इफराजुल की हत्या का कारण ‘लव जिहाद’ नही ‘भगवा आतंकवाद’ है !

राजस्थान के राजसमन्द में प्रवासी बंगाली मजदूर इफराजुल की एक दलित शम्भू लाल रेगर उर्फ शम्भू भवानी द्वारा की गई निर्मम हत्या की घटना से मैं व्यक्तिगत रूप से बहुत दुःख महसूस कर रहा हूँ ,कोई भी इंसान कैसे इस बेरहमी से किसी निर्दोष ,निहत्थे इंसान का कत्ल कर सकता है ,यह अत्यंत क्षुब्ध करने वाला अमानवीय कृत्य है ,मैं इस हत्याकांड की कड़ी भर्त्सना करता हूं और शर्मिंदगी व्यक्त करता हूँ कि मैं उस वर्ग से आता हूँ ,जिससे कातिल का संबंध है ।
यह और भी दुःखद बात है कि कातिल दरिंदे ने इस कुकृत्य के लिए 6 दिसम्बर का दिन चुना ,जो बाबा साहब अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण का दिवस है ,जिस दिन हम लोग मांडल में दलित मुस्लिम एवम सभी जातियों के लोग मिल कर रक्तदान कर रहे थे ,उस दिन दलित समाज का ही एक व्यक्ति निकटवर्ती जिले में एक बेकसूर मुसलमान का रक्त बहा रहा था ,यह घटना मेरे लिए बहुत ही क्षोभ का कारण बन गई है ,जिस निर्मम तरीके से धोखे से बुलाकर 50 वर्षीय इफराजुल को मारा गया ,इस कायराना कत्ल की जितनी भी निंदा की जाए कम है ,मैं कातिल दलित युवक शम्भू भवानी पर लाखों लानतें भेजता हूँ और स्वयं को कातिल के समुदाय का हिस्सा होने की वजह से गुनाहगार महसूस करता हूँ ।
आखिर इस देश का दलित किस आत्मघाती राह पर जा रहा है ? हिंदुत्व का यह भगवा जिहादी रास्ता क्या दलित युवाओं के लिए उपयुक्त है ? क्या बाबा साहब की संतानों को संविधान को ताक में रख कर ऐसे कुकृत्य करने चाहिए ? मेरा मानना है कि शम्भू लाल रेगर ने सिर्फ इफ्तारूल का ही कत्ल नही किया बल्कि भारत के संविधान का भी कत्ल कर दिया है ,उसने दलित और मुस्लिम जैसे उत्पीड़ित और वंचित समुदाय के मध्य मौजूद सौहार्द का भी कत्ल कर दिया है ,उसके कुकृत्य से इन दोनों समुदायों के बीच के भातृभाव को गंभीर क्षति पंहुची है ,जो कि बेहद दुख का विषय है ।

मेरा यह मानना है कि यह शम्भू लाल नामक हत्यारा एक मुस्लिम विरोधी विचारधारा के लोगों द्वारा प्रशिक्षित आतंकी है ,जिसने भारतीय गणराज्य को चुनोती दी है ,उसका कृत्य राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में है ।
राजस्थान पुलिस इसे महज़ एक नशे के आदी युवक द्वारा की गई सिरफिरी घटना मान रही है,लेकिन मेरा मानना है कि यह किसी एक सिरफिरे का काम नही है ,यह उस विषैली विचारधारा का परिणाम है जो देश के युवाओं में अपने ही देश वासियों के प्रति घृणा भर रही है ।यह हिंदुत्व की नफरत की राजनीति का ही परिणाम है कि एक निर्दोष परदेशी मुसलमान को अकारण ही हत्या का शिकार बना कर उसे लव जिहाद के बदले का रूप देने की कुचेष्टा की गई है ।
इफराजुल की हत्या किसी रंजिश अथवा प्रेमप्रसंग या गुस्से का नतीजा नही हो कर एक धार्मिक अल्पसंख्यक और परप्रांतीय अकेले व्यक्ति का सहज शिकार करने जैसा है ,जिसे महज मुसलमान होने की वजह से एक धर्मान्ध हिन्दू ने कायराना तरीके से मार गिराया ,उसका कोई अपराध नही था ,उसके बेरहम कत्ल को लव जिहाद ,इस्लामिक आतंकवाद ,धारा 370 और राममंदिर निर्माण से जोड़ कर जिस तरह से उसे हिंदू शौर्य का रंग दिया गया है ,वह साबित करता है कि हत्यारे शंभु का गहन प्रशिक्षण और ब्रेनवाश किया गया तथा उसके ज़ेहन में मुसलमानों के लिए काफ़ी गहरी नफरत बोई गई ,संभवतः किसी भगवा कैम्प में उसे इस आतंकी घटना को करने की पूरी ट्रेनिंग मिली है ,वरना बिना बात कोई किसी मेहनतकश इंसान को क्यों निशाना बनाता और क्यों इस भयानक कांड को लाइव करने का दुस्साहस करता ?

