गाय के बछड़े का गला काटते रंगे हाथ पकड़े गए दीक्षित बंधु, दंगा होते-होते बचा

गाय के नाम पर पूरे भारत में गौआतंकी निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं…

लखनऊ। गाय के नाम पर पूरे भारत में गौआतंकी निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले का जो मामला सामने आया है उससे पोल खुल गई है कि इस गौआतंक के पीछे किनका हाथ है।

हमने जब गोण्डापुलिस से ट्विटर पर घटना की जानकारी चाही, तो उत्तर मिला –

“इस प्रकरण में अभियुक्तों के खिलाफ धारा 295A,153A, 505b भादवि व 3/8 गोवध निवारण अधिनियम अभियोग पंजीकृत कर माननीय न्यायालय रवाना किया गया।”

शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने फेसबुक पेज पर कुछ चित्र शेयर किए