धर्म शास्त्र,विवेक और विज्ञान के दुश्मन हैं, कैसे ?

धर्म शास्त्र विवेक और विज्ञान के दुश्मन हैं, कैसे आईये देखते हैं:

1. विज्ञान व भूगोल :
गंगा हिमालय के गंगोत्री हिमनद (ग्लेशियर) से निकलती है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
गंगा शिवजी की जटा से निकलती है और भगीरथ इसे स्वर्ग से धरती पर लाया था।

2. विज्ञान व भूगोल:
जल-वाष्प भरे बादल जब हवाओं के सम्पर्क में आते हैं तो वर्षा होती है

जबकि धर्म व शास्त्र :
वर्षा इंद्र देवता कराते हैं।

3. विज्ञान व भूगोल :
पृथ्वी अपनी धुरी पर 23 डिग्री झुकी हुई है। जब दो tectonic plates आपस में टकराती हैं तो भूकंप आता है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है और जब वह करवट बदलता है तो भूकम्प आता हैं। दूसरी जगह लिखा है कि प्रथ्वी बैल/गाय के सीगं पर टिकी हुई है और थक कर जब वह सीगं बदलता/ती है तो भूकम्प आता है।

4. विज्ञान व भूगोल :
पृथ्वी और चन्द्रमा परिक्रमा करते हुऐ जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के मध्य आ जाती है तो चंद्र ग्रहण होता है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
चंद्र ग्रहण के समय राहु चन्द्रमा को खा जाता है।

5. विज्ञान :
हवाई जहाज के माध्यम से मानव हवाई सैर करता है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
बिना किसी माध्यम के तथाकथित देवी देवता और राक्षस हवा में उड सकते थे।

6. विज्ञान :
यहां कौसो दूर भी दूरसंचार के माध्यम से मानव एक दूसरे से मन की बात कर सकते हैं।

जबकि धर्म व शास्त्र :
केवल साधु- संत ही बिना किसी माध्यम के ही मन की बात उन्हीं के बनाये ईश्वर से कर लिया करते थे।

अब फैसला आपका ?

आप अपने बच्चों का बौद्धिक विकास करने के लिए उन्हें विज्ञान पढ़ाते हैं या अंधविश्वासी बनाने के लिए उन्हे अप्रमाणित धर्म व शास्त्र ।

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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इंसान अंधविश्वासी क्यू बनता है ?

इस पोस्ट को पूरा पढ़ने से पहले ये समझ लेना जरूरी है कि कोई भी इंसान पैदा होता है, तो, वो कोई धर्म लेकर पैदा नही होता, उसे बचपन से जैसा सिखाया जाता है वो ठीक वैसा ही वो अनुसरण करता है,
1930 से रूस वालो ने अपने बच्चों को ये सिखाया की ना ही आत्मा होती है और ना ही परमात्मा होता है, पूरे 25 वर्ष लगे ये बात समझाने में तब जाकर उनकी पीढ़ी ये बात को समझी और आज रूस नास्तिक देश है, और साथ में विकसित देश है

आज यदि भारत के लोगो को यदि कोई, आत्मा, परमात्मा चमत्कार, भूत का अस्तित्व के बारे कोई कह रहा हो, तो जल्दी से उनके दिमाग मे उतरने लगता है। लेकिन इसके विपरीत कोई कुछ कह रहा है, तो उल्टा उसे पागल करार कर दिया जाता है ।

दोस्तो ऐसा क्यों होता है?

इसका जवाब ये है कि बचपन से होनेवाले हमारे मन पर आस्तिक संस्कार ।

स्कूल हो, या घर हो, थीएटर हो हर तरफ दैवीय शक्ति को बचपन से हमारे कच्चे मन मे बिठा दि जाती है।

ऐसे संस्कारो मे हम पलते है, बडे होते है और अपने अंतर्मन मे पक्का बैठ जाता है कि भगवान का अस्तित्व है , शैतान भी है ।उसे नकारने के लिए मन तैयार नही हो पाता। इसलिए आपने उन लोगो के सामने कितना भी माथा पीटे, तो भी वे यही कहेंगे कि भगवान है ।

आज भी टी.वी सिरीयल मे अंधविश्वास ,काल्पनिक बातो के अतिरिक्त और कुछ भी नही दिखाया जाता।
इसलिए आज से ही अपने बच्चो पर विज्ञानवादी संस्कार दो ताकि वे अंधविश्वास के जाल मे न फसे और खुद के फैसले खुद लेने लगेंगे किसी दैवीय शक्ति पर इसके लिए निर्भर न रहे ।

● बचपन मे माअ कहती है उधर मत जाना वर्ना भूत आ जाएगा. . .

