्वविद्यालयों के अलावा भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुमोदित राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की एक श्रेणी है जिसमें मध्यप्रदेश स्थित महर्षि महेश योगी का विश्वविद्यालय और रामटेक, महाराष्ट्र स्थित कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से  विश्वविद्यालय की पदवी स्थापना के पश्चात नहीं मिली अपितु इनकी तो स्थापना ही इनके प्रान्तीय विधान-मण्डलों द्वारा अपने आप में सम्पूर्ण विश्वविद्यालयों के रूप में की गई थी और बाद में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्रदान कर दी गई।

महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना कांग्रेस मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में 1995 में राज्य विधानमण्डल के सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा की गई थी। ऐसा महेश योगी को मध्य प्रदेश के अपने धरतीपुत्र के रूप में सम्मानित करने के लिये किया गया था। यह संस्था सभी तरह के वैदिक ज्ञान में पी एच डी आदि उच्च शैक्षिक उपाधियों का स्त्रोत बन चुकी है। इसके अनेक स्नातकों ने आगे चल कर कई मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योग स्थापित किये और/या वास्तुशास्त्रियों, ज्योतिषियों, रत्नशास्त्रियों इत्यादि के तौर पर अकादमियों की स्थापना की।
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता प्राप्त ये राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय और योग विश्वविद्यालय देश भर में जहां-तहां उगते छोटे-मोटे गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के लिये अन्तिम सीढ़ी की भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई पौरोहित्य पाठशालायें छोटे-छोटे साधनहीन लड़कों (लड़कियां निषिद्ध हैं) को प्रवेश देकर उन्हें पारम्परिक कर्म-काण्ड का प्रशिक्षण देते हैं। पर क्योंकि वे अकादमिक डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं अतः वे अपने छात्रों को किसी भी ऐसे मानद या मान्यताप्राप्त राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय में भेज देते हैं जिसकी विशेषज्ञता योगिक अथवा वैदिक विज्ञानों में हो जिनके दायरे में मोटे तौर पर ज्योतिष से लेकर योग तक सभी कुछ आ जाता है। इससे पुजारियों और कर्मकाण्डियों के रूप में देश-विदेश के बाज़ारों में उनके विद्यार्थियों की ‘मार्केटेबिलिटी’ बेहतर हो जाती है।

ये सही है कि संस्कृत की शिक्षा का हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों से गहरा सम्बन्ध है और कई बार दोनों को अलग-अलग करना कठिन होता है। यज्ञ या पूजा संस्कृत की डिग्री प्राप्त करने के लिये यजुर्वेद के अध्ययन का एक प्रायोगिक पहलू मात्र है। परन्तु संस्कृत में लिखे धार्मिक साहित्य के अध्यापन और कर्मकाण्डों के अध्यापन के बीच में कोई सीमारेखा खींचने का प्रयास करने के स्थान पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था ठीक विपरीत दिशा में मुड़ गई है। यह संस्कृत और हिन्दू दर्शन की शिक्षा की आड़ में जनता के पैसे और संसाधनों का उपयोग हिन्दू कर्मकाण्डों को बढ़ावा देने के लिये कर रही है।

अगर भारत अपने सार्वजनिक संसाधन मानद विश्वविद्यालयों के माध्यम से बहुमत के धर्म को प्रोत्सहित करने में झोंकता है तो क्या वह ख़ुद को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कह सकता है?

स्रोत  – http://smashfascism.net

प्रस्तुतकर्ता: सिकन्दर कुमार मेहता

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Cow slaughter to be punishable by life sentence in Gujarat

Cow slaughter to be punishable by life sentence in Gujarat

Government of Indian state to introduce a bill bolstering existing laws against butchering the revered animals

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An Indian woman prays to a holy cow. Slaughtering the revered animals will soon be punishable by a life sentence in Gujarat. Photograph: Rajesh Kumar Singh/AP

The leader of an Indian state has announced that slaughtering cows and transporting beef will soon be punishable by a life sentence, the harshest penalty yet for crimes against the revered animal in the Hindu-majority country.

The chief minister of Gujarat,Vijay Rupani, said his government would introduce a bill in the next week to bolster existing laws against butchering cows and related crimes. The current punishment is a Rs 50,000 fine (£622) and up to seven years in jail.

“We want to make this law more strict,” said Rupani, a member of the Bharatiya Janata party (BJP), a Hindu nationalist party whose elected officials – including the Indian prime minister, Narendra Modi – have long championed a national ban on beef consumption.

“In the bill, we will make a provision where in people found involved in cow-slaughtering as well as transportation of beef will be punished with life imprisonment,” Rupani told a gathering at a Hindu social organisation. “Their vehicles too will be seized permanently.”

A number of BJP-led states have extended bans or tightened punishments against cow slaughter since Modi became prime minister in 2014. The former Gujarat chief minister was elected on a platform that included a vow to outlaw it.

Killing cows or transporting beef in states such as Haryana, Jharkand or Jammu and Kashmir is punishable by large fines and up to 10 years’ prison. Beef consumption is permitted in only eight of India’s 29 states and territories.

Most Hindus honour cows as the embodiment of the principle of non-violence and idealise the animal as a selfless, nourishing mother.But attitudes towards beef consumption are not uniform across the country. Some southern Indian Hindus regularly eat beef, as do Muslims and members of less socially dominant castes who regard the animal as a cheap source of protein.

The Modi government has reportedly asked the country’s agriculture ministry to explore the possibility of a nationwide ban but has chosen to tread carefully in implementing its election promise.

Cow protection has been a trigger for sectarian violence throughout modern Indian history and a resurgence in recent years has been linked to an increasingly assertive Hindu nationalist movement.

A Muslim villager from the outskirts of Delhi was lynched in September 2015 after being accused of storing beef in his freezer, a murder that government ministers were accused of underplaying.

Bands of self-styled “cow protectors” have sprung up in northern India, and have been accused of fomenting sectarian violence and carrying out vigilantism.

Cow-protection gangs were rebuked by Modi last year after videos emerged of their members flogging young Dalits. The least powerful group in the caste hierarchy is traditionally enlisted to dispose of dead cows.

Credit : The Guardian

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