आज राजसमन्द का दौरा करने और घटना से संबंधित वीडियोज देखने एवम तथ्यों को समझने के बाद मुझे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि शभु लाल रेगर नामक इस दलित युवक के पीछे मुस्लिम विरोधी विचारधारा का समूह कार्यरत है ,यह सामान्य हत्या नही है ,यह एक सोची समझी प्लानिंग का परिणाम है ,शम्भू नामक हत्यारा ना केवल सुप्रशिक्षित है बल्कि उसकी भाषा शैली भी पूर्णतः इस देश की दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी शक्तियों की है ,यहां तक कि कातिल दरिंदे ने अपने कुकृत्य को जायज ठहराने के लिए जो वीडियो बना कर वायरल किये है ,उनमें वह भगवा झंडे के साथ बैठा नज़र आता है ,उसने जो भी बातें कही है ,वे भी संघ की विचारधारा की बातें ही है ,इसलिए उसके हिंदूवादी संगठनों से रिश्ते को नकारा नही जा सकता है ।

मेरा मानना है कि इस घटना से यह संकेत मिलता है कि इस देश के दलित युवाओं को योजनाबद्ध ढंग से मुस्लिमों के ख़िलाफ़ खड़ा किया जा रहा है ,दोनों समुदायों के मध्य स्थायी दुश्मनी और बैरभाव की दीर्घ परियोजना लागू की जा चुकी है ,दुःखद तथ्य यह है कि दलित तबके के नोजवान इस नरभक्षी हिंदुत्व की चपेट में आ रहे है और वे एक आत्मघाती हिंदुत्व के हरावल दस्ते बनते जा रहे है ,जो कि सचमुच चिंता का विषय है ।

सबसे दुःखद और निराशा की बात यह है कि इस खतरे को दलित बहुजन मूलनिवासी संगठन समझने को तैयार नही है ,इसलिए वे राजसमन्द जिले में हुए इफराजुल के निर्मम कत्ल के ख़िलाफ़ कुछ भी बोल नही पा रहे है ,अम्बेडकरवादियों की यह खामोशी उनकी सामुदायिक कायरता को दर्शाती है ,उनकी यह चुप्पी दलित समाज को भगवा जिहाद के खतरे की तरफ धकेल देगी ।

मैं पुनः राजसमन्द के इस कांड की कड़ी भर्त्सना करता हूँ और दुर्दांत हत्यारे शम्भू भवानी के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्यवाही और सजा की मांग करता हूँ ,पश्चिमी बंगाल में रह रहे इफराजुल के परिवार से माफी मांगता हूं कि एक दलित ने यह कुकृत्य करके हम सबको शर्मिंदा किया है ।

मैं इफराजुल के परिवार के प्रति अपनी संवेदना ज़ाहिर करता हूँ और उनकी न्याय की लड़ाई में साथ देने का वादा करता हूँ ।

-भंवर मेघवंशी
(सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार )

विडियो भी देखें : https://youtu.be/79xekfnXyls

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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धर्म शास्त्र,विवेक और विज्ञान के दुश्मन हैं, कैसे ?

धर्म शास्त्र विवेक और विज्ञान के दुश्मन हैं, कैसे आईये देखते हैं:

1. विज्ञान व भूगोल :
गंगा हिमालय के गंगोत्री हिमनद (ग्लेशियर) से निकलती है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
गंगा शिवजी की जटा से निकलती है और भगीरथ इसे स्वर्ग से धरती पर लाया था।

2. विज्ञान व भूगोल:
जल-वाष्प भरे बादल जब हवाओं के सम्पर्क में आते हैं तो वर्षा होती है

जबकि धर्म व शास्त्र :
वर्षा इंद्र देवता कराते हैं।

3. विज्ञान व भूगोल :
पृथ्वी अपनी धुरी पर 23 डिग्री झुकी हुई है। जब दो tectonic plates आपस में टकराती हैं तो भूकंप आता है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है और जब वह करवट बदलता है तो भूकम्प आता हैं। दूसरी जगह लिखा है कि प्रथ्वी बैल/गाय के सीगं पर टिकी हुई है और थक कर जब वह सीगं बदलता/ती है तो भूकम्प आता है।

4. विज्ञान व भूगोल :
पृथ्वी और चन्द्रमा परिक्रमा करते हुऐ जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के मध्य आ जाती है तो चंद्र ग्रहण होता है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
चंद्र ग्रहण के समय राहु चन्द्रमा को खा जाता है।

5. विज्ञान :
हवाई जहाज के माध्यम से मानव हवाई सैर करता है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
बिना किसी माध्यम के तथाकथित देवी देवता और राक्षस हवा में उड सकते थे।

6. विज्ञान :
यहां कौसो दूर भी दूरसंचार के माध्यम से मानव एक दूसरे से मन की बात कर सकते हैं।

जबकि धर्म व शास्त्र :
केवल साधु- संत ही बिना किसी माध्यम के ही मन की बात उन्हीं के बनाये ईश्वर से कर लिया करते थे।

अब फैसला आपका ?

