चोटी काटने वाली चुड़ैल नहीं बल्कि है ये कीड़ा,लोगों ने पकड़ा ऐसा कीड़ा जो काटता है बाल..देखें वीडियो

जालंधर: इस समय देश के कुछ राज्यों में चोटी काटने वाली चुड़ैल का खौफ छाया हुआ है। लोगों में इतनी दहशत है कि वह रात के समय घर से बाहर भी नहीं निकल रहे हैं। कुछ दिन पहले कुछ पुरुषों ने भी दावा किया कि चोटी काटने वाली चुड़ैल या गैंग ने अब लगेपुरुषों को भी बनाना शुरूकर दिया है। लोगों का कहना है कि रात के समय चुड़ैल आती है और चुपके से चोटी काटकर चली जातीहै और किसी को इसके बारे में पता ही नहीं चलता है। peak cutter insects.

लोग लेने लगे हैं तांत्रिकों का सहारा:

सुबह जागने पर उनकी चोटी कटी हुई मिलती है। लोगों में इसका इतना खौफ फैला हुआ है कि लोग अब इसके उपाय के लिए तांत्रिकों का भी सहारा लेने लगे हैं। कुछ लोग चुड़ैल से बचने के लिए अपने घरों के मुख्य दरवाजे पर मेहन्दी के छाप भी लगाने लगे हैं। हालांकि यह एक अफवाह मात्र ही है या ऐसा सच में हो रहा है, इसके बारे में अभी तक कोई पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं। पुलिस भी इस गुत्थी को अब तक सुलझाने में नाकामयाब रही है।

इस कड़ी में एक नया खुलासा हुआ है, जिसके बारे में जानकर आप हैरान हो जायेंगे।हाल ही में देर रात शहर के पुरानी सब्जी मंडी में लोगों ने एक कीड़े को पकड़ा और दावा किया कि यह कीड़ा चोटी काटता है। कुछ लोग इस बात से काफी खुश है कि आखिर पता चल गया कि कौन चोटी काट रहा है। घटना की सुचना मिलते ही मौके पर पहुँचे थाना 2के एस. आई. बलविंदर सिंह के कीड़े को कब्जे में लेकर जाँच शुरू कर दी है।

कीड़ा पीठ पर चढ़कर जा रहा था बालों की तरफ:

मंडी में दूकानदार के पास काम करने वाले अखिलेश यादव का कहना है कि उसनें दोपहर में सोशल मीडिया पर देखा कि एक कीड़ा महिलाओं की चोटी काटता है।उसने बताया कि देर रात उसका साथी दुकान में काम करता है। वह उस दिन भी काम कर रहा था, तभी एक कीड़ा उसके पीठ पर चढ़कर उसके बालों की तरफ बढ़ रहा था। उसनें उस कीड़े को पहचान लिया, जो सोशल मीडिया पर दिख रहे कीड़े से मिलता जुलता था।

यह देखते ही उसनें झट से कीड़े को कुलदीप के पीठ से नीचे गिरा दिया। इसके बाद कीड़े को मारने के लिए उसनें उसके ऊपर ईंट से भी प्रहारकिया, लेकिन कीड़ा मरा नहीं। यह देखकर उसनें शोर मचाना शुरू कर दिया। थोड़ी ही देर में वहाँ आस-पास के कई दूकानदार इकठ्ठा हो गए। सभी ने मिलकर कीड़े को पकड़कर एक प्लास्टिक के डिब्बे में डाला।

एस. आई. बलविंदर सिंह का कहना है कि कीड़े को हिरासत में लेकर वह जंगल विभाग के अधिकारीयों से इसके बारे में बात करेंगे और पता लगायेंगे कि क्या सच में यह कीड़ा बाल काट सकता है या नहीं? इससे पहले कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।

वीडियो-

https://1manatheist.files.wordpress.com/2017/08/hair_cutting_insect.3gp

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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अन्धविश्वास : समाज में घुलता एक जहर

