पराविज्ञान पर वैज्ञानिक शोध व चुनौतियाँ

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सन 1922 में ‘साइंटिफिक अमेरिकन पत्रिका ने घोषणा की थी कि जो कोई भी जांच के दायरे में आकर १. आत्मा की फोटो लेगा या २. किसी भी अलौकिक शक्ति का प्रदर्शन करेगा, उसे वह 2,500 US$ ईनाम के रूप में देगी! सबसे पहले जॉर्ज वालेंटीन की जांच की गयी, जिसे जाँच टीम के द्वारा धोखा करते हुए पकड़ लिया गया और वह ईनाम नहीं जीत पाए! तब से लेकर अभी तक दुनियाभर के पचासों व्यक्तियों और संगठनों नें इस प्रकार के ईनाम की घोषणा की, मगर आज तक ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं हुआ,जो किसी भी व्यक्ति या संगठन से ईनाम की रकम जीत सका हो! हालाँकि चुनौती हजारों लोग स्वीकार चुके हैं, मगर सब कुछ तय करने के बाद प्रदर्शन के समय उनमें से कई आते ही नहीं, कुछ अलग अलग प्रकार के बहाने बनाते हैं, कुछ जवाब ही नहीं देते, और कुछ धोखा करते हुए पकड़ लिए जाते हैं! मतलब इन 92 वर्षो में (सन 2014 तक) ऐसा एक भी बाशिंदा नहीं मिला जिसका दावा सच निकला हो! ऊपरी नजर से देखने में सीधे-सीधे यह बात सिद्ध हो जाती है कि जितने भी व्यक्ति ऐसा दावा करते हैं, वो सभी धोखा करते हैं, उनके पास कोई अलौकिक शक्ति नहीं होती!

जॉर्ज वालेंटीन (George Valiantine) सन 1920 के आसपास चर्चा में आये क्योंकि इन्होने दावा किया था कि एलिएंस धरती पर आते हैं और उनका हाक चीफ और कोकम (Hawk Chief and Kokum) नाम के देवदूतों (Spirit-Guides) से संपर्क है!

सन 1882 में United Kingdomमें Society for Psychical Research नाम से अपने प्रकार की संसार की पहली संस्था का जन्म हुआ, जिसका उद्देश्य विभिन्न प्रकार के अलौकिक चमत्कारों वपरामनोवैज्ञानिक विषयों के सम्बन्ध में शोध करना था! यह संस्था आज भी सक्रिय है, इसके हजारों सदस्यों नें आजतक ढ़ेरों शोध किये हैं, और विभिन्न प्रकार के दावों की सच्चाई सामने लायी है जिसका निष्कर्ष है कि इन सभी घटनाओं के पीछे एक वैज्ञानिक कारण होता है, अलौकिक जैसी कोई भी चीज नहीं होती! इस संगठन की स्थापना के बाद इस विषय में शोध और लोगों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए समय-समय पर दुनियाभर में सैकड़ों संगठनों का जन्म हुआ! जिनमे से कुछ प्रमुख संगठनों के नाम इस प्रकार हैं

अमेरिका

  1. Center for Inquiry
  2. Committee for Skeptical Inquiry
  3. Independent Investigations Group
  4. James Randi Educational Foundation
  5. New England Skeptical Society
  6. The Skeptics Society

यूरोप

  1. Swedish Skeptics’ Association
  2. Hungarian Skeptical Society
  3. Irish Skeptics Society
  4. Italian Committee for the Investigation of Claims of the Paranormal
  5. Edinburgh Skeptics Society
  6. Merseyside Skeptics Society

भारत

  1. Federation of Indian Rationalist Associations
  2. Kerala Yukthivadi Sangham
  3. Maharashtra Andhashraddha Nirmoolan Samiti
  4. Science and Rationalists’ Association of India
  5. Dakshina Kannada Rationalist Association
  6. Tarksheel Society

अन्य

  1. Australian Skeptics
  2. Young Australian Skeptics
  3. Centre for Inquiry Canada
  4. New Zealand Skeptics
  5. Richard Dawkins Foundation for Reason and Science
  6. Brazilian society of skeptics and rationalists

पुनः ध्यान दें, इस सूची में सौ से अधिक संगठन हैं, यहाँ केवल कुछ महत्वपूर्ण संगठनों को नामांकित किया गया है! इन संगठनों का कार्य परामनोवैज्ञानिक विषयों पर शोध करना है! इन सभी के शोध का बस एक ही निष्कर्ष है, कि कुछ भी अलौकिक नहीं होता! हर घटना के पीछे एक कारण होता है, जिसकी व्याख्या वर्त्तमान वैज्ञानिक नियमों से की जा सकती है! तब भी कुछ साधूसन्यासी, ज्योतिषपण्डे और अलौकिक शक्तियों का दावा करने वाले दुसरे लोग लोगों को झूठ बोलकर भ्रमित करते हैं और चालबाजी से उन्हें कुछ न कुछ ऐसा करके दिखा देते हैं जिससे लोगों को उनपर विश्वास हो जाता है! ऐसे लोग हमेशा इन संगठनों से बचने की कोशिश करते हैं! कई बार ऐसे लोगों को इन संगठनों के द्वारा अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने का न्यौता भी दिया जाता है, मगर ये कभी भी उसका जवाब तक नहीं देते!

लोगों को इन जैसे धूर्तों के चंगुल से बचाने के लिए इनमें से आधे संगठनों ने ईनाम की घोषणा भी की हुई है! उनके ईनाम की धनराशी इतनी अधिक है,की अगर एक भी आदमी जीत जाए तो उनका संगठन ही बंद हो जाए, मगर न ही आजतक कोई जीत सका है और न ही कोई जीत पायेगा, क्योंकि कोई चमत्कार होता ही नहीं है! ईनाम देनें वाले कुछ बड़े संगठनों की सूची इस प्रकार है

भारत में

  1. तर्कशील सोसाइटी, पंजाब : एक करोड़ रूपए
  2. पबीर घोष : पचीस लाख रूपए
  3. Humanist Rationalist Association, Godhra: 50 लाख रूपए यह सिद्ध करने पर कि भूत होते हैं! [TOI]

भारत से बाहर

  1. James Randi Educational Foundation : दस लाख अमेरिकी डॉलर
    Update: जेम्स रांडी के रेटायर हो जाने के कारण जेम्स रांडी फ़ाउंडेशन के बोर्ड ने इस चैलेंज को बंद करने का फ़ैसला लिया है। अब यह बोर्ड प्रतिवर्ष लगभग एक लाख डालर विश्व भर की उन संस्थाओं को दान में देगा जो अंधविश्वास को दूर करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
  2. Australian Skeptics : एक लाख आस्ट्रेलियन डॉलर (करीब 50 लाख रूपए) [बीस हज़ार डॉलर उसे जो किसी का नाम घोषित करेगा तथा अस्सी हज़ार डॉलर उसे जो चुनौती पूरी करेगा. अगर किसी स्थिति में व्यक्ति अपना नाम खुद घोषित करता है, तो उसे ही पूरे एक लाख डॉलर मिलेंगे!] यह केवल आस्ट्रेलिया के नागरिकों के लिए ही है।
  3. Stuart Landsborough : 1,00,000 NZ$ (करीब 51 लाख रूपए)
  4. The Independent Investigations Group : 1,00,000 US$ (करीब 65 लाख रूपए) इसके अलावा उस व्यक्ति को 5000 US$ जो ऐसे किसी चमत्कारी व्यक्ति का पता बताएगा।
  5. Daniel Zepeda : 20,000 MX$ (करीब पांच लाख रूपए)
  6. Les Sceptiques du Québec : 10,000 CAD$ (करीब पांच लाख रूपए)
  7. Harry Houdini Prize : 1,000,000 RUB (क़रीब 12 लाख रुपए)