आप अपने बच्चों का बौद्धिक विकास करने के लिए उन्हें विज्ञान पढ़ाते हैं या अंधविश्वासी बनाने के लिए उन्हे अप्रमाणित धर्म व शास्त्र ।

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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[Must Read] : If Sita Was A Feminist

If Sita Was A Feminist

Kusha: Mom, who was our father? We would like to know about him.

Sita: Well, sons. Your father’s name is Ram. You might have heard about him, he is presently the king.

Lava: Damn, of course. Whatever are we doing here then? Shouldn’t we be living in the palace along with him?

Sita: Sons, that’s a long story and quite frankly very boring. So I’ll just give you the TL;DR version.
Your father used to be my knight in shining armor. Post a ceremony he won me and married me. Don’t be so shocked, dear sons, he literally did win me after a competition. Anyhow, post that I went to his place and was fulfilling all the duties expected of a wife in this patriarchal society. But mother in law got us banished to the forest.

Lava: That’s so wrong! Why didn’t you protest!?

Sita: Oh well, back then I was trying to be the good obedient wife. But, that wasn’t the worst. Lakshman tried to force me into moralistic boundaries and restricted my movements under the pretext of my protection. Ravana came as a disguised sadhu and I felt like helping. I was kidnapped and after a massive war, your father came and rescued me.

Kusha: Wow mom. That’s heroic of him. I don’t understand what all the fuss is about.

Sita: Sons, I haven’t yet come to the meatiest part yet. So after rescuing me, your daddy dearest and my knight in shining armor suspected me of sleeping with Ravana. He then asked me to ‘prove my purity’ by jumping in a fire. That was a very torturous and embarrassing episode!

Lava: What the hell, that wasn’t your fault. You were kidnapped! Why would he do that to you!. Shouldn’t he be trusting you as your husband?

Sita: Well he didn’t trust me. Despite the fact that I had an opportunity of escaping from Ravana earlier through one of your father’s deputies, Hanuman. I refused to go along with him because I did not want anyone else to touch me.

Kusha: Oh mother! You did so much and this is how you were treated! Our father seems like one big douchebag.

Sita: Yep, such is life my boys. Anyway, we all went back and your father was crowned the king. It was supposed to be a happily ever after ending, but when I got pregnant and was expecting you both, there was a rumor in the kingdom that I’m apparently impure. That I have a loose character. So to save his own image and honor, your father banished me to the forest. I didn’t protest, I had decided that it was enough of humiliation. I had no wish to live with a prick who is just bothered about what his subjects gossip and not worried about his pregnant wife at all.

Lava: Mom, that’s downright disgusting.

Sita: Yes, I know. Your great father didn’t even have the courtesy to drop me by himself. He sent your uncle Lakshman who later while dropping me off said that he’s undertaking this task with the heaviest of hearts.

Lava: Yeah right. That sounds like a load of bullshit.

Yep, I know. Not that I believed him. If your uncle was so concerned then he would have done something other than dropping off a pregnant lady in the forest to live alone. But as I said, I had enough and since then I have been living alone and couldn’t be happier.

Lava and Kusha: You are a brave woman, mom. Of course we do not need a misogynistic man like our father in our lives. We are better off without him. We are proud to have you as our mother. Now, shall we go out and practice archery?

Sita: Yes, go ahead. Have a nice time.

Brought To You By : Sikandar Kumar Mehta

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Why I Hate Vivekananda : 17 Castiest Quotes of Vivekananda

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Vivekananda’s ”Ideological” Yatra

1. I do not propose any levelling of castes. Caste is a very good thing. Caste is the plan we want to follow.

2. The plan in India is to make everybody a Brahmin, the Brahmin being the ideal of humanity.

3.  Indian caste is better than the caste which prevails in Europe or America.

→ Which caste system prevails in Europe or America Mr. Vivekananda? Here he glorifies caste system in India!

4.  Where would you be if there were no caste? Where would be your learning and other things, if there were no caste? There would be nothing left for the Europeans to study if caste had never existed!

→ We would have been better off without caste, our situations would have been better. What learning so called caste system gave to Dalits? Caste system taught only discrimination.

→ Yeah, you guys invented caste system so that Europeans have something to study because poor Europeans didn’t have anything to study!

5. Caste should not go; but should only be readjusted occasionally. Within the old structure is to be found life enough for the building of two hundred thousand new ones. It is sheer nonsense to desire the abolition of caste.

6. Brainy Vivekananda suggested to lower castes that are fighting and writing against higher castes is of no use, learn Sanskrit and you problems will be solved! Sucha brainy was our Swami!

7. The Brahminhood is the ideal of humanity in India, as wonderfully put forward by Shankaracharya at the beginning of his commentary on the Gitâ, where he speaks about the reason for Krishna’s coming as a preacher for the preservation of Brahminhood, of Brahminness.

→  Dr. Ambedkar was against Brahminhood and Brahminism, which is a mentality of people that makes them to suppress and discriminate. Vivekananda supported Brahminism.

→ Yes, Vivekananda is against anyone fighting casteism, because fighting casteism is fighting against Brahmins, who are, of course, according to him, Gods on earth.

8. In India, even the lowest caste never does any hard work. They generally have an easy lot compared to the same class in other nations; and as to ploughing, they never do it.