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भारत के गौरवशाली इतिहास में यहाँ की मान्यताओं का भी एक विशेष स्थान रहा है. यह अपने रीति –रिवाज और परम्पराओं के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता रहा है. पहले ये मान्यताएं हमारे हित में हमारे बड़ों द्वारा बनायीं गयी थीं,जो वैज्ञानिक आधार पर भी खरी उतरती थीं. जैसे…भोर की बेला में नहा धोकर तुलसी व् सूर्य को जल अर्पण करना. यहाँ तुलसी एक औषधि के रूप में कारगर है तथा उगते सूरज की किरणों से हमारे शरीर को विटामिन डी मिलता है. ऐसी ही अनेक रीतियाँ हमारे भले के लिए हमारे बुजुर्गों द्वारा बनायीं गई थीं, जिन्होंने आगे चलकर परम्पराओं का रूप ले लिया. लेकिन इन परम्पराओं में किसी दकियानूसी सोच के जुड़ जाने से कुछ गलत परम्पराएँ भी बन गयीं. जिन्हें हम रूढ़िवादिता या अन्धविश्वास कहते हैं.

तो जिन रीति रिवाजों से समाज में किसी का अहित होता हो वे अन्धविश्वास कहलाती हैं. मसलन विधवा स्त्री का किसी शुभ कार्य में शामिल होना अपशकुन माना जाना, या स्त्री का अपने पति की मौत पर सती के रूप में उसके साथ जिंदा जल जाना आदि. ऐसे अनेक कृत्य जो मानवता को तार तार करते हैं आज भी हमारे समाज में प्रचलित हैं. हांलाकि समय समय पर किसी न किसी समाज सुधारक द्वारा इन गलत मान्यताओं को सिरे से नाकारा गया है व् उनके खिलाफ आवाज भी बुलंद की गई है. फिर भी अपने स्वार्थ व् लालच के वशीभूत होकर कुछ लोग आज भी इन मान्यताओं और धर्म के नाम पर भोली भाली जनता को ठगने से बाज नहीं आते हैं. आज के दौर में जहाँ एक तरफ प्रौद्योगिकी व् तकनीकी विकास तेजी से हुआ है वहीँ दूसरी तरफ इन ढोंगी बाबाओं, अघोरियों, तांत्रिकों, पंडितों, ज्योतिषियों, अंकशास्त्रियों आदि काकारोबार भी लाखों, करोड़ों, अरबो, खरबों की शक्ल में फ़ैल चुका है. मजे की बात यह है कि,इन अंधविश्वासों में जकड़े लोग किसी वर्ग विशेष से संबंधित नहीं हैं. चाहे अमीर हो या गरीब, चाहे पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, नौकरीपेशा हो या कोई नेता अभिनेता. सभी इन बाबाओं के मकडजाल में उलझे हैं.

नित नए बढ़ते चैनलों में भी मीडिया द्वारा लगातार ऐसे बाबाओं के प्रवचन व् प्रोग्राम रात दिन दिखाए जाते हैं, जो साफ़ साफ़ आडम्बरयुक्त नजर आते हैं. ये भक्तों के नाम पर सिर्फ अपने व्यापारिक ग्राहकों की संख्या बढ़ाते हैं. निकम्में, बेकार, मनमौजी व् आलसी व्यक्ति के पास एक यही बेहतर विकल्प होता है कि, बाबा बन कर लोगों को ठगा जाय. ये वो व्यापार है जिसमे कोई रिस्क नहीं होता, और ना ही रुपयों का कोई बड़ा इन्वेस्टमेंट. भक्तों से मिले दान व् चढ़ावे से इनकी रोजी रोटी चलती है और एक दिन इसी की बदौलत ये ख्यात बाबाजी का चोला धारण कर लोगों पर बड़ी आसानी से राज करते हैं. आलीशान गाड़ियों और बड़े बड़े आश्रमों के मालिक ये बाबा जल्द ही अपनी ताकत के बल पर सिद्ध पुरुष या किसी भगवान् का अवतार बन जाते हैं. और भोली भाली जनता इन्हें पूजकर अपने आपको धन्य मानती है.
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इन बातों का ये मतलब कतई नहीं है कि आज के सभी संत महात्मा ऐसे ही ठग हैं. परन्तु संतों की जमात में ६०-७०% तक ऐसे ही लोग शामिल हैं. जो आमजन की परेशानियों व् तकलीफों की आंच पर अपने मतलब की रोटी सेंकने से बाज नहीं आते.

आजकल इंटरनेट के उपयोग में भी हमें इन अंधविश्वासों की झलक आसानी से देखने को मिल जाती है. उदाहरण के तौर पर फेसबुक और व्हाट्सअप  पर ऐसे सैकड़ों सन्देश रोजाना पोस्ट होते हैं जिनमे लिखा रहता है, तुरंत लाइक करें, नकारें नहीं. शाम तक कोई गुड न्यूज मिलेगी. या फिर ये मैसेज पढने के १५ सेकंड के भीतर ९ लोगों को सेंड करें, चमत्कार होगा. और फिर शाम तक ऐसी पोस्ट को लाखों लाइक मिल चुके होते हैं.