● बचपन मे मा बताती है भगवान के सामने हाथ जोडकर बोल ‘भगवान मुझे पास कर दो ‘।

● टीवी पर कार्टून मे चमत्कार, जादू जैसी अवैज्ञानिक बाते दिखाकर बच्चो का मनोरंजन किया जाता है, लेकिन चमत्कार और जादू की बच्चो के अन्तर्मन मेें गहराई तक असर होता है और बड़े होने के बाद भी इंसान के मन मे चमत्कार और जादू के लिए आकर्षण कायम रहता है ।

● स्कूल मे जो विज्ञान सिखाया जाता है उसका संबंध रोजमर्रा की जिंदगी से न जोड़ना ।

● Law Of Monopoly मतलब 99% समाज के लोग इसी राह पर चल रहे है तो जरूर वे सही ही होंगे, हमने उनका अनुकरण करणा चाहिये ये समझ।

● इंसानी जीवन भाव भावनाओ का और उलझा होने के कारण उसमे असीम सुख और दुख की विस्मयकारक शाॅकिंग मिलावट है, जो बाते उसे हिलाकर रख देती है और उसका चमत्कारो पर यकीन पक्का होता जाता है ।

● हमने ये किया इसलिये ऐसा हुआ और हमने ऐसा नहीं किया इसलिए हमारे साथ वैसा कुछ हुआ है ।ऐसी कुछ योगायोग की घटनाओ को इंसान नियम समझकर जीवन भर उसका बोझ उठाता रहता है ।

●Law Of Repeated Audio Visual Effect- इस तत्व के अनुसार समाज मे मिडिया, माउथ पब्लिसिटी, सामाजिक उत्सव इत्यादि माध्यम से जो इंसान को बारबार दिखाया जाता है, सुनाया जाता है उसपर इंसान आसानी से यकीन कर लेता है ।

● ‘डर ‘ और ‘ लोभ ‘ ये दो नैसर्गिक भावनाए हर इंसान के भीतर बडे तौर पर होती है, लेकिन जिस दिन ये भावनाए इंसान के जीवन पर प्रभुत्व प्रस्थापित करती है तब वह मानसिक गुलामगिरी मे फसता जाता है ।

● और अंत मे सभी मे महत्वपूर्ण बात ‘चमत्कार’ होता है ऐसा सौ बार आग्रह से बताने वाले सभी धर्म के ग्रंथ इस बात की वजह है ।इसलिए धर्म ग्रंथ मे बतायी गयी अतिरंजित बाते कैसे गलत है, ये वक्त रहते ही बच्चो को समझाने की कोशिश करे ।

भारत अंधविश्वास मुक्त करो

भारत महासत्ता बनेगा

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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भारतीयों व विदेशियों द्वारा किया गया खोज/निर्माण

विदेशियों द्वारा की गई खोज/निर्माण

1. मोबाइल फोन
2. Facebook
3. WhatsApp
4. Email
5. Fan (पंखा)
6. जहाज
7. रेलगाड़ी
8. रेडियो
9. टेलीविजन
10. कम्प्यूटर
11. चीप (Memory Card)
12. कागज
13. प्रिंटर
14. वाशिंग मशीन
15. AC
16. फ्रीज
17. संविधान
18. चंद्रमा
19. ग्रह
20. पृथ्वी की आकृति
21. दूरबीन
22. सैटेलाइट
23. चुम्बक
24. घर्षण, गुरुत्वाकर्षण, न्यूटन के नियम
25. रोबोट
26. मैट्रो रेल
27. बुलेट ट्रेन
28. परमाणु बम, हाइड्रोजन बम
29. जल में अणु
30. बैंक का निर्माण

आदि-आदि और भी न जाने कितने ही ऐसे कार्य जिनकी शुरुआत विदेशों से हुई जिनको फॉलो करते हुए अन्य देश तरक्की की राह पर अग्रसर है!