→ Dalits and Shudras, in Vivekananda’s opinion, do no work. The fields plough themselves, by magic! And only hard work is done by Brahmins sitting in A.C. Temples and earning millions, sitting in A.C. is very tough work!

9. Why is India not a superpower? Of course, because we “abolished caste”: “Then what was the cause of India’s downfall? — The giving up of this idea of caste.As Gitâ says, with the extinction of caste the world will be destroyed. Now does it seem true that with the stoppage of these variations the world will be destroyed… Therefore what I have to tell you, my countrymen, is this: that India fell because you prevented and abolished caste… Let Jati have its sway; break down every barrier in the way of caste, and we shall rise.”

10. So what is the basis of the Indian’s social order? It is the caste law. I am born for the caste, I live for the caste. I donot mean myself, because, having joined an Order, we are outside. I mean those that live in civil society. Born in the caste, the whole life must be lived according to caste regulation.

11. Now look at Europe. When it succeeded in giving free scope to caste and took away most of the barriers that stood in the way of individuals, each developing his caste — Europe rose. In America, there is the best scope for caste (real Jati) to develop, and so the people are great.

→ Here Mr. Vivekananda again glorifies the caste system! First thing first, Mr. Vivekananda, there was/is no caste in western societies.

12. “As Manu says, all these privileges and honours are given to the Brahmin, because “with him is the treasury of virtue”. He must open that treasury and distribute its valuables to the world. It is true that he was the earliest preacher to the Indian races, he was the first to renounce everything in order to attain to the higher realisation of life before others could reach to the idea. It was not his fault that he marched ahead of the other caste. Why did not the other castes so understand and do as he did? Why did they sit down and be lazy, and let the Brahmins win the race?”

→ Vivekananda is a defender of Manu, the “great” law-giver, and blames the lower castes for their sorry lot. Is it surprising that most of the followers of the cult of Vivekananda are high caste Hindus?

13. The only safety, I tell you men who belong to the lower castes, the only way to raise your condition is to study Sanskrit, and this fighting and writing and frothing against the higher castes is in vain…

→ Vivekananda doesn’t want that Dalits write against their oppressors and he wants that Dalits keep on suffering silently! Lower castes fight is for equality and Sanskrit is a language of discrimination and it originated to maintain the caste discrimination. How learning Sanskrit will help lower castes get jobs, respectand dignity and how it will solve the problem of caste discrimination? I am not able to understand, can you?

14. To the non-Brahmin castes I say, wait, be not in a hurry. Do not seize every opportunity of fighting the Brahmin, because, as I have shown, you are suffering from your own fault.

15. Vivekananda blames lower castes for their suffering. Yeah, as if while studying, lower castes themselves poured lead in their own ears, cut their own tongue and plucked their own eyes after reading.

16. This Brahmin, the man of God, he who has known Brahman, the ideal man, the perfect man, must remain; he must not go.

→ Yes, Vivekananda is against anyone fighting casteism, because fighting casteism is fighting against Brahmins, who are, of course, according to him, Gods on earth.

17. This Brahmin, the man of God, he who has known Brahman, the ideal man, the perfect man, must remain; he must not go. And with all the defects of the caste now, we know that we must all be ready to give to the Brahmins this credit, that from them have come more men with real Brahminness in them than from all the other castes. That is true. That is the credit due to them from all the other castes.

References –

Swami Vivekananda, “The Abroad and the Problems at Home”, The Hindu, Madras, February 1987, in “Interviews”, The Complete Works of Swami Vivekananda,Volume 5.

Swami Vivekananda, in “The Future of India”, Delivered at Victoria Hall, Madras, in “Lectures from Colombo to Almora”, Complete Works of Swami Vivekananda, Volume 3.

Swami Vivekananda, in “Women of India”, Delivered at the Shakespeare Club House, in Pasadena, California, on January 18, 1900, in “Lectures and Discourses”, Complete Works of Swami Vivekananda, Volume 8.

Swami Vivekananda, in “A Plan of Work for India”, in “Writings: Prose”, The Complete Works of Swami Vivekananda, Volume 4.

Credit : nastiknation.org

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पुजारियों की पैदावार – मीरा नन्दा