इसी तरह का एक वाकया मेरे साथ हुआ. अभी कुछ दिन पहले एक भाभीजी का व्हाट्सअप पर मैसेज आया, जिसमे एक विशाल पेड़ के अन्दर गणेश जी दिखाई दे रहे थे. लिखा था, ये फोटो तीन ग्रुप में सेंड करें. फोटो देखकर साफ़ लग रहा था कि ये ट्रिक फोटोग्राफी का कमाल है.जब कब उन भाभी जी के ऐसे ही मैसेज आते रहते थे. मैं परेशान हो चुकी थी. उस दिन मैंने कुछ हिम्मत जुटाकर उन्हें मैसेज किया कि मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करती, कृपया आगे से मुझे ऐसे मैसेज न भेजें. फिर तो जैसे मेरी शामत आ गई. जवाब में तुरंत उन भाभी जी का फ़ोन आया, जिस पर उन्होंने मुझे खूब खरी खोटी सुनाई कि ज्यादा पढ़े लिखे होने से तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. ब्राह्मण कुल में जन्म लेकर भी तुम हिन्दू देवता का अपमान कर रही हो. मेरे लाख समझाने पर भी उन्होंने मुझे जी भर कोसा.

आज समाज में ऐसे कई उदाहरण रोजाना ही हमें देखने को मिलते हैं. क्या हम आशाराम बापू के घिनौने कृत्यों से वाकिफ़ नहीं हैं? फिर भी अंधभक्ति में जुटे कई लोगों को आज भी वे ईश्वरतुल्य नजर आते हैं. ये उजले वस्त्रधारी किन-किन संगीन गुनाहों में लिप्त हैं, ये कोई नहीं जानता या तो जानकर भी अपने फ़ायदे के लिए अनजान बना रहता है.

आज वक्त आ चुका है कि हम अपनी आधुनिकता का सही मायने में उपयोग कर समाज को इस गोरखधंधे से मुक्त करवायें. परम्पराओं और रूढ़िवादिता में अंतर समझें. विश्वास और अन्धविश्वास के बीच का महीन फ़र्क पहचानें. तभी हम अपने देश को दुनिया में आगे की पंक्ति में खड़ा कर पाएंगे.

— पूनम पाठक ‘पलक’

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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इस वक़्त इस मंदिर में भक्तों को मिलता है ‘पीरियड के खून’ से सना कपड़ा

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योनि, वेजाइना. एक ऐसा शब्द जिसे बोलने के पहले सौ बार सोचेंगे. उसके लिए दूसरे शब्द तलाशेंगे. और पीरियड्स की बात! वो तो भूल ही जाओ. आज भी देश के आधे पुरुष ये मानते हों कि पीरियड का मतलब पैड पर नीली स्याही गिरना है, तो अचंभा नहीं होगा.

मगर ऐसे ही समाज में एक मंदिर ऐसा है,जहां देवी की योनि की पूजा की जाती है. और साल में एक बार उन्हें होने वाले पीरियड पर बड़ा सा पर्व मनाते हैं.

असम में 22 जून से अंबुबाची पर्व शुरू होने वाला है.और ये अगले चार दिन यानी 25 जून तक चलने वाला है.देश भर से भक्त मंदिर में दर्शन के लिए जायेंगे. उस दौरान सिटी का ट्रैफिक थम जाएगा और सभी लोग इस फेस्टिवल को धार्मिक और पवित्र ज़ज्बे के साथ मनाएंगे. असम की सरकार ने श्रद्धालुओं को आकर्षित करने के लिए इसमें कुछ कल्चरल परफॉर्मेंसेस को भी जोड़ने का फैसला किया है.

अब सुनिए उस पर्व की कहानी, जहां मिलता है ‘पीरियड के खून’ से रंगा हुआ कपड़ा.