भारतीयों की खोज/निर्माण

1. भूत-प्रेत
2. राक्षस/ चुड़ैल
3. आत्मा
4. आध्यात्मिक शक्ति
5. अनेक देवी-देवता जिनकी अलग-अलग दिन पूजा
6. सभी देवी-देवताओं के पास अलग-अलग प्रकार की शक्ति जैसे :- अनाज की देवी, धन की देवी, शिक्षा की देवी, मजदूर(कामगार) की देवी, भूत-प्रेत से बचाने वाले देवी-देवता, ग्रहों की दिशा बदलने वाले/प्रकोप दूर करने वाले आदि
7.अनेक व्रत/उपवास
8. सर्वाधिक मंदिरों का निर्माण
9. सर्वाधिक आध्यात्मिक गुरु
10. मंत्र/उपवास से इलाज करने वाले डाक्टर
11. मन चाहा प्यार, नौकरी, व्यापार में घाटा, गृह क्लेश, वशीकरण आदि का समाधान
12. शिक्षा में विज्ञान एवं महापुरुषों के योगदान की जगह आध्यात्मिक (गीता) शिक्षा
13. बाल विवाह
14. सती प्रथा
15. जाति वर्ग
16. शिक्षा, व्यापार का एकाधिकार
17. वैज्ञानिकता को आध्यात्मिकता से जोड़ना
18. मानव जाति का मुख्य वर्ग स्त्री को अधिकार देने पर हंगामा
19. आदि-आदि

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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चोटी काटने वाली चुड़ैल नहीं बल्कि है ये कीड़ा,लोगों ने पकड़ा ऐसा कीड़ा जो काटता है बाल..देखें वीडियो

जालंधर: इस समय देश के कुछ राज्यों में चोटी काटने वाली चुड़ैल का खौफ छाया हुआ है। लोगों में इतनी दहशत है कि वह रात के समय घर से बाहर भी नहीं निकल रहे हैं। कुछ दिन पहले कुछ पुरुषों ने भी दावा किया कि चोटी काटने वाली चुड़ैल या गैंग ने अब लगेपुरुषों को भी बनाना शुरूकर दिया है। लोगों का कहना है कि रात के समय चुड़ैल आती है और चुपके से चोटी काटकर चली जातीहै और किसी को इसके बारे में पता ही नहीं चलता है। peak cutter insects.

लोग लेने लगे हैं तांत्रिकों का सहारा:

सुबह जागने पर उनकी चोटी कटी हुई मिलती है। लोगों में इसका इतना खौफ फैला हुआ है कि लोग अब इसके उपाय के लिए तांत्रिकों का भी सहारा लेने लगे हैं। कुछ लोग चुड़ैल से बचने के लिए अपने घरों के मुख्य दरवाजे पर मेहन्दी के छाप भी लगाने लगे हैं। हालांकि यह एक अफवाह मात्र ही है या ऐसा सच में हो रहा है, इसके बारे में अभी तक कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं। पुलिस भी इस गुत्थी को अब तक सुलझाने में नाकामयाब रही है।

इस कड़ी में एक नया खुलासा हुआ है, जिसके बारे में जानकर आप हैरान हो जायेंगे।हाल ही में देर रात शहर के पुरानी सब्जी मंडी में लोगों ने एक कीड़े को पकड़ा और दावा किया कि यह कीड़ा चोटी काटता है। कुछ लोग इस बात से काफी खुश है कि आखिर पता चल गया कि कौन चोटी काट रहा है। घटना की सुचना मिलते ही मौके पर पहुँचे थाना 2के एस. आई. बलविंदर सिंह के कीड़े को कब्जे में लेकर जाँच शुरू कर दी है।

कीड़ा पीठ पर चढ़कर जा रहा था बालों की तरफ:

मंडी में दूकानदार के पास काम करने वाले अखिलेश यादव का कहना है कि उसनें दोपहर में सोशल मीडिया पर देखा कि एक कीड़ा महिलाओं की चोटी काटता है।उसने बताया कि देर रात उसका साथी दुकान में काम करता है। वह उस दिन भी काम कर रहा था, तभी एक कीड़ा उसके पीठ पर चढ़कर उसके बालों की तरफ बढ़ रहा था। उसनें उस कीड़े को पहचान लिया, जो सोशल मीडिया पर दिख रहे कीड़े से मिलता जुलता था।