इस लेख में मीरा नंदा ने चर्चा की है कि किस तरह विश्‍वविद्यालय का दर्जा प्राप्‍त अनेक शिक्षा संस्‍थान पंडो, पुजारियों, कर्मकाण्डियों की पूरी जमात तैयार कर रहे हैं। ये लेख फ्रण्‍टलाइन पत्रिका में छपा था व इसका अनुवाद अमर नदीम ने किया।
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मानद विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त कई शैक्षिक संस्थान हिन्दू कर्मकाण्डों के खुदरा व्यापारियों के लिये आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ियों की भूमिका निभा रहे हैं। भारत में जो बाज़ार के लिये फ़ायदेमंद है वही देवताओं के लिये भी फ़ायदेमंद सिद्ध हो रहा है। भारतीय मध्यवर्ग अपनी भौतिक सम्पदा में वृद्धि के अनुपात में ही ‘पूजा’ और ‘होम’ में भी उत्तरोत्तर वृद्धि करना आवश्यक और अनिवार्य समझता है। हर वाहन की ख़रीद के साथ पूजा होती है; ठीक वैसे ही जैसे ज़मीन के छोटे से टुकड़े पर भी किसी निर्माण से पहले ‘भूमि-पूजन’ अनिवार्य होता है। और हर पूजा के साथ एक ज्योतिषाचार्य और एक वास्तुशास्त्री भी जुड़ा ही रहता है। और हर प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य और वास्तुशास्त्री को कम्प्यूटर चलाना  और अंग्रेज़ी बोलना तो आना ही चाहिये ताकि वह अपनी बातों को “वैज्ञानिक” ढंग से प्रस्तुत कर सके।
भारत के लगातार फलते-फूलते ‘देवताओं’  के बाज़ार को देख कर एक प्रश्न सहज ही दिमाग़ में आता है- ये मॉडर्न दिखने वाले पुजारी, ज्योतिषाचार्य, वास्तुशास्त्री, और अन्य कर्मकाण्डी दुकानदार आख़िर आ कहां से रहे हैं? सभी तरह के धार्मिक कर्मकाण्डों के लिये 21वीं सदी के हिन्दुओं की इस अनन्त मांग के लिये कर्मकाण्डी पुरोहितों की आपूर्त्ति  आख़िर होती कहां से है?

मानद विश्वविद्यालय हमेशा से ही पारम्परिक गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं से लेकर घरों, मन्दिरों, दफ़्तरों, दुकानों, और बड़े-बड़े कॉरपोरेट बोर्डरूमों और अनिवासी भारतीयों तक फैली इस भारतीय मध्यवर्गीय श्रँखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते रहे हैं। ये विश्वविद्यालय, जिनमें से अधिकांश करदाताओं के पैसे से चलते हैं, अपने डिप्लोमा और डिग्रियों के द्वारा सक्रिय रूप से हिन्दू पुरोहित-कर्म का एक आधुनिक सँस्करण तैयार कर रहे हैं और उसे मध्यवर्ग के लिये एक आर्थिक रूप से सुविधाजनक रोज़गार के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने माध्यमिक स्तर से आगे की शिक्षा में ज्योतिष और कर्मकाण्ड को सम्मिलित करने के 2001 के अपने एक कुख्यात निर्णय से पहले से ही मौजूद उन सँस्कृत संस्थाओं को एक नया जीवन-दान दे दिया जिन्हें विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त था। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चे की सरकार ने मानद विश्वविद्यालयों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया जो हिन्दू पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिये लगातार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक बना हुआ है। अब भाजपा चाहे अगले कई वर्षों तक भी राजनीतिक सत्ता से दूर रहे फिर भी सत्ता में रहते समय इसने जो संस्थागत ढांचा तैयार कर दिया था वह परम्परागत हिन्दू ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के इसके उद्देश्य की पूर्ति करता रहेगा।

2001 में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा में ज्योतिष शास्त्र को शामिल करने का निर्णय लिया तब तक अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड सम्बन्धी पाठ्यक्रम के लिये जाने माने तीन अखिल भारतीय संस्थानों को मानद विश्वविद्यालय की मान्यता मिल चुकी थी। वे संस्थान हैं- श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,तिरुपति, और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार।

इन संस्थानों की विशेषज्ञता शास्त्रीय ज्ञान के बारे में है जिसमें ज्योतिष, पौरोहित्य और योग के उच्चतर पाठ्यक्रम भी शामिल हैं- वेद-वेदांग के नियमित पाठ्यक्रम के एक भाग और विशिष्ट डिप्लोमा या सर्टीफ़िकेट पाठ्यक्रमों के रूप में भी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (और तदोपरान्त उच्चतम न्यायालय) द्वारा ज्योतिष पाठ्यक्रम को हरी झण्डी दिखाये जाने के बाद से इनका अच्छा-ख़ासा विस्तार देखने में आया। उदाहरण के लिये श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ने 10वीं पंचवर्षीय योजना(2002-07) के दौरान ही अपने ज्योतिष विभाग के लिये नये उपकरण ख़रीदे और एक जन्म-कुण्डली बैंक स्थापित किया। ज्योतिष और पौरोहित्य में अंश-कालिक डिप्लोमा और सर्टीफ़िकेट कार्यक्रमों को प्रारंभ  करके भी इसने अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया। पर यह तो पानी पर तैरते हिमशैल का शिखर मात्र था।