कामाख्या – ‘द मिथ

कामाख्या को ‘सती’ (जो कि भगवान शिव की पत्नी थीं) का एक अवतार माना जाता है.सती की मृत्यु के बाद, शिव ने तांडव नृत्य शुरू कर दिया था. उन्हें रोकने के लिए विष्णु ने अपना चक्र छोड़ा था. जिसने सती के शरीर को 51 हिस्सों में काट दिया था. ये 51 हिस्से धरती पर जहां-जहां गिरे, उन्हें ‘शक्तिपीठ’ का नाम दिया गया.इन्हीं में से एक हिस्सा वहां गिरा, जहां पर इस वक्त कामाख्या मंदिर है.क्यों पड़ा ये नाम? सती का गर्भाशय जिस जगह पर गिरा था, उसका पता तब तक नहीं चल पाया था जब तक कामदेव ने उसे ढूंढा नहीं था. कामदेव ने शिव के शाप से मुक्त होने के लिए इसे ढूंढा. कामदेव का शरीर तहस-नहस हो चुका था. लेकिन उन्होंने सती की योनि ढूंढ कर उसकी पूजा की. और अपना शरीर वापस पा लिया. इसलिए इस मंदिर या देवी को कामाख्या के नाम से जाना जाता है. क्योंकि कामदेव इनकी पूजा करते थे.

कामाख्या मंदिर

ये मंदिर 1565 में नर-नारायण ने बनवाया था. अपने बनने के साथ ही ये मंदिर अंबुबाची मेले से जुड़ गया था. मंदिर के गर्भगृह (मेन हिस्सा) में देवी की कोई मूर्ति नहीं है. उनकी पूजा की जाती है एक पत्थर के रूप में. जो एक योनि के आकार का है और जिसमें से नैचुरली पानी निकलता है.

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अंबुबाची मेला

अंबुबाची का पर्व ‘अहार’ (जिसे आषाढ़ कहते हैं) के महीने में आता है. आषाढ़ जून-जुलाई में आता है. जबसे कामाख्या मंदिर बना है,हर साल ये पर्व मनाया जाता है. महीने के आखिरी चार दिनों में ये मेला लगता है.ऐसा कहा जाता है कि ये वो चार दिन वो होते हैं, जब कामाख्या देवी को पीरियड आते हैं. मंदिर के दरवाज़े बंद रहते हैं. ऐसा कहा जाता है कि इस दौरान मंदिर के अंदर बने हुए एक छोटे से तालाब का पानी लाल रंग में बदल जाता है. प्रसाद के तौर पर देवी का निकलने वाला पानी या फिर अंगवस्त्र (लाल कपड़ा, जिससे देवी की योनि को ढका जाता है) मिलता है. लोग ऐसा मानते हैं कि इस प्रसाद में औरतों में होने वाली पीरियड से समस्याओं को ठीक करने और उन्हें ‘बांझपन’ से मुक्त करने की ताकत होती है.कौन जाता है इस पर्व में? नागा साधुओं से लेकर अघोरी तक. वो लोग भी, जो ये मानते हैं कि अधर्म ही ‘निर्वाण’ को पाने का सही रास्ता है; और सभी तरह के संन्यासी इस फेस्टिवल में जाते हैं. हालांकि ये पर्व सिर्फ साधुओं और संन्यासियों के लिए नहीं है. बल्कि असम राज्य के और हिस्सों से और भारत के हर कोने से लोग देवी के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने आते हैं.
इस साल असम के चीफ मिनिस्टर सर्बानंद सोनोवाल ने इस चार दिन के पर्व में एक कल्चरल परफॉर्मेंस भी जोड़ा है. इस इवेंट में कुछ स्थानीय कलाकारों की परफॉर्मेंसेस और लोक संगीत भी प्रस्तुत किया जाएगा. इसमें मंदिर का एक स्पेशल गाइडेड टूर भी होगा और साथ ही ब्रह्मपुत्र नदी में वॉटर स्पोर्ट्स भी.

दी लल्लनटॉप के लिए ये स्टोरी टीना दास ने लिखी है.