यह देखते ही उसनें झट से कीड़े को कुलदीप के पीठ से नीचे गिरा दिया। इसके बाद कीड़े को मारने के लिए उसनें उसके ऊपर ईंट से भी प्रहारकिया, लेकिन कीड़ा मरा नहीं। यह देखकर उसनें शोर मचाना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में वहाँ आस-पास के कई दूकानदार इकठ्ठा हो गए। सभी ने मिलकर कीड़े को पकड़कर एक प्लास्टिक के डिब्बे में डाला।

एस. आई. बलविंदर सिंह का कहना है कि कीड़े को हिरासत में लेकर वह जंगल विभाग के अधिकारीयों से इसके बारे में बात करेंगे और पता लगायेंगे कि क्या सच में यह कीड़ा बाल काट सकता है या नहीं? इससे पहले कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।

वीडियो-

https://1manatheist.files.wordpress.com/2017/08/hair_cutting_insect.3gp

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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अन्धविश्वास : समाज में घुलता एक जहर

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भारत के गौरवशाली इतिहास में यहाँ की मान्यताओं का भी एक विशेष स्थान रहा है. यह अपने रीति –रिवाज और परम्पराओं के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता रहा है. पहले ये मान्यताएं हमारे हित में हमारे बड़ों द्वारा बनायीं गयी थीं,जो वैज्ञानिक आधार पर भी खरी उतरती थीं. जैसे…भोर की बेला में नहा धोकर तुलसी व् सूर्य को जल अर्पण करना. यहाँ तुलसी एक औषधि के रूप में कारगर है तथा उगते सूरज की किरणों से हमारे शरीर को विटामिन डी मिलता है. ऐसी ही अनेक रीतियाँ हमारे भले के लिए हमारे बुजुर्गों द्वारा बनायीं गई थीं, जिन्होंने आगे चलकर परम्पराओं का रूप ले लिया. लेकिन इन परम्पराओं में किसी दकियानूसी सोच के जुड़ जाने से कुछ गलत परम्पराएँ भी बन गयीं. जिन्हें हम रूढ़िवादिता या अन्धविश्वास कहते हैं.

तो जिन रीति रिवाजों से समाज में किसी का अहित होता हो वे अन्धविश्वास कहलाती हैं. मसलन विधवा स्त्री का किसी शुभ कार्य में शामिल होना अपशकुन माना जाना, या स्त्री का अपने पति की मौत पर सती के रूप में उसके साथ जिंदा जल जाना आदि. ऐसे अनेक कृत्य जो मानवता को तार तार करते हैं आज भी हमारे समाज में प्रचलित हैं. हांलाकि समय समय पर किसी न किसी समाज सुधारक द्वारा इन गलत मान्यताओं को सिरे से नाकारा गया है व् उनके खिलाफ आवाज भी बुलंद की गई है. फिर भी अपने स्वार्थ व् लालच के वशीभूत होकर कुछ लोग आज भी इन मान्यताओं और धर्म के नाम पर भोली भाली जनता को ठगने से बाज नहीं आते हैं. आज के दौर में जहाँ एक तरफ प्रौद्योगिकी व् तकनीकी विकास तेजी से हुआ है वहीँ दूसरी तरफ इन ढोंगी बाबाओं, अघोरियों, तांत्रिकों, पंडितों, ज्योतिषियों, अंकशास्त्रियों आदि काकारोबार भी लाखों, करोड़ों, अरबो, खरबों की शक्ल में फ़ैल चुका है. मजे की बात यह है कि,इन अंधविश्वासों में जकड़े लोग किसी वर्ग विशेष से संबंधित नहीं हैं. चाहे अमीर हो या गरीब, चाहे पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, नौकरीपेशा हो या कोई नेता अभिनेता. सभी इन बाबाओं के मकडजाल में उलझे हैं.