मई 2002  में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान(आर एस एस) को विश्वविद्यालय की  मान्यता मिल गई। यह पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था (स्थापना-1970) जो लम्बे समय से प्राचीन  संस्कृत पाण्डुलिपियों और संस्कृत विद्वानों के संरक्षण के कार्य में लगी हुई थीअब नये पाठ्यक्रम बनाने, नये कोर्स प्रारम्भ करने और नई डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत कर दी गई। इसके दसों कैम्पसों (इलाहाबाद,पुरी,जम्मू,त्रिचूर,जयपुर,लखनऊ,श्रिंगेरी,गरली,भोपाल,मुम्बई) को भी विश्वविद्यालयों के समकक्ष होने की मान्यता मिली हुई है अर्थात उनमें से प्रत्येक (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले से ही परम उदार दिशा-निर्देशों के दायरे के अन्तर्गत) नये पाठ्यक्रम तैयार करने और डिग्रियां और डिप्लोमा प्रदान करने के लिये अधिकृत है। संस्थान इन कैम्पसों और नई दिल्ली और तिरुपति के उपरोक्त विद्यापीठों की गतिविधियों को समेकित करने के लिये केन्द्रक की भूमिका निभाता है। ग़ैर सरकारी गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को अनुदान और वित्तीय सहायता देना इसके कार्यभारों में से एक है। संस्कृत डिग्री धारकों के लिये रोज़गार के अवसर बेहतर करने के लिये संस्थान ज्योतिष और कर्मकाण्ड से जुड़े पाठ्यक्रमों के लिये छात्र वृत्तियां भी देता है। इसी सन्दर्भ में उन दो संस्थाओं को अभी हाल में ही ‘योग विश्वविद्यालय’ की मान्यता दिये जाने का उल्लेख भी आवश्यक है जो सीधे-सीधे ज्योतिष और कर्म-काण्ड से तो नहीं जुड़े हैं परन्तु फिर भी पुजारियों की अनवरत आपूर्ति सुनिश्चित करने में जिनकी भूमिका  महत्वपूर्ण है। वे संस्थायें हैं- बेंगलुरु स्थित स्वामी विवेकानन्द योग अनुसन्धान संस्था(SVYAS)  जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2001 में मान्यता प्रदान की थी, और मुंगेर फ़ोर्ट, बिहार स्थित बिहार योग भारती जिसे 2000 में विश्वविद्यालय के समकक्ष होने की मान्यता मिली।

पुरोहित-प्रशिक्षण संस्थानों के इस उलझे हुये ताने-बाने में दो और धागे भी हैं। केन्द्र सरकार उज्जैन स्थित महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान को वित्तपोषित करती है जो देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उगती ग़ैर सरकारी वैदिक पाठशालाओं और गुरुकुलों को मान्यता और धन उपलब्ध कराने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है। इन गुरुकुलों का मानकीकरण और उदीयमान पुरोहितों के लिये परीक्षाएं आयोजित करना इस संस्था के कार्यभारों में से हैं। इस संस्था से मान्यता मिलना गुरुकुलों की दुकान चलाने के लिए माने रखता है।

पूर्वोक्त मानद विश्वविद्यालयों के अलावा भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुमोदित राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की एक श्रेणी है जिसमें मध्यप्रदेश स्थित महर्षि महेश योगी का विश्वविद्यालय और रामटेक, महाराष्ट्र स्थित कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से  विश्वविद्यालय की पदवी स्थापना के पश्चात नहीं मिली अपितु इनकी तो स्थापना ही इनके प्रान्तीय विधान-मण्डलों द्वारा अपने आप में सम्पूर्ण विश्वविद्यालयों के रूप में की गई थी और बाद में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्रदान कर दी गई।

महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना कांग्रेस मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में 1995 में राज्य विधानमण्डल के सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा की गई थी। ऐसा महेश योगी को मध्य प्रदेश के अपने धरतीपुत्र के रूप में सम्मानित करने के लिये किया गया था। यह संस्था सभी तरह के वैदिक ज्ञान में पी एच डी आदि उच्च शैक्षिक उपाधियों का स्त्रोत बन चुकी है। इसके अनेक स्नातकों ने आगे चल कर कई मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योग स्थापित किये और/या वास्तुशास्त्रियों, ज्योतिषियों, रत्नशास्त्रियों इत्यादि के तौर पर अकादमियों की स्थापना की।
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता प्राप्त ये राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय और योग विश्वविद्यालय देश भर में जहां-तहां उगते छोटे-मोटे गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के लिये अन्तिम सीढ़ी की भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई पौरोहित्य पाठशालायें छोटे-छोटे साधनहीन लड़कों (लड़कियां निषिद्ध हैं) को प्रवेश देकर उन्हें पारम्परिक कर्म-काण्ड का प्रशिक्षण देते हैं। पर क्योंकि वे अकादमिक डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं अतः वे अपने छात्रों को किसी भी ऐसे मानद या मान्यताप्राप्त राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय में भेज देते हैं जिसकी विशेषज्ञता योगिक अथवा वैदिक विज्ञानों में हो जिनके दायरे में मोटे तौर पर ज्योतिष से लेकर योग तक सभी कुछ आ जाता है। इससे पुजारियों और कर्मकाण्डियों के रूप में देश-विदेश के बाज़ारों में उनके विद्यार्थियों की ‘मार्केटेबिलिटी’ बेहतर हो जाती है।

ये सही है कि संस्कृत की शिक्षा का हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों से गहरा सम्बन्ध है और कई बार दोनों को अलग-अलग करना कठिन होता है। यज्ञ या पूजा संस्कृत की डिग्री प्राप्त करने के लिये यजुर्वेद के अध्ययन का एक प्रायोगिक पहलू मात्र है। परन्तु संस्कृत में लिखे धार्मिक साहित्य के अध्यापन और कर्मकाण्डों के अध्यापन के बीच में कोई सीमारेखा खींचने का प्रयास करने के स्थान पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था ठीक विपरीत दिशा में मुड़ गई है। यह संस्कृत और हिन्दू दर्शन की शिक्षा की आड़ में जनता के पैसे और संसाधनों का उपयोग हिन्दू कर्मकाण्डों को बढ़ावा देने के लिये कर रही है।

अगर भारत अपने सार्वजनिक संसाधन मानद विश्वविद्यालयों के माध्यम से बहुमत के धर्म को प्रोत्सहित करने में झोंकता है तो क्या वह ख़ुद को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कह सकता है?

स्रोत  – http://smashfascism.net

प्रस्तुतकर्ता: सिकन्दर कुमार मेहता

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Cow slaughter to be punishable by life sentence in Gujarat

Cow slaughter to be punishable by life sentence in Gujarat

Government of Indian state to introduce a bill bolstering existing laws against butchering the revered animals

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An Indian woman prays to a holy cow. Slaughtering the revered animals will soon be punishable by a life sentence in Gujarat. Photograph: Rajesh Kumar Singh/AP

The leader of an Indian state has announced that slaughtering cows and transporting beef will soon be punishable by a life sentence, the harshest penalty yet for crimes against the revered animal in the Hindu-majority country.

The chief minister of Gujarat,Vijay Rupani, said his government would introduce a bill in the next week to bolster existing laws against butchering cows and related crimes. The current punishment is a Rs 50,000 fine (£622) and up to seven years in jail.

“We want to make this law more strict,” said Rupani, a member of the Bharatiya Janata party (BJP), a Hindu nationalist party whose elected officials – including the Indian prime minister, Narendra Modi – have long championed a national ban on beef consumption.

“In the bill, we will make a provision where in people found involved in cow-slaughtering as well as transportation of beef will be punished with life imprisonment,” Rupani told a gathering at a Hindu social organisation. “Their vehicles too will be seized permanently.”

A number of BJP-led states have extended bans or tightened punishments against cow slaughter since Modi became prime minister in 2014. The former Gujarat chief minister was elected on a platform that included a vow to outlaw it.

Killing cows or transporting beef in states such as Haryana, Jharkand or Jammu and Kashmir is punishable by large fines and up to 10 years’ prison. Beef consumption is permitted in only eight of India’s 29 states and territories.

Most Hindus honour cows as the embodiment of the principle of non-violence and idealise the animal as a selfless, nourishing mother.But attitudes towards beef consumption are not uniform across the country. Some southern Indian Hindus regularly eat beef, as do Muslims and members of less socially dominant castes who regard the animal as a cheap source of protein.

The Modi government has reportedly asked the country’s agriculture ministry to explore the possibility of a nationwide ban but has chosen to tread carefully in implementing its election promise.

Cow protection has been a trigger for sectarian violence throughout modern Indian history and a resurgence in recent years has been linked to an increasingly assertive Hindu nationalist movement.

A Muslim villager from the outskirts of Delhi was lynched in September 2015 after being accused of storing beef in his freezer, a murder that government ministers were accused of underplaying.

Bands of self-styled “cow protectors” have sprung up in northern India, and have been accused of fomenting sectarian violence and carrying out vigilantism.

Cow-protection gangs were rebuked by Modi last year after videos emerged of their members flogging young Dalits. The least powerful group in the caste hierarchy is traditionally enlisted to dispose of dead cows.

Credit : The Guardian

Brought To You By : Sikandar Kumar Mehta

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करवाचौथ – श्रद्धा या अंधविश्वास

करवाचौथ व्रत या पत्नी को गुलामी का अहसास दिलाने का एक और दिन?

‘श्रद्धा या अंधविश्वास’

दोस्तों क्या महिला के उपवास रखने से पुरुष की उम्र बढ़ सकती है?
क्या धर्म का कोई ठेकेदार इस बात की गारंटी लेने को तैयार होगा कि करवाचौथ जैसा व्रत करके पति की लंबी उम्र हो जाएगी ?
मुस्लिम नहीं मनाते, ईसाई नहीं मनाते, दूसरे देश नहीं मनाते और तो और भारत में ही दक्षिण, या पूर्व में नहीं मनाते लेकिन इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इन तमाम जगहों पर पति की उम्र कम होती हो और मनाने वालों के पति की ज्यादा,क्यों दोस्तों है किसी के पास कोई जवाब?

दोस्तों यह व्रत ज्यादातर उत्तर भारत में प्रचलित हैं, दक्षिण भारत में इसका महत्व ना के बराबर हैं, क्या उत्तर भारत के महिलाओं के पति की उम्र दक्षिण भारत के महिलाओं के पति से कम हैं ?
क्या इस व्रत को रखने से उनके पतियों की उम्र अधिक हो जाएगी?
क्या यह व्रत उनकी परपरागत मजबूरी हैं या यह एक दिन का दिखावा हैं?

दोस्तों इसे अंधविश्वास कहें या आस्था की पराकाष्ठा?
पर सच यह हैं करवाचौथ जैसा व्रत महिलाओं की एक मजबूरी के साथ उनको अंधविश्वास के घेरे में रखे हुए हैं।
कुछ महिलाएँ इसे आपसी प्यार का ठप्पा भी कहेँगी और साथ में यह भी बोलेंगी कि हमारे साथ पति भी यह व्रत रखते हैं। परन्तु अधिकतर महिलाओं ने इस व्रत को मजबूरी बताया हैं।

एक कांफ्रेस में मैंने खुद कुछ महिलाओं से इस व्रत के बारे में पूछा उनका मानना हैं कि यह पारंपरिक और रूढ़िवादी व्रत है जिसे घर के बड़ो के कहने पर रखना पड़ता हैं क्योंकि कल को यदि उनके पति के साथ संयोग से कुछ हो गया तो उसे हर बात का शिकार बनाया जायेगा,
इसी डर से वह इस व्रत को रखती हैं।

क्या पत्नी के भूखे-प्यासे रहने से पति दीर्घायु स्वस्थ हो सकता है?

इस व्रत की कहानी अंधविश्वासपूर्ण भय उत्पन्न करती है कि करवाचौथ का व्रत न रखने अथवा अज्ञानवश व्रत के खंडित होने से पति के प्राण खतरे में पड़ सकते हैं, यह महिलाओं को अंधविश्वास और आत्मपीड़न की बेड़ियों में जकड़ने को प्रेरित करता है।

कुछ लोग मेरे पिछले स्टेटस पर इतनी लंबी-चौड़ी बहस कर रहें हैं, लेकिन एक बार भी नहीं बताया कि, ऐसा क्यों है कि, सारे व्रत-उपवास पत्नी, बहन और माँ के लिए ही क्यों हैं? पति, भाई और पिता के लिए क्यों नहीं.?
क्योंकि महिलाओं की जिंदगी की कोई कीमत तो है नहीं धर्म की नज़र में, पत्नी मर जाए तो पुरुष दूसरी शादी कर लेगा, क्योंकि सारी संपत्ति पर तो व्यावहारिक अधिकार उसी को प्राप्त है। बहन, बेटी मर गयी तो दहेज बच जाएगा। बेटी को तो कुल को तारना नहीं है, फिर उसकी चिंता कौन करे?

अगर महिलाओं को आपने सदियों से घरों में क़ैद करके रख के आपने उनकी चिंतन शक्ति को कुंद कर दिया हैं तो क्या अब आपका यह दायित्व नहीं बनता कि, आप पहल करके उन्हें इस मानसिक कुन्दता से आज़ाद करायें?

हालाँकि मैं शादी-शुदा नही हूँ, लेकिन कुछ शादीशुदा लोगों से पूछना चाहता हूँ की क्या आज के युग में सब पति पत्निव्रता हैं?
आज की अधिकतर महिलाओं की जिन्दगी घरेलू हिंसा के साथ चल रही हैं जिसमें उनके पतियों का हाथ है।
ऐसी महिलाओं को करवाचौथ का व्रत रखना कैसा रहेगा?

भारत का पुरुष प्रधान समाज केवल नारी से ही सब कुछ उम्मीद करता हैं परन्तु नारी का सम्मान करना कब सोचेगा?
इस व्रत की शैली को बदलना चाइए जिससे महिलाएँ दिन भर भूखी-प्यासी ना रहे,

एक बात और मैंने अपनी आँखो से अनेक महिलाओ को करवा चौथ के दिन भी विधवा होते देखा है जबकि वह दिन भर करवा चौथ का उपवास भी किये थी,
दो वर्ष पहले मेरा मित्र जिसकी नई शादी हुई और पहली करवाचौथ के दिन सड़क हादसे में उसकी मृत्यु हो गई, उसकी पत्नी अपने पति की दीर्घायु के लिए करवाचौथ का व्रत किए हुए थी, तो क्यों ऐसा हुआ?

करवा चौथ के आधार पर जो समाज मे अंध विश्वास, कुरीति, पाखंड फैला हुआ है, उसको दूर करने के लिए पुरुषों के साथ खासतौर से महिलाए अपनी उर्जा लगाये तो वह ज्यादा बेहतर रहेगा।

मुझे पता है मेरे इस लेख पर कुछ लोग मुझपर ही उँगली उठाएंगे, धर्म विरोधी भी कहेंगे लेकिन मुझे कोई फर्क नही पड़ता,
क्योंकि मैंने सच लिखने की कोशिश की है, मैं हमेशा पाखंड पर चोट कर करता हूँ,
मैं वही लिखता हूँ जो मैं महसूस करता हूँ।
मैंने कितनी सही लिखा यह तो आप सभी दोस्तों की प्रतिक्रियाओँ से ही पता चलेगा
अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दे

प्रस्तुतकर्ता – सिकन्दर कुमार मेहता

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