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[Video] :भीलवाड़ा: एक और तीन माह का मासूम बना अंधविश्वास का शिकार

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जिले में लगातार एक के बाद मासूम अंधविश्वास का शिकार बन रहे हैं। इन मासूमों पर उपचार के नाम पर अंधविश्वास के चलते परिजन कहर ढा रहे है। अबकि बार अंधविश्वास का शिकार बना एक तीन माह का मासूम। जिसे फुंसी के इलाज के नाम पर परिजनों ने गर्म व लाल सलाखों से दाग कर डाम लगा दिया।

भीलवाड़ा। जिले में लगातार एक के बाद मासूम अंधविश्वास का शिकार बन रहे हैं। इन मासूमों पर उपचार के नामपर अंधविश्वास के चलते परिजन कहर ढा रहे है। अबकि बार अंधविश्वास का शिकार बना एक तीन माह का मासूम। जिसे फुंसी के इलाज के नाम पर परिजनों ने गर्म व लाल सलाखों से दाग कर डाम लगा दिया।

जब बच्चे की हालत बिगड़ी तो उसे भीलवाड़ा के महात्मा गांधी चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। फिलहाल परिजन मासूम के डाम लगाने से साफ मुकर रहे है, जबकि बच्चे के शरीर पर लगे डाम के निशान साफ कहानी बयां कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें – अंधविश्वास : निमोनिया होने पर मासूम को गर्म चिमटे से दागा

बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष सुमन त्रिवेदी ने महात्मा गांधी चिकित्सालय पहुंच मासूम की कुशलक्षेम पूछी तथा वह परिजनों से घटना की जानकारी ले रही है।

यह डाम राजसमन्द जिले केरेलमगरा क्षेत्र के कुण्डिया गांव में बालक की दादी ने लगवाया था। राजसमन्द जिले के कुण्डिया में रहने वाले मुकेश राव के तीन माह के पुत्र गोविन्द के पेट पर फुंसियां होने की शिकायत पर उसकी दादी देऊबाई ने किसी गर्म चीज से उसे दाग दिया। बाद में बच्चे की हालत बिगड़ी तो उसे महात्मा गांधी चिकित्सालय के शिशु वार्ड में भर्ती कराया गया। चिकित्सालय प्रशासन ने इसकी सूचना अस्पताल चौकी पुलिस को दी।

भीलवाड़ा पुलिस ने इसकी सूचना राजसमन्द पुलिस को भेज दी है। सूचना पर बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष सुमन त्रिवेदी भी चिकित्सालय पहुंची। बच्चे की दादी देऊ बाई ने बताया कि उसकी पेट पर फुंसियां होने से उसके उपचार के लिए किसी पेड़ के पत्ते को गर्म करके लगाया था किसी गर्म सलाखों से नहीं दागा गया। सवा माह में डाम की यह पांचवीं घटना है।

वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

श्रोत : राजस्थान पत्रिका

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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गोरखधंधा : अंधविश्वास के दम पर कमा रहे दाम

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कोलकाता: 21वीं सदी में भी लोगों के मन में अंधविश्वास कायम है. इसकी एक बानगी नीमतल्ला श्मशान घाट पर देखने को मिल रही है. यहां सड़क पर डाला लगा कर कर बैठने वाले कुछ लोग दावा करते हैं कि उनके पास एक ऐसा मैजिकल धुआं है, जिससे दांत के कीड़े निकल जाते हैं, जबकि मेडिकल साइंस कहता है कि दांत में कीड़े होते ही नहीं हैं, लेकिन लोग मेडिकल साइंस के तथ्यों को दरकिनार कर इन ठगों के पास इलाज कराने पहुंच रहे हैं. 

नार्थ कोलकाता के नीमतल्ला शमशान घाट के अहिरी टोला घाट के निकट खुले आसमान के नीचे डेंटल क्लिनिक चलाया जाता है या यू कहें अंधविश्वास के नाम पर कुछ लोग अपनी रोजी रोटी तलाशते हैं. डेंटल क्लिनिक चलाने वाले ये दांतों के झोला छाप डॉक्टर एक्सट्रेक्टिंग फॉर्सेप्स (दांत उखाड़नेवाला चिमटा), रिट्रैक्टर, आईना जैसी उपकरणों को रखते हैं.

धुआं से निकलते हैं कीड़े

इलाज के विषय में ज्यादा जानने के लिए शंभु नाथ साव से बात किया. शंभु ने बताया कि वह डॉक्टर नहीं बन सका, लेकिन गत 20 सालों से लोगों के दांतों का इलाज कर रहा है.