यहाँ सिर्फ दस संस्थानों के नाम और उनके द्वारा दी जाने वाली ईनाम की धनराशि लिखी गयी है! अगर आप उनकी चुनौती स्वीकार करना चाहें, तो उनके नाम पर क्लिक करके उनके घोषणा पृष्ठ पर पहुँच सकते हैं, मैंने सभी की डायरेक्ट लिंक लगा दी है! इसके अलावा अभी और भी कई सारे संस्थान हैं, मगर आप केवल इन दस से ही करीब तीन करोड़ रूपए कमा सकते हैं,यदि आपके पास एक भी अलौकिक शक्ति है!

आप इतनी देर से सोंच रहे होंगे कि ईनाम तो ठीक है, मगर इसे जीता कैसे जाए? वैसे तो ये सभी पुरस्कार किसी भी एक ऐसे चमत्कार को दिखाकर प्राप्त किये जा सकते हैं, जिसमें कोई चालबाजी न की गयी हो, जो अलौकिक हो! मगर यदि आप या आपका कोई परिचित देव पुरुष, संत,योगी, सिद्ध गुरु, स्वामी या अन्य दुसरे जिन्होंने आत्मिक क्रिया कलापों से या परमात्मा की शक्ति से शक्ति प्राप्त की हो, वह निम्नलिखित में से किसी भी एक का प्रदर्शन करके ईनाम की रकम जीत सकते हैं-

  1. जो सील बंद करेंसी नोट का क्रमांक पढ़ सकता हो!
  2. जो किसी करेंसी नोट की ठीक नक़ल पैदा कर सकता हो!
  3. जो जलती हुई आग पर, अपने देवता के सहारे आधे मिनट से अधिक तक नंगे पैर खड़ा हो सकता हो!
  4. ऐसी वस्तु, जिसकी मांग की जाए, हवा से पैदा कर सकता हो!
  5. मानसिक शक्ति से किसी वस्तु को हिला या मोड़ सकता हो!
  6. टेलीपैथी के माध्यम से किसी दुसरे व्यक्ति के विचार पढ़ सकता हो!
  7. प्रार्थना, आत्मिक शक्ति, गंगा जल या पवित्र राख से अपने शरीर के किसी अंग को एक इंच बढ़ा सकता हो!
  8. जो योग शक्ति से हवा में उड़ सकता हो!
  9. जो योग शक्ति से पांच मिनट के लिए अपनी नब्ज रोंक सकता हो!
  10. पानी के ऊपर पैदल चल सकता हो!
  11. अपना शरीर एक स्थान पर छोड़कर दुसरे स्थान पर प्रकट कर सकता हो!
  12. योग शक्ति से अपनी श्वसन क्रिया तीस मिनट तक रोंक सकता हो!
  13. रचनात्मक बुद्धि का विकास करे! भक्ति या अज्ञात शक्ति से आत्म ज्ञान प्राप्त करे!
  14. पुनर्जन्म के कारण कोई अद्भुद भाषा बोल सकता हो!
  15. ऐसी आत्मा या प्रेत को पेश कर सके जिसकी फोटो ली जा सके!
  16. फोटो लेने के उपरांत फोटो से गायब हो सकता हो!
  17. किसी वस्तु का भर बढ़ा सकता हो!
  18. ताला लगे कमरे में से अलौकिक शक्ति से बाहर आ सकता हो!
  19. किसी छिपी हुई वस्तु को खोज सकता हो!
  20. पानी को शराब या पेट्रोल में परिवर्तित कर सकता हो!
  21. शराब को खून में परिवर्तित कर सकता हो!
  22. ज्योतिषियों के लिए विशेष : ऐसे ज्योतिषी एवं पण्डे जो यह कहकर लोगों को गुमराह करते हैं कि ज्योतिष और हस्त रेखा एक विज्ञान है, वह भी इस ईनाम को जीत सकते हैं अगर वे दस हस्त चित्रों या दस ज्योतिष पत्रिकाओं को देखकर आदमी और औरत की अलग अलग संख्या, जीवित और मृत लोगों की अलग अलग संख्या, और उन सभी के जन्म का ठीक समय व स्थान, अक्षांश–रेखांश के साथ बात दें! इसमें पांच प्रतिशत की गलती माफ़ होगी!

उपरोक्त सभी 22 चुनौतियाँ डा. अब्राहम कोवूर नें सन 1963 में दी थीं, जिनमे से एक को भी पूरा करने वाले को वो बदले में एक लाख श्रीलंकन रूपए, जो उनकी जिंदगी भर की सारी कमाई थी, देने को तैयार थे! उनकी यह घोषणा उस समय दुनिया भर के सभी समाचार पत्रों में छपी थी! यह चुनौती उनकी म्रत्यु तक जारी रही, मगर कोई भी इसे जीत न सका! 1978 में उनकी म्रत्यु के बाद बसवा प्रेमानंद ने उनकी चुनौती को एक लाख भारतीय रूपए के रूप में चालू रखा! मगर 2009 में उनकी म्रत्यु भी हो गयी, मगर फिर भी इसे कोई न जीत सका! फिर दो वर्षो बाद अब्राहम कोवूर द्वारा श्रीलंका में स्थापित की गयी Sri Lanka Rationalist Association ने 2012 में उनकी चुनौती को दस लाख श्रीलंकन रूपए के ईनाम के साथ पुनः प्रारंभ कर दिया, जो कि अभी तक चल रही है! वहीँ दूसरी तरफ 1984 में मेघराज मित्र की अध्यक्षता में गठित ‘तर्कशील सोसाइटी, पंजाब‘ ने भी डा. कोवूर की चुनौती को अपने गठन के बाद से ही प्रारंभ रखा! ईनाम की रकम को बढ़ाते हुए आज 2014 में तर्कशील सोसाइटी ने इसे एक करोड़ रूपए तक बढ़ा दिया है! मगर आज तक कोई भी व्यक्ति इनमे से एक रूपए भी नहीं कमा पाया है!