नित नए बढ़ते चैनलों में भी मीडिया द्वारा लगातार ऐसे बाबाओं के प्रवचन व् प्रोग्राम रात दिन दिखाए जाते हैं, जो साफ़ साफ़ आडम्बरयुक्त नजर आते हैं. ये भक्तों के नाम पर सिर्फ अपने व्यापारिक ग्राहकों की संख्या बढ़ाते हैं. निकम्में, बेकार, मनमौजी व् आलसी व्यक्ति के पास एक यही बेहतर विकल्प होता है कि, बाबा बन कर लोगों को ठगा जाय. ये वो व्यापार है जिसमे कोई रिस्क नहीं होता, और ना ही रुपयों का कोई बड़ा इन्वेस्टमेंट. भक्तों से मिले दान व् चढ़ावे से इनकी रोजी रोटी चलती है और एक दिन इसी की बदौलत ये ख्यात बाबाजी का चोला धारण कर लोगों पर बड़ी आसानी से राज करते हैं. आलीशान गाड़ियों और बड़े बड़े आश्रमों के मालिक ये बाबा जल्द ही अपनी ताकत के बल पर सिद्ध पुरुष या किसी भगवान् का अवतार बन जाते हैं. और भोली भाली जनता इन्हें पूजकर अपने आपको धन्य मानती है.
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इन बातों का ये मतलब कतई नहीं है कि आज के सभी संत महात्मा ऐसे ही ठग हैं. परन्तु संतों की जमात में ६०-७०% तक ऐसे ही लोग शामिल हैं. जो आमजन की परेशानियों व् तकलीफों की आंच पर अपने मतलब की रोटी सेंकने से बाज नहीं आते.

आजकल इंटरनेट के उपयोग में भी हमें इन अंधविश्वासों की झलक आसानी से देखने को मिल जाती है. उदाहरण के तौर पर फेसबुक और व्हाट्सअप  पर ऐसे सैकड़ों सन्देश रोजाना पोस्ट होते हैं जिनमे लिखा रहता है, तुरंत लाइक करें, नकारें नहीं. शाम तक कोई गुड न्यूज मिलेगी. या फिर ये मैसेज पढने के १५ सेकंड के भीतर ९ लोगों को सेंड करें, चमत्कार होगा. और फिर शाम तक ऐसी पोस्ट को लाखों लाइक मिल चुके होते हैं.

इसी तरह का एक वाकया मेरे साथ हुआ. अभी कुछ दिन पहले एक भाभीजी का व्हाट्सअप पर मैसेज आया, जिसमे एक विशाल पेड़ के अन्दर गणेश जी दिखाई दे रहे थे. लिखा था, ये फोटो तीन ग्रुप में सेंड करें. फोटो देखकर साफ़ लग रहा था कि ये ट्रिक फोटोग्राफी का कमाल है.जब कब उन भाभी जी के ऐसे ही मैसेज आते रहते थे. मैं परेशान हो चुकी थी. उस दिन मैंने कुछ हिम्मत जुटाकर उन्हें मैसेज किया कि मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करती, कृपया आगे से मुझे ऐसे मैसेज न भेजें. फिर तो जैसे मेरी शामत आ गई. जवाब में तुरंत उन भाभी जी का फ़ोन आया, जिस पर उन्होंने मुझे खूब खरी खोटी सुनाई कि ज्यादा पढ़े लिखे होने से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी तुम हिन्दू देवता का अपमान कर रही हो. मेरे लाख समझाने पर भी उन्होंने मुझे जी भर कोसा.

आज समाज में ऐसे कई उदाहरण रोजाना ही हमें देखने को मिलते हैं. क्या हम आशाराम बापू के घिनौने कृत्यों से वाकिफ़ नहीं हैं? फिर भी अंधभक्ति में जुटे कई लोगों को आज भी वे ईश्वरतुल्य नजर आते हैं. ये उजले वस्त्रधारी किन-किन संगीन गुनाहों में लिप्त हैं, ये कोई नहीं जानता या तो जानकर भी अपने फ़ायदे के लिए अनजान बना रहता है.

आज वक्त आ चुका है कि हम अपनी आधुनिकता का सही मायने में उपयोग कर समाज को इस गोरखधंधे से मुक्त करवायें. परम्पराओं और रूढ़िवादिता में अंतर समझें. विश्वास और अन्धविश्वास के बीच का महीन फ़र्क पहचानें. तभी हम अपने देश को दुनिया में आगे की पंक्ति में खड़ा कर पाएंगे.