उसने बताया कि दांत के लिए उपयोग में आने वाले उपकरण वह केवल दिखावे के लिए रखा है, ताकि लोग इलाज के लिए उसके डाला तक पहुंच सके. उसने बताया कि असल में इलाज इन चिकित्सकीय उपकरणों से नहीं, बल्कि मैजिकल धुंआ से किया जाता है. एक विशेष प्रकार के कांटा को सुखाकर उसका चुरन बनाया जाताहै. फिर इसे एक चीलम में जला कर कीड़े लगे दांत के नीचे धुंआ किया जाता है.उनका दावा है कि धुंआ करते ही दांत में लगे कीड़े नीचे गिरने लगते हैं. उस कीड़े को मरीज को भी दिखाया जाता है. कीड़ा निकालने के बाद करीब पांच दिन के भीतर मरीज स्वस्थ हो जाता है. इन पांच दिनों में मरीज को मीठा भोजन से दूर रहने की सलाह दी जाती है.

शंभु के अनुसार धुंआ से दांत झाड़ने के लिए 30 से 40 रुपये मरीज को खर्च करने पड़ते हैं. वहीं झाड़ने के बाद मरीज को अलग से दवा के लिए 40 रुपये खर्च करने पड़ते हैं.

शंभु का दावा है कि आयुर्वेदिक दवा मरीज को दी जाती है. उसने कहा कि दांत दर्द के लिए झाड़ फूंक किया जाता है.

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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अंधविश्वास : निमोनिया होने पर मासूम को गर्म चिमटे से दागा

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अस्पताल में भर्ती मासूम।

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भीलवाड़ा। जिले में अंधविश्वास का दंश मासूमों पर भारी पड़ रहा है। 24 घंटे के भीतर दो मासूसों को महात्मा गांधी चिकित्सालय में भर्ती करवाया गया है। इन दोनो मासूमों को निमोनियां होने के बाद अंधविश्वास के चलते गर्म सलाखों से दाग दिया। मासूमों की गंभीर हालत के चलते उन्हे अस्पताल में भर्ती करवाया गया। जहां अभी भी उनकी हालत गंभीर बनी हुई है।

गंगापुर थाने के चावण्डियां ग्राम में रहने वाले मुकेश बैरवा के एक वर्षिय पुत्र राजू को निमोनिया हो गया था। जिसे उपचार के नाम पर गर्म सलाखों से दाग दिया गया। वहीं बच्चे की मां सीमा बैरवा ने कहा कि इस दो-चार दिन से सांस की बिमारी हो गयी थी। इस पर लोगों ने इस गर्म सलाखों से डांव लगाने के लिए कहा। हमने इसके डांव लगाया लेकिन इसकी हालत में सुधार नहीं हो पाया।

दो साल की मासूम बच्ची की मौत भी हो चुकी ह
जिले में निमोनिया के बाद अंधविश्वास के चलते इस माह में ही कई बच्चों को गर्म सलाखों से दागा गया है। जिसमें बनेडा के आमली ग्राम में रहने वाली दो वर्षिय बच्ची पुष्पा बैरवा की पूर्व में ईलाज के दौरान मौत भी हो चुकी है। लेकिन फिर भी यह सिलसिला रूक नहीं पा रहा है। इसमें प्रभावी कानून भी है लेकिन फिर भी ग्रामीण इलाकों में ये बदस्तुर जारी है।

चार माह की मासूम को भी गर्म सलाखों से दागा
दूसरा मामला है मध्यप्रदेश के गुना जिले के फतेहगढ़ निवासी चार माह की परी का। परी को भी निमोनिया ठीक करने के नाम पर गर्म सलाखों से दागा गया है। जिसके बाद उसकी हालत और गंभीर हो गई है और परी को भी महात्मा गांधी चिकित्सालय में भर्ती करवाया है। जहां परी की स्थिती अभी भी गंभीर बताई जा रही है। गंभीर हालत में बालिका को भर्ती करवाया।

बिना बताए दादी ले गई और गर्म सलाखों से दगवा दिया
परी की मां पिंकी ने बताया कि परी को निमोनियां हो गया था। जिसके बाद पिंकी की  सांस किसी को बिना बताए कहीं ले गयी। जब वह परी को लेकर वापस आई तो इसके डांव लगे हुए थे।

सात बार मासूम को गर्म सलाखों से दागा
महिला बाल कल्याण समिति की अध्यक्षा सुमन त्रिवेदी ने कहा कि परी को एक नहीं करीब 7 बार गर्म सलाखों से डांव लगाये गये है। यह सब अंधविश्वास और अशिक्षा के चलते हो रहा है।