इस पोस्ट की समाप्ति डॉ. कोवूर के ही कथन से करते हैं–

“जो मनुष्य अपने चमत्कारों की पड़ताल करने की आज्ञा नहीं देता, धोखेबाज होता है! जिसमें चमत्कारों की पड़ताल करने का साहस नहीं होता, वह अन्धानुयायी होता है! जो बिना पड़ताल किये ही विश्वास कर लेता है, वह मूर्ख होता है!“

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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बनारस हिन्‍दु विश्‍वविद्यालय की छात्राओं से घबराये संघी फासीवादी

बनारस हिन्‍दु विश्‍वविद्यालय की छात्राओं से घबराये संघी फासीवादी

गौरतलब है कि बनारस हिन्‍दु विश्‍वविद्यालय की कुछ छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटना के बाद भी प्रशासन ने जब कोई कार्रवाई नहीं की तो वहां की छात्राओं ने सड़क पर उतरने की ठानी। पिछले दो दिन से आन्‍दोलन को तोड़ने की तमाम कोशिशों के बावजुद छात्राएं डटी हुई हैं। उनके हॉस्‍टलों पर ताले लगा दिये गये हैं, चारों तरफ पुलिस, आरएएफ बिठा दी गयी है पर फिर भी उनके हौंसले बुलंद हैं। इसी दौरान बीएचयू में मोदी का भी दौरा था। इसी का बहाना बनाकर तमाम संघी इस आन्‍दोलन को बदनाम करने में जुट गये हैं। इस आन्‍दोलन के बारे में दो छोटे पोस्‍ट नीचे दिये हैं। पहला कमेंट मुकेस असीम का है। दूसरा दिशा छात्र संगठन व स्त्री मुक्ति लीग, इलाहाबाद द्वारा जारी पर्चा है।

1⃣ बीएचयू की छात्राओं द्वारा यौन अपराधियों के खिलाफ आंदोलन को एबीवीपी जब मोदी विरोधी आंदोलन बताता है तो वह यह सच्चाई ही बयान कर रहा होता है कि मोदी-योगी, आदि की संघी सरकारें खुद को पितृसत्ता से लेकर तमाम प्रतिक्रियावादी विचारों के वाहक ब्राह्मणवादी विचार के लम्पटों-लुच्चों का संरक्षक मानती हैं; और उनके विरोध को अपना विरोध|

यही वजह है कि बीएचयू का वाइस चांसलर पूरी बेशर्मी और प्रशासनिक ताकत के साथ लम्पटों, अपराधियों के साथ खड़ा है, अपराध की शिकार छात्रा के साथ झूठी हमदर्दी तक व्यक्त करने को तैयार नहीं है बल्कि उसे ही अपराध के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है, और विरोध में बहादुरी से डटीं छात्राओं (और छात्रों) पर हर तरह के दबाव-डराने-धमकाने के साथ ही दमन की भी तैयारी है|

हॉस्टलों पर ताले लगा दिए गए हैं, पीने के पानी के नल और शौचालय पर ताला लगा दिया गया है| साफ है कि कि ये हिन्दुत्वी लम्पट भी भारतीय विश्वविद्यालयों का वही हाल करना चाहते हैं जो ईरानी कठमुल्लाओं ने तेहरान और तालिबानियों ने काबुल विवि का किया था| पर हैदराबाद, दिल्ली, जेएनयू, मद्रास आईआईटी, जादवपुर, पंजाब (चंडीगढ़) से बीएचयू तक छात्र भी बता रहे हैं कि ऐसा नहीं होने दिया जायेगा|

2⃣ बी.एच.यू की बहनो, साथियो! तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं!! बी.एच.यू. प्रशासन मुर्दाबाद! पूँजीवादी पितृसत्ता का नाश हो! बहरी सरकार के कानों में आवाज़ पहुँचाने के लिए अपनी आवाज़ और ऊँचा करो!

देह नहीं होती है

एक दिन स्त्री

और उलट-पुलट जाती है

सारी दुनिया अचानक!

-कात्यायनी

बहनो, साथियो! बी.एच.यू. में एक छात्रा के साथ छेड़खानी की घटना के बाद बी.एच.यू की छात्राओं ने जिस तरह से जुझारू संगठित प्रतिरोध को जन्म दिया है वो एक मिसाल है।

*यह प्रतिरोध चढ्ढीधारी कुलपति और उसकी सरपरस्ती में पलने वाले लम्पटों के मुँह पर एक करारा तमाचा है जो छात्राओं के साथ होने वाली बदसलूकियों के लिए छात्राओं को ही ‘‘संस्कार’’ और ‘‘चरित्र’’ का पाठ पढ़ाते हैं।*

वास्तव में छात्राओं का फूट पड़ा ये आक्रोश गुण्डागर्दी-लम्पटई व प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ़ अरसे से इकट्ठा हुये गुस्से की अभिव्यक्ति है। बी.एच.यू. में यौन हिंसा और महिला विरोधी अपराधों को आलम यह है कि एक लड़की का रेप होता है और प्रशासन अपराधियों पर कार्यवाही करने के बजाय लड़की को ही मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर देता है। जब ‘नवीन गर्ल्स हॉस्टल’ की लड़कियाँ हॉस्टल की खिड़कियों के सामने खड़े लम्पट लड़कों की गन्दी हरकतों की शिकायत करती हैं तो वार्डन महोदया कहती हैं कि खिड़कियाँ बन्द कर लो।

एक अन्य शिकायत पर प्रॉक्टोरियल बोर्ड का एक कर्मचारी छात्रा से कहता है कि-‘आप हॉस्टल जायेंगी या रेप होने का इंतजार करेंगी।’

अब जब छात्राओं ने आन्दोलन का रास्ता पकड़ा तो सनातनी मूल्यों का ठेकेदार बना बी.एच.यू प्रशासन, वी.सी. के नेतृत्व में प्रॉक्टोरियल बोर्ड, मनुवादी छात्रों का गुण्डा गिरोह, सत्ता के तलवाचाट अखबार व चैनलों की झूठी रिपोर्टिंग, ज़रूरत पड़ी तो पुलिस इस आन्दोलन को कुचलने के लिए तैयार है।

हमें इससे यह भी समझ लेना चाहिए कि हमें संगठित होने और इस आन्दोलन को सतत आगे ले जाने की ज़रूरत है। क्योंकि शासन-प्रशासन कभी भी हमारे साथ नहीं खड़ा होने वाला। इसे यूँ भी समझा जा सकता है कि ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का जुमला फेंकने वाले जुमलेन्द्र बनारस में मौजूद थे। लेकिन इतनी बड़ी घटना पर चूँ तक नहीं किये।

स्त्रियों के उत्पीड़न की घटनाओं के खि़लाफ़ हमें संगठित होकर एक हाथ से पितृसत्ता का गर्दन दबोचना होगा दूसरे हाथ से मौजूदा व्यवस्था का, जो पितृसत्ता को निरन्तर खाद पानी देने का काम रहती है। हमें अपने आन्दोलन को सही दिशा देना होगा, संगठित होना होगा और स्त्री उत्पीड़न के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष को व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई से जोड़ देना होगा।

दिशा छात्र संगठन

स्त्री मुक्ति लीग

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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Atheists in Muslim world: Silent, resentful and growing in number

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Photo by: Oded Balilty

BABYLON, Iraq — Lara Ahmed wears a headscarf and behaves like a pious Muslim.

But the 21-year-old Iraqi woman hides a secret from her peers at the University of Babylon: her atheism.

“I was not convinced by the creation story in the Quran,” she said. “Besides, I feel religions are unjust, violate our human rights and devalue women’s identities.”

She doesn’t dare share her strong beliefs with strangers.

“I wear a headscarf despite being an atheist,” said Ms. Ahmed, who studies biology at the school, about 115 miles south of Baghdad. “It is difficult not to wear it in southern Iraq. Few women take the risk not to cover their hair. They face harassment everywhere.”

Her fears stem from the remarks of powerful politicians such as Ammar al-Hakim, the head of Iraq’s Islamic Supreme Council, a major Shiite political party and the president of the National Alliance, a Shiite parliamentary bloc.

“Some are resentful of Iraqi society’s adherence to its religious constants and its connection to God Almighty,” Mr. al-Hakim said on his party’s TV channel in May, claiming a rising tide of atheism was threatening the Arab world. “Combat these foreign ideas.”

Statistics on atheism in the Middle East and North Africa are hazy, but analysts say Ms. Ahmed represents an increasing trend basedon recent developments.

In 2014, an Egyptian government-run Islamic legal institute, citing a dubious international study, said that only 866 atheists lived in the country of more than 90 million. Recently released court statistics saying thousands of Egyptian women sought divorce in 2015 claiming their husbands were atheists — one of the few ways women can initiate divorce under Islam — suggested the numbers might be far higher.

In 2011, the now-defunct Kurdish news agency AK news published a survey finding that 67 percent of Iraqis believed in God and 21 percent said God probably existed, while 7 percent said they did not believe in God and 4 percent said God probably did not exist.

Today, the information revolution fueled by the internet, the freedoms released by the Arab Spring, the growing power of sectarian religious parties and the rise of the harsh orthodoxy ofthe Islamic State have all fueled growing unbelief in God and traditional religions, said atheists and others.

“For youths, who are the majority of new atheists, the savagery of the Islamic caliphate established by the Islamic State of Iraq and Syria in 2014 created a reaction that [has] shaken the religion’s image,” said Ali Abdul kareem Majeed, 22, a non atheist Iraqi sociology student who conducted a study on atheism for a religious body that he asked not to be identified for his safety.

Social Media Shutdown

Last year, Facebook shut down more than 50 atheist, Arabic-language pages in after extremist Muslim groups campaigned to remove them, according to a petition sent to Facebook by the Atheist Alliance-Middle East and North Africa, a U.S.-based global atheist federation.

Many of those Facebook pages have been since been relaunched.

In March 2015, U.S.-based Iraqi and other Arab atheists launched the Arabic and English-language Free Mind television and magazine websites, which promote atheistic view points and have recorded more than 1 million visits so far.

That led scholars at Al-Azhar University, a pre-eminent Sunni Muslim center of learning in Cairo, to call on Egyptian President Abdel Fattahel-Sissi to push Free Mind organizers to repent or face execution by beheading. Mr. el-Sissi responded by suggesting that those who insulted religion should lose their Egyptian citizenship.

Even so, online atheist programming is easily available in Arabic now.

Atheism is not illegal in Egypt or Iraq, but officials often level blasphemy or other charges against atheists in those countries. Those rejecting the faith face the death sentence in Saudi Arabia, Iran, theUnited Arab Emirates, Qatar, Yemen, Somalia, Sudan and Mauritania.

Many atheists in the region say their bigger fear is not being punished for their beliefs but that they will become targets of violent sectarian groups seeking political support from the faithful.

“It is a distraction from the fact that Islamists were not able to accomplish anything over the past 13 years,” said Faisal al-Mutar, a U.S.-based Iraqi human rights activist who heads Ideas Beyond Borders,a nonprofit that supports minorities in the Middle East. “So they want to create ‘anenemy’ to keep [the] constituency united against and avoid being held accountable for their mistakes.”

Keeping their beliefs secret is the norm for atheists of all backgrounds throughout the region.

In Jordan, an Amman-based writer at the Free Mind Magazine — whose last name is Farouki but who asked to keep her first name secret — said she is nearly estranged from her family, angered by her rebellion against religion. “They see me as insane,” said Farouki, 50.

“Jordanians can not accept atheists, and it is highly possible to be killed if you are one.”

Social media has provided atheists with a meeting place and source of information.

“Most of my atheist friends have not changed all of a sudden,” said Osama Dakhel, 21, a fine arts student in Baghdad. “Some were so devoted at first exploring the religion’s minute details. They start to read for Islamic reformers. Then they start to accept other opinions, discuss atheists online and end up atheists.”

Ahmed Abdul-Aziz, 22,a medical student in upper Egypt, also writes openly for the Free Mind Magazine on atheism. “It is easier to announce your ideas in Cairo,” he said. “Nobody would look after you, but in small rural towns, everyone watches the other.”

Even so, Mr. Abdul-Aziz said, he hides his beliefs from his own family.

“They will feel angry even modern Islamic ideas,”he said. “I am forced to attend the Friday prayers and fast during Ramadan. I feel uneasy to practice things I do not believe in.”

Ms. Ahmed paid a price for unwittingly drawing notice for not praying or fasting during Ramadan at the University of Babylon. “A colleague called me an ‘infidel’ and insisted on waking me up at dawn to pray,” she said. “I faced problems even for not using the name of Allah to swear.”

Source : The Washington Times, LLC

Brought To You By : Sikandar Kumar Mehta

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The little girl has been dead for 96 years. But then she opens her eyes

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In Palermo, Sicily, there’s a 100-year-old cloister built by Capuchin monks that’s famous for its crypt, filled with 2,000 mummies. Stored in a glass sarcophagus is one very particular person who found her final resting place there, a little girl.

Rosalia Lombardo was just two years old when she died of pneumonia in 1920. Her father, an Italian military officer named Mario Lombardo, almost died of grief after his little girl was taken away. Then he decided to do something that would preserve the beautiful child he loved so much: he commissioned an embalmer called Alfredo Salafia to prepare his daughter’s body. This involved replacing her bodily fluids with formaldehyde and treating the corpse with alcohol. The result is astonishing.

Watch the strange phenomenon for yourself in slow motion Watch Video

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The toddler with sweet blond locks and a peaceful look seems like she might have just dozed off and could wake up at any moment, despite having died nearly 100 years ago. And this body has a creepy secret that’s made quite a few people wonder if it’s really dead or not.

Numerous visitors have witnessed what should be impossible: Rosalia opens and closes her eyes!

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Experts explain that it’s caused by an optical illusion from light and her already slightly open eyelids. But when you see it, you’ll get goosebumps just as generations of other visitors have.

Rosalia Lombardo, the sleeping beauty of the crypt, is one of the best preserved mummies on Earth and has fascinated people from all over the world. This little girl’s legend may just survive for another hundred years…

Brought To You By : Sikandar Kumar Mehta

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The word God is the product of human weakness

The word God is the product of human weakness

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In January of 1954, just a year before his death, Albert Einstein wrote the following letter to philosopher Erik Gutkind after reading his book, “Choose Life: The Biblical Call to Revolt“, and made known his views on religion. Apparently Einstein had only read the book due to repeated recommendation by their mutual friend Luitzen Egbertus Jan Brouwer. The letter was bought at auction in May 2008, for £170,000; unsurprisingly, one of the unsuccessful bidders was Richard Dawkins.

Translated transcript follows.

(Source: David Victor; Image: Albert Einstein,via.)

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Translated Transcript

Princeton, 3. 1. 1954

Dear Mr Gutkind,

Inspired by Brouwer’s repeated suggestion, I read a great deal in your book, and thank you very much for lending it to me. What struck me was this: with regard to the factual attitude to life and to the human community we have a great deal in common. Your personal ideal with its striving for freedom from ego-oriented desires, for making life beautiful and noble, with an emphasis on the purely human element. This unites us as having an “unAmerican attitude.”

Still, without Brouwer’s suggestion I would never have gotten myself to engage intensively with your book because it is written in a language inaccessible to me. The word God is for me nothing more than the expression and product of human weakness, the Bible a collection of honorable, but still purely primitive, legends which are nevertheless pretty childish. No interpretation, no matter how subtle, can change this for me. For me the Jewish religion like all other religions isan incarnation of the most childish superstition. And the Jewish people to whom I gladly belong, and whose thinking I have a deep affinity for, have no different quality for me than all other people. As far as my experience goes, they are also no better than other human groups, although they are protected from the worst cancers by a lack of power. Otherwise I cannot see anything “chosen” about them.

In general I find it painful that you claim a privileged position and try to defend it by two walls of pride, an external one as a man and an internal one as a Jew. As a man you claim, so to speak, a dispensation from causality otherwise accepted, as a Jew the privilege of monotheism. But a limited causality is no longer a causality at all, as our wonderful Spinoza recognized with all incision, probably as the firstone. And the animistic interpretations of the religions of nature are in principle not annulled by monopolization. With such walls we can only attain a certain self-deception, but our moral efforts are not furthered by them. On the contrary.

Now that I have quite openly stated our differences in intellectual convictions it is still clear to me that we are quite close to each other in essential things, i.e; in our evaluations of human behavior. What separates us are only intellectual “props” and “rationalization” in Freud’s language. Therefore I think that we would understand each other quite well if we talked about concrete things.

With friendly thanks and best wishes,

Yours,

A. Einstein

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स्‍त्री क्‍या चाहती है ?

रविवार डाइजेस्ट पत्रिका में एक बहस चल रही है : स्त्री क्या चाहती है? इस बहस में मई अंक में कविता कृष्‍णपल्‍लवी का ये लेख प्रकाशित हुआ है।

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स्त्री क्या चाहती है?
सब से पहले तो आजादी
कविता कृष्‍णपल्‍लवी

बुनियादी सवाल यह नहीं है कि स्‍त्री क्‍या चाहती है, बल्कि यह है कि उसे क्‍या चाहना चाहिए, उसकी चाहत क्‍या होनी चाहिए, या वस्‍तुगत तौर पर स्‍त्री की मनुष्‍यता की शर्तें क्‍या हो सकती हैं।
स्‍त्री क्‍या चाहती है? यह प्रश्‍न कई अवस्थितियों से, कई धरातलों पर पूछा जा सकता है और इसके उत्‍तर भी इतनी ही भिन्‍नताएँ लिये हुए होंगे।

स्‍त्री की चाहत समय और समाज की चौहद्दी का अतिक्रमण नहीं कर सकती।

आज से सौ या पचास साल पहले की स्‍त्री की चाहत वही नहीं थी जो आज की स्‍त्री की है। सामाजिक विकास और सामाजिक चेतना के स्‍तरोन्‍नयन के साथ स्‍त्री चेतना भी उन्‍नत हुई है और उसकी इच्‍छाओं-कामनाओं-स्‍वप्‍नों के क्षितिज का विस्‍तार हुआ है। दूसरी बात यह है कि इतिहास के एक ही कालखण्‍ड में
एक कुलीन मध्‍यवर्गीय स्‍त्री की चाहत एक मेहनतकश स्‍त्री की चाहत से भिन्‍न होती है।
यानी सामाजिक वर्गीय स्थिति भी स्‍त्री की इच्‍छा, कामना और स्‍वप्‍नों की अन्‍तर्वस्‍तु और स्‍वरूप का निर्धारण करती है।
सामान्‍यीकरण करते हुए स्‍त्री की चाहत के बारे में यदि कुछ कहना ही हो तो कहा जा सकता है कि स्‍त्री आजादी चाहती है। लेकिन हर स्‍त्री के लिए आजादी का बोध अलग-अलग है, उसकी चेतना के सापेक्ष है। आजादी के मिथ्‍याभास से ले कर वास्‍तविक, वस्‍तुगत आजादी के बोध के बीच तक स्‍त्री-चेतना का व्‍यापक वर्णक्रम फैला हुआ है। प्रबुद्ध स्त्रियों को ही लें, तो कुछ स्त्रियाँ स्‍त्री समुदाय की गुलामी के लिए पुरुषों को जि़म्‍मेदार मानती हैं, कुछ पितृसत्‍ता और पुरुषवर्चस्‍ववाद को, कुछ परिवार के पितृसत्‍तात्‍मक ढाँचे को, कुछ पुरुषों द्वारा निर्धारित स्‍थापित यौन व्‍यवहार की रूढि़यों को, और कुछ जैविक पुनरुत्‍पादन की स्त्रियों की प्राकृतिक विशिष्‍टता को ही स्त्रियों की गुलामी का मूल कारण मानती हैं। अपने इन्‍हीं सोचों के हिसाब से कुछ स्त्रियाँ सभी पुरुषों के खि़लाफ़ शाश्‍वत युद्धघोष करती रहती हैं और अन्‍धविद्रोह के जुनून में इस मूल प्रश्‍न पर सोच ही नहीं पातीं कि इस युद्ध का नतीजा क्‍या होगा और स्त्रियों को मुक्ति हासिल कैसे होगी? कुछ स्त्रियाँ लगातार विमर्श करते हुए सामाजिक ढाँचे, मूल्‍यों, संस्‍थाओं और स्‍त्री-पुरुष के अन्‍तरवैयक्तिक सम्‍बन्‍धों में पुरुष-वर्चस्‍ववाद और पितृसत्‍ता की शिनाख्त करती रहती हैं, पर व्‍यावहारिक समाधान कुछ नहीं बतातीं। कुछ व्‍यावहारिक समाधान के तौर पर परिवार के विध्‍वंस, विवाह और एकनिष्‍ठ प्‍यार के रिश्‍तों की समाप्ति, विज्ञान की मदद ले कर प्रजनन के काम से मुक्ति, या पुरुष वर्चस्‍वनिष्‍ठ सेक्‍सुअल रूढ़ियों को चकनाचूर करने के लिए विचलनशील यौन व्‍यवहार (‘डेविएण्‍ट सेक्‍सुअल बिहेवियर’ जिसके उदाहरण ‘एलजीबीटीक्‍यू मूवमेण्‍ट’ में मिलते हैं) के ध्‍वंसवादी अराजकतावादी नारे देती रहती हैं, लेकिन उनके पास व्‍यापक स्‍त्री समुदाय को लामबन्‍द करने का न तो कोई कार्यक्रम होता है, न ही स्‍त्री-पुरुष समानता आधारित वैकल्पिक सामाजिक ढाँचे और मूल्‍यों-संस्‍थाओं का कोई मानचित्र। कुछ ही ऐसी प्रबुद्ध प्रगतिशील स्त्रियाँ मिलेंगी जो नृतत्‍वशास्‍त्र और इतिहास के साक्ष्‍य से इस तथ्‍य को समझती हैं कि पितृसत्‍ता और पितृसत्‍ता-आधारित परिवार संस्‍था का जन्‍म इतिहास में निजी सम्‍पत्ति, वर्ग और राज्‍यसत्‍ता के उद्भव के साथ हुआ था और उनके समूल नाश की नियति भी इन्‍हीं के विलोपन के साथ जुड़ी हुई है। ऐसी प्रबुद्ध स्त्रियाँ सम्‍पूर्णत: स्‍त्री मुक्ति को एक दूरवर्ती लक्ष्‍य मानती हैं और स्त्रियों के मुक्ति संघर्ष को मेहनतकशों के उस मुक्ति संघर्ष से जोड़ने की बात करती हैं, जिसका फौरी निशाना पूँजीवादी तंत्र होता है, लेकिन दूरगामी लक्ष्‍य निजी सम्‍पत्ति, वर्गों और राज्‍यसत्‍ता का विलोपन होता है।
यह तो हुई प्रबुद्ध स्त्रियों की बात, लेकिन यदि आम शिक्षित मध्‍यवर्गीय (विशेषकर युवा) स्त्रियों की बात करें तो उनकी आजादी की परिभाषा और उनकी चाहतों की प्रकृति मुख्‍यत: उनकी उस ‘मिथ्‍या चेतना’ (‘फॉल्‍स कांशसनेस’) से तय हो रही है जो ‘माल अन्‍धपूजा’ (‘कमोडिटी फेटिशिज्म’) की उपभोक्‍ता संस्‍कृति से जन्‍मी है। उपभोक्‍ता वस्‍तुओं की चमक-दमक से मोहाविष्‍ट यह आबादी स्‍वयं अपने वस्‍तुकरण की प्रक्रिया को नहीं समझ पाती, मुद्रा की शक्ति से स्‍थूल ऐन्द्रिक आनन्‍द हासिल करने की हैसियत के चलते सिर्फ अपनी आजादी (वह भी मिथ्‍याभासी) के बारे में सोचती है और कई बार रूढियों-वर्जनाओं को तोड़ने की झोंक में अराजक यौन व्‍यवहार तक करने लगती है। कालान्‍तर में इन्‍हें भी उन्‍हीं मध्‍यवर्गीय गृहिणियों में शामिल हो जाना होता है, जो या तो तीज-जिउतिया-करवाचौथ में लगी रहती हैं, या यौन सुख की अतृप्ति और दाम्‍पत्‍य की बोरियत को झेलती हुई असमय बूढ़ी होती रहती हैं, माइग्रेन और डिप्रेशन का इलाज कराती रहती हैं, किटी पार्टियों और पार्लरों में स्‍वयं को व्‍यस्‍त रखती हैं, या अपने पतियों की बेवफाई और बेरुखी का बदला लेने के तर्क से अपने अपराध बोध का शमन करके विवाहेतर रिश्‍तों और पुरुष-वेश्‍याओं (मेल-एस्‍कोर्ट या गिगोलो) का सहारा लेने लगती हैं। एक विवाहिता कामकाजी स्‍त्री भी इन विडम्‍बनाओं से मुक्‍त नहीं होती। यह दुखी स्‍त्री समुदाय भी अपने अँधेरों से बाहर आना चाहता है, अपनी आत्‍मा को खोल कर रख देने के लिए प्‍यार और दोस्ती चाहता है, जि़न्‍दगी में कुछ नयापन चाहता है, पर इसका रास्‍ता उसे नहीं पता। इन‍ स्त्रियों के पास भौतिक अभाव की पीड़ा उतनी नहीं है, जितनी आत्मिक रिक्‍तता की घुटन। बदहवास ये अपनी मुक्ति की राह ढूँढ़ती रहती हैं, जीते-जीते थक कर निढाल होती रहती हैं और अँधेरे में दीवारों से टकरा-टकरा कर घायल होती रहती हैं।
निम्‍न मध्‍यवर्गीय गृहिणियों का बहुलांश ‘ऑटो-सजेस्टिव’ ढंग से स्‍वयं को ‘कनविंस’ कर लेता है कि उसके पति और बेटे के सुख, कामयाबी और तरक्‍की की चाहत ही उसकी अपनी चाहत है। कभी किसी असावधान क्षण में उसकी अपनी कोई अधूरी-अतृप्‍त इच्‍छा-कामना सिर उठाती है तो वह बड़ी सुखाने चली जाती है, टीवी पर सीरियल देखने लगती है, ज्यादा से ज्यादा मोल-तोल के लिए संकल्‍पबद्ध होकर सब्‍जी खरीदने निकल पड़ती है, या फिर किसी एक पड़ोसन के घर दूसरी पड़ोसनों और उनके बिगड़ते बाल-बच्‍चों की शिकायत करने पहुँच जाती है। फिर भी, ऐसी स्‍त्री भी कई बार रात में मानो किसी घुटन भरे सपने से जाग कर सहसा उठ बैठती है और सोचने लगती है कि एक लय के साथ फूलती-पिचकती तोंद वाला, कानफाड़ू खर्राटा लेता यह कौन है जो उसके बाजू में लेटा हुआ है? घबरा कर वह आँगन में या छत पर निकल आती है और कुछ देर उदास तारों की छाँव तले बैठी रहती है।
मजदूर स्त्रियों की जि़न्‍दगी ही ऐसी होती है कि उनकी आजादी के स्‍पेस से जुड़े बहुतेरे सवालों को उनकी रोजमर्रा की जद्दोजहद का फौरी सवाल बना देती है। कमरतोड़ महँगाई में घर चलाने के लिए वह घर से बाहर निकलती है तो बहुधा उसे अपने पति के विरोध का भी सामना करना पड़ता है जो चाहता है कि पत्‍नी बाहर निकलने की जगह घर पर ही पीस रेट पर ला कर कुछ काम कर लिया करे। इस विरोध का सफलतापूर्वक सामना करके वह बाहर निकलती है और बाहर फैली हुई दुनिया में न सिर्फ़ पगार बढ़ाने और अधिकारों की लड़ाई में शामिल होने की जरूरत महसूस करने लगती है, बल्कि सुपरवाइजर-फ़ोरमैन और सड़क के शोहदों की गन्‍दी निगाहों और गन्‍दी हरकतों का मुक़ाबला करते हुए उसे अपनी आजादी के लिए रोज़-रोज लड़ते हुए जीने का सलीका भी बेहतर ढंग से आ जाता है। *आर्थिक स्‍वतंत्रता के कारण, निकृष्‍टतम कोटि की उजरती गुलामी और घर में भी किसी हद तक पुरुष स्‍वामित्‍व को झेलने के बावजूद मज़दूर स्त्रियों के जीवन में मध्‍यवर्गीय स्त्रियों की अपेक्षा जीवन रस अधिक होता है, उनकी इच्‍छाओं-कामनाओं का क्षितिज अधिक विस्‍तारित होता है और वर्णक्रम अधिक वैविध्‍यपूर्ण होता है।* मजदूर बस्तियों में काम करने के अपने लम्‍बे अनुभव के दौरान मैंने पाया है कि आधुनिकता के जीवन मूल्‍यों का प्रवेश मज़दूर स्त्रियों के जीवन में ज्‍़यादा स्‍वस्‍थ रूपों में हुआ है। महानगरों की मजदूर बस्तियों में युवा स्‍त्री-पुरुष मजदूरों और मजदूरों के युवा बेटे-बेटियों के बीच प्रेम और विवाह की घटनाएँ लगातार ज्‍़यादा से ज्‍़यादा आम होती जा रही हैं। अब ऐसी शादियाँ जाति ही नहीं, बल्कि राष्‍ट्रीयताओं की दीवारों को भी तोड़ कर हो रही हैं। शराबखोरी, आवारागर्दी या महज न पटने के कारण भी मजदूर स्त्रियाँ कई बार बिना किसी हिचक-परेशानी के अपने पति को छोड़ देती हैं और दूसरे किसी मजदूर के साथ घर बसा लेती हैं। अब ये चीजें उतना विवाद या लोकापवाद का विषय भी नहीं बनतीं।
स्‍त्री चाहती क्‍या है? — अब इस सवाल को एक दूसरे तरीके से देखें। स्‍त्री अपनी चाहत को जो अभिव्‍यक्ति देती है, वह वास्‍तव में उसकी ‘मिथ्‍या चेतना’ (‘फॉल्‍स कांशसनेस’) की उपज होती है। आम स्‍त्री की चेतना, उसकी इच्‍छा, कामना, कल्‍पना और सपने उस सामाजिक परिवेश द्वारा अनुकूलित होते हैं, जिस पर पितृसत्‍तात्‍मकता का वर्चस्‍व स्‍थापित होता है। इसलिए, प्राय: वह वही चाहती है, जो चाहने के लिए उसका मानसिक अनुकूलन किया गया है, या उस दायरे में चाहती है (आजादी, प्‍यार या कुछ भी) जो उसके लिए तय किया गया है। इसलिए, बुनियादी सवाल यह नहीं है कि स्‍त्री क्‍या चाहती है, बल्कि यह है कि उसे क्‍या चाहना चाहिए, उसकी चाहत क्‍या होनी चाहिए, या वस्‍तुगत तौर पर स्‍त्री की मनुष्‍यता की शर्तें क्‍या हो सकती हैं। फिर भी, कोई भी मानसिक अनुकूलन सम्‍पूर्ण नहीं हो सकता। भौतिक-आत्मिक वंचना और उत्‍पीड़न की वस्‍तुगत स्थिति से उपजी चेतना हर स्‍त्री की अनुकूलित चेतना से टकराती है और इस संघात से सपनों-कामनाओं-आकांक्षाओं की झील के शान्‍त तल पर मुक्ति की लहरें उठने लगती हैं जो कभी-कभी उत्‍ताल तरंगें भी बन जाती हैं। ये लहरें और तरंगें खण्डित और अधूरी मुक्ति चेतना के रूप में सामाजिक परिवेश की दीवारों से टकराती और टूटती रहती हैं।
बूढ़े गोरियो की बेटियाँ (बाल्‍जाक का उपन्‍यास ‘ओल्‍ड गोरियो’) पूरी तरह से एक ‘मिथ्‍या चेतना’ के वशीभूत हैं और बेइंतहा प्‍यार करने वाले बूढ़े पिता को निचोड़ कर रंगरलियाँ मनाना ही उनके लिए मुक्ति और आनन्‍द का पर्याय है। वे अपने आप में बूर्जुआ स्‍वार्थपरता का मूर्त रूप हैं और अपनी कामनाओं की बन्‍दी हैं। फ्लाबेयर के उपन्‍यास ‘मदाम बोवारी’ की नायिका एम्‍मा अपने दाम्‍पत्‍य जीवन की एकरसता, बोरियत और निरुद्देश्‍यता से स्‍वाभाविक तौर पर परेशान है और चिरनवीन प्‍यार की यूटोपियाई आत्‍मकेन्द्रित आकांक्षा में विवाहेतर प्रणय सम्‍बन्‍धों में भटकती हुई स्‍वयं को तबाह कर लेती है तथा अन्‍तत: मृत्‍यु का वरण करती है। व्‍यवस्‍था की अदृश्‍य दीवारें अन्‍तत: उसका गला घोट देती हैं। तोल्‍स्‍तोय की अन्‍ना कारेनिना भी कुछ अलग ढंग से इसी नियति का शिकार होती है। टॉमस हार्डी की एक नायिका टेस प्‍यार की तलाश में अपने समय की यौन नैतिकता के मानकों से टकराती है और उसकी कीमत चुकाती है। आशापूर्णा देवी की उपन्‍यास-त्रयी (‘प्रथम प्रतिश्रुति’, ‘सुवर्णलता’ और ‘बकुल कथा’) की नायिकाएँ सत्‍यवती, सुवर्णलता और बकुल तीन पीढ़ियों की स्त्रियाँ हैं और स्‍त्री अस्मिता और आजादी के बारे में उनके देश-काल-निबद्ध बोध अलग-अलग हैं, उनके चिन्‍तन के आकाश अलग-अलग हैं और उनके उद्यमों के दायरे भी अलग-अलग हैं। अपर्णा सेन की फि़ल्‍म ‘परोमा’ की नायिका अपने नीरस उबाऊ दाम्‍पत्‍य का एहसास होने पर उससे उबरने के लिए स्‍वत:स्‍फूर्त ढंग से एक विवाहेतर भावनात्‍मक सम्‍बन्‍ध को शरण्‍य बनाती है और जब उससे बाहर आती है तो अपनी स्‍वतंत्र स्‍त्री अस्मिता का बोध उपलब्धि के तौर पर उसके पास होता है। जब्‍बार पटेल की फि़ल्‍म ‘सुबह’ की नायिका सामाजिक सरगर्मियों के बीच अपने पारिवारिक जीवन की निस्‍सारता महसूस करती है और उससे बाहर आ कर एक अनिश्चित भविष्‍य की ओर यात्रा की शुरुआत करती है। शरतचन्‍द्र के उपन्‍यास ‘शेष प्रश्‍न’ की नायिका कमल न केवल अपने समय की हर नैतिक रूढ़ि पर प्रश्‍न उठाती है और जीवन को तर्क की कसौटी पर कसती है, बल्कि प्रणय और विवाह के मामले में भी विद्रोही आचरण करती है। कमल की तर्कणा और चिन्‍तन की स्‍वतंत्रता ही उसके जीवन की सार्थकता और संतुष्टि का स्रोत है। चेर्निशेव्‍स्‍की के उपन्‍यास ‘क्‍या करें’ की नायिका वेरा पाव्‍लोव्‍ना परिवार और ‘अरेंज्‍ड मैरिज’ के दमघोंटू माहौल से विद्रोह करके इस नतीजे पर पहुँचती है कि स्त्रियों की मुक्ति के लिए आर्थिक स्‍वतंत्रता पहली शर्त है। अपनी निजी मुक्ति को वह स्त्रियों की सामूहिक मुक्ति से जोड़ती है और समाजवादी सहकारी संस्‍थाओं के निर्माण के प्रयोगों के दौरान इस नतीजे पर पहुँचती है कि स्‍त्री-पुरुष की वास्‍तविक समानता, वास्‍तविक प्रेम और स्त्रियों की वास्‍तविक आजादी के लिए सामाजिक ढाँचे का समाजवादी पुनर्गठन अनिवार्य है। वेरा चेर्निशेव्‍स्‍की की उस प्रगतिशील यूटोपिया का मूर्त रूप है, जिसे मार्क्‍सवाद ने वैज्ञानिक रूप देते हुए आगे विकसित किया।
एक जाग्रत स्‍त्री आजादी चाहती है, सच्‍चा जीवन्‍त प्‍यार चाहती है, निर्णय की स्‍वतंत्रता चाहती है और मनुष्‍यता की उपलब्धियों और संधानों में पुरुष के साथ बराबरी की भागीदारी चाहती है। लेकिन स्त्रियों के जाग्रत होने के स्‍तर अलग-अलग हैं, इसलिए स्‍वयं वे अपनी मुक्ति की शर्तों और रास्‍ते को सुसंगत रूप में नहीं समझतीं, बल्कि विरूपित और खण्डित रूपों में महसूस करती हैं। हमारे आसपास मदाम बोवारी, अन्‍ना कारेनिना, टेस, कमल, सुवर्णलता, बकुल, बूढ़े गोरियो की बेटियाँ, परोमा, ‘सुबह’ की नायिका आदि अभी भी मौजूद हैं जो स्त्रियों की अतृप्‍त कामनाओं, अधूरे सपनों, खण्डित चाहतों, विरूपित आकांक्षाओं तथा अन्‍धे और आत्‍मकेन्द्रित मुक्ति प्रयासों के मूर्त रूप हैं। साथ ही, यहाँ-वहाँ कुछ वेरा पाव्‍लोव्‍ना भी मौजूद हैं और उसकी उत्‍तरवर्ती पीढ़ियाँ भी। स्त्रियों की मुक्ति के लिए जजरूरी है कि वे वेरा पाव्‍लोव्‍ना की अगली पीढ़ी की तरह कामना करना सीखें, सपने देखना सीखें और लड़ना सीखें।

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प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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Hawking: ‘I’m an atheist, science is more convincing than God’

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The world’s preeminent theoretical physicist has explicitly acknowledged for the first time that he is an atheist, explaining that “science offers a more convincing explanation” of the origins of the universe than ‘God.’

In an article published in the leading Spanish daily El Mundo, Hawking clarified an in famous passage in his international best selling book A Brief History of Time, in which he wrote:

“If we discover a complete [unifying] theory, it would be the ultimate triumph of human reason—for then we should know the mind of God.”“What I meant by ‘we would know the mind of God’ is, we would know everything that God would know, if there were a God, which there isn’t,” Hawking, 72, told El Mundo reporter Pablo Jáuregui. “I’m an atheist.”

“Before we understand science, it is natural to believe that God created the universe,” said Hawking. “But now science offers a more convincing explanation.”Although Hawking does not believe in any supernatural ‘God,’ he is convinced that earth isn’t the only planet harboring intelligent life.“The idea that we are alone in the universe seems to me completely implausible and arrogant,” Hawking told El Mundo. “

Considering the number of planets and stars that we know exist, it’s extremely unlikely that we are the only form of evolved life.”But Hawking warned humans would be wise to proceed with extreme caution when attempting to reach out to extraterrestrial beings, comparing any first contact to Christopher Columbus’ arrival in the Americas.

“[That] didn’t turn out very wellfor the Native Americans,” he noted.

Hawking, who has previously stated that he doesn’t believe humanity will survive the next thousand years “unless we spread into space,” reiterated his assertion that space exploration was humankind’s best hope for long-term survival.

“It could prevent the disappearance of humanity by colonizing other planets,” he said.

Hawking’s ‘coming out’ was among the worst-kept secrets in the world of science. He has strongly hinted at his atheism on numerous occasions.

In a 2010 conversation with evolutionary biologist Richard Dawkins, Hawking was asked if he believed the origin of life on earth is nothing more than coincidence.

“The existence of the earth and the properties that made it possible for biological life to develop depend on a very fine balance between the so-called constants of nature,” he explained. “If they were more than slightly different, either planets like the earth would not occur or the chemical processes necessary for life would not take place.”

“One might take this as evidence of a divine creator, but an alternative explanation is what is known as the multiverse,” Hawking continued. “The idea is that there are many possible universes [and] only in the small number of universes that are suitable will intelligence beings develop and be able to ask the question, ‘Why is the universe so carefully designed?’

“Hawking has even resorted to the sort of provocative anti-religion rhetoric that made Dawkins a household name and the world’s most famous atheist.

Comparing the human brain toa computer, Hawking suggested to the Guardian in a 2011 interview that ‘heaven’ was a “fairy story.”

“I regard the brain as a computer which will stop working when its components fail,” he explained when asked what happens when people die. “There is no heaven or afterlife for broken down computers; that is a fairy story for people afraid of the dark.”
When asked by ABC’s Diane Sawyer in 2010 whether there was a way to reconcile science and religion, Hawking cited a “fundamental difference between religion, which is based on authority, [and] science, which is based on observation and reason.”

“Science will win because it works,” he asserted.Still, Hawking has also occasionally confused observers by seemingly leaving the door open to the possibility of a ‘God.’

During a 2010 CNN interview with Larry King, for example, Hawking said, “God may exist, but science can explain the universe without the need for a creator.

”But his “we could know the mind of God” passage has been seized upon by some religious believers, who erroneously claim Hawking is aman of faith, or at least an agnostic. His latest comments, however, leave no doubt abou this atheist beliefs.

Source : Digital Journal

Brought To You By : Sikandar Kumar Mehta

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