— पूनम पाठक ‘पलक’

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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इस वक़्त इस मंदिर में भक्तों को मिलता है ‘पीरियड के खून’ से सना कपड़ा

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योनि, वेजाइना. एक ऐसा शब्द जिसे बोलने के पहले सौ बार सोचेंगे. उसके लिए दूसरे शब्द तलाशेंगे. और पीरियड्स की बात! वो तो भूल ही जाओ. आज भी देश के आधे पुरुष ये मानते हों कि पीरियड का मतलब पैड पर नीली स्याही गिरना है, तो अचंभा नहीं होगा.

मगर ऐसे ही समाज में एक मंदिर ऐसा है,जहां देवी की योनि की पूजा की जाती है. और साल में एक बार उन्हें होने वाले पीरियड पर बड़ा सा पर्व मनाते हैं.

असम में 22 जून से अंबुबाची पर्व शुरू होने वाला है.और ये अगले चार दिन यानी 25 जून तक चलने वाला है.देश भर से भक्त मंदिर में दर्शन के लिए जायेंगे. उस दौरान सिटी का ट्रैफिक थम जाएगा और सभी लोग इस फेस्टिवल को धार्मिक और पवित्र ज़ज्बे के साथ मनाएंगे. असम की सरकार ने श्रद्धालुओं को आकर्षित करने के लिए इसमें कुछ कल्चरल परफॉर्मेंसेस को भी जोड़ने का फैसला किया है.

अब सुनिए उस पर्व की कहानी, जहां मिलता है ‘पीरियड के खून’ से रंगा हुआ कपड़ा.

कामाख्या – ‘द मिथ

कामाख्या को ‘सती’ (जो कि भगवान शिव की पत्नी थीं) का एक अवतार माना जाता है.सती की मृत्यु के बाद, शिव ने तांडव नृत्य शुरू कर दिया था. उन्हें रोकने के लिए विष्णु ने अपना चक्र छोड़ा था. जिसने सती के शरीर को 51 हिस्सों में काट दिया था. ये 51 हिस्से धरती पर जहां-जहां गिरे, उन्हें ‘शक्तिपीठ’ का नाम दिया गया.इन्हीं में से एक हिस्सा वहां गिरा, जहां पर इस वक्त कामाख्या मंदिर है.क्यों पड़ा ये नाम? सती का गर्भाशय जिस जगह पर गिरा था, उसका पता तब तक नहीं चल पाया था जब तक कामदेव ने उसे ढूंढा नहीं था. कामदेव ने शिव के शाप से मुक्त होने के लिए इसे ढूंढा. कामदेव का शरीर तहस-नहस हो चुका था. लेकिन उन्होंने सती की योनि ढूंढ कर उसकी पूजा की. और अपना शरीर वापस पा लिया. इसलिए इस मंदिर या देवी को कामाख्या के नाम से जाना जाता है. क्योंकि कामदेव इनकी पूजा करते थे.

कामाख्या मंदिर

ये मंदिर 1565 में नर-नारायण ने बनवाया था. अपने बनने के साथ ही ये मंदिर अंबुबाची मेले से जुड़ गया था. मंदिर के गर्भगृह (मेन हिस्सा) में देवी की कोई मूर्ति नहीं है. उनकी पूजा की जाती है एक पत्थर के रूप में. जो एक योनि के आकार का है और जिसमें से नैचुरली पानी निकलता है.

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अंबुबाची मेला

अंबुबाची का पर्व ‘अहार’ (जिसे आषाढ़ कहते हैं) के महीने में आता है. आषाढ़ जून-जुलाई में आता है. जबसे कामाख्या मंदिर बना है,हर साल ये पर्व मनाया जाता है. महीने के आखिरी चार दिनों में ये मेला लगता है.ऐसा कहा जाता है कि ये वो चार दिन वो होते हैं, जब कामाख्या देवी को पीरियड आते हैं. मंदिर के दरवाज़े बंद रहते हैं. ऐसा कहा जाता है कि इस दौरान मंदिर के अंदर बने हुए एक छोटे से तालाब का पानी लाल रंग में बदल जाता है. प्रसाद के तौर पर देवी का निकलने वाला पानी या फिर अंगवस्त्र (लाल कपड़ा, जिससे देवी की योनि को ढका जाता है) मिलता है. लोग ऐसा मानते हैं कि इस प्रसाद में औरतों में होने वाली पीरियड से समस्याओं को ठीक करने और उन्हें ‘बांझपन’ से मुक्त करने की ताकत होती है.कौन जाता है इस पर्व में? नागा साधुओं से लेकर अघोरी तक. वो लोग भी, जो ये मानते हैं कि अधर्म ही ‘निर्वाण’ को पाने का सही रास्ता है; और सभी तरह के संन्यासी इस फेस्टिवल में जाते हैं. हालांकि ये पर्व सिर्फ साधुओं और संन्यासियों के लिए नहीं है. बल्कि असम राज्य के और हिस्सों से और भारत के हर कोने से लोग देवी के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने आते हैं.
इस साल असम के चीफ मिनिस्टर सर्बानंद सोनोवाल ने इस चार दिन के पर्व में एक कल्चरल परफॉर्मेंस भी जोड़ा है. इस इवेंट में कुछ स्थानीय कलाकारों की परफॉर्मेंसेस और लोक संगीत भी प्रस्तुत किया जाएगा. इसमें मंदिर का एक स्पेशल गाइडेड टूर भी होगा और साथ ही ब्रह्मपुत्र नदी में वॉटर स्पोर्ट्स भी.

दी लल्लनटॉप के लिए ये स्टोरी टीना दास ने लिखी है.

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[Video] :भीलवाड़ा: एक और तीन माह का मासूम बना अंधविश्वास का शिकार

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जिले में लगातार एक के बाद मासूम अंधविश्वास का शिकार बन रहे हैं। इन मासूमों पर उपचार के नाम पर अंधविश्वास के चलते परिजन कहर ढा रहे है। अबकि बार अंधविश्वास का शिकार बना एक तीन माह का मासूम। जिसे फुंसी के इलाज के नाम पर परिजनों ने गर्म व लाल सलाखों से दाग कर डाम लगा दिया।

भीलवाड़ा। जिले में लगातार एक के बाद मासूम अंधविश्वास का शिकार बन रहे हैं। इन मासूमों पर उपचार के नामपर अंधविश्वास के चलते परिजन कहर ढा रहे है। अबकि बार अंधविश्वास का शिकार बना एक तीन माह का मासूम। जिसे फुंसी के इलाज के नाम पर परिजनों ने गर्म व लाल सलाखों से दाग कर डाम लगा दिया।

जब बच्चे की हालत बिगड़ी तो उसे भीलवाड़ा के महात्मा गांधी चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। फिलहाल परिजन मासूम के डाम लगाने से साफ मुकर रहे है, जबकि बच्चे के शरीर पर लगे डाम के निशान साफ कहानी बयां कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें – अंधविश्वास : निमोनिया होने पर मासूम को गर्म चिमटे से दागा

बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष सुमन त्रिवेदी ने महात्मा गांधी चिकित्सालय पहुंच मासूम की कुशलक्षेम पूछी तथा वह परिजनों से घटना की जानकारी ले रही है।

यह डाम राजसमन्द जिले केरेलमगरा क्षेत्र के कुण्डिया गांव में बालक की दादी ने लगवाया था। राजसमन्द जिले के कुण्डिया में रहने वाले मुकेश राव के तीन माह के पुत्र गोविन्द के पेट पर फुंसियां होने की शिकायत पर उसकी दादी देऊबाई ने किसी गर्म चीज से उसे दाग दिया। बाद में बच्चे की हालत बिगड़ी तो उसे महात्मा गांधी चिकित्सालय के शिशु वार्ड में भर्ती कराया गया। चिकित्सालय प्रशासन ने इसकी सूचना अस्पताल चौकी पुलिस को दी।

भीलवाड़ा पुलिस ने इसकी सूचना राजसमन्द पुलिस को भेज दी है। सूचना पर बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष सुमन त्रिवेदी भी चिकित्सालय पहुंची। बच्चे की दादी देऊ बाई ने बताया कि उसकी पेट पर फुंसियां होने से उसके उपचार के लिए किसी पेड़ के पत्ते को गर्म करके लगाया था किसी गर्म सलाखों से नहीं दागा गया। सवा माह में डाम की यह पांचवीं घटना है।

वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

श्रोत : राजस्थान पत्रिका

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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