इस माह में चार मासूम बच्चों को करवाया अस्पताल में भर्ती महात्मा गांधी चिकित्सालय में इस माह में अब तक कुल 4 बच्चे भर्ती हो चूके हैं। जिन्हे गर्म सलाखों से दागा गया है। इनमें 19 अक्टूबर को लादुवास रेखा,13 जनवरी को बनेडा निवासी रेखा, 29 जनवरी को गंगापुर थाने के चावण्डिया ग्राम निवासी राजू व 30 जनवरी को एमपी के फतेहगढ़ निवासी परी को भर्ती करवाया गया है। महात्मा गांधी चिकित्सालय में साल भर में करीब 90 से अधिक मामले ऐसे आते हैं।

स्रोत : eenaduindia

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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झारखंड: मंदिर में गला काटकर दी जान

झारखंड के प्रसिद्ध छिन्नमस्तिका मंदिर में मंगलवार की सुबह एक व्यक्ति नेपूजा के दौरान गला काटकर जान दे दी.

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रजरप्पा थाना के प्रभारी अतिन कुमार ने बताया कि मरने वाले व्यक्ति का नाम संजय नट था. वो बिहार के बक्सर जिले के बलिहार गांव के रहने वाले थे.

पुलिस के मुताबिक संजय ने धारदार कटार से अपना गला काट लिया. इससे गर्दन का बड़ा हिस्सा धड़ से अलग हो गया.

छिन्नमस्तिका मंदिर झारखंड की राजधानी रांची से करीब सत्तर किलोमीटर दूर है.

मंदिर के मुख्य पुजारी असीम पंडा के मुताबिक सिद्धपीठ के तौर पर मशहूर इस मंदिर में बकरे की बलि की भी परंपरा है.

इस बीच रामगढ़ जिले के प्रभारी अनुमंडलाधिकारी महावीर प्रसाद ने मंदिर परिसर का जायजा लिया.उन्होंने मृतक के परिजन से बातचीत भी की.

प्रसाद ने बीबीसी को बताया कि ये तथ्य सामने आए हैं कि संजय नट पर देवी भक्ति का जुनून सवार था. हो सकता है इसी आवेग में उन्होंने अपना गला काट लिया होगा.उन्होंने बताया कि पुलिस को ये भी जानकारी मिली है कि संजय नट ओड़िशा में सीआरपीएफ के जवान के तौर पर तैनात थे. हालांकि इस बारे आधिकारिक तौर पर जानकारी जुटाई जा रही है.पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए हजारीबाग भेजा है और हथियार जब्त कर लिया है.

पुलिस को संजय के पास कागज का टुकड़ा मिला है, जिस पर उसके नाम और पते के साथ मोबाइल नंबर दर्ज है.मंदिर परिसर में लगे सीसीटीवी फुटेज से पुलिस को जानकारी हुई कि संजय नट सुबह मंदिर के पट खुलने के साथ पूजा करने पहुंच गए थे.

पहले उन्होंने कई दफा मंदिर की परिक्रमा की.स्थानीय लोगों ने उन्हें सोमवार की रात मंदिर परिसर के एक होटल में खाना खाते देखा था.

मंदिर के मुख्य पुजारी असीम पंडा ने बताया कि सुबह हुई इस घटना के बाद तत्काल पूजा-अर्चना रोक दी गई.संजय नट के शरीर का पूरा खून फर्श पर बह गया था.

इस घटना से वहां मौजूद लोग सकते में आ गए थे.पुजारी के मुताबिक घटना के बाद मंदिर के शुद्धिकरण का काम शुरू हुआ.पुलिस से मिले फोन नंबर के आधार पर जब संजय नट की पत्नी शारदा देवी से संपर्क किया गया तो वो बहुत कुछ बताने की स्थिति में नहीं थीं. लेकिन उन्होंने ये जानकारी दी कि वो बीस दिनों की छुट्टी पूरी करने के बाद रविवार को दिन में ड्यूटी पर जाने की बात कहकर निकले थे.

संजय नट ने परिवार वालों से कहा था अब वे अगली दफा वैशाख महीने में घर आएंगे.शारदा देवी ने बताया कि वो पूजा पाठ तो करते थे, लेकिन इसका कभी अभास नहीं था कि वे रजरप्पा जाकर इस तरह की घटना को अंजाम देंगे.

क्या वे सीआरपीएफ में तैनात थे, इस सवाल पर उन्होंने कहा किवो उड़ीसा पुलिस में थे.

स्रोत : BBC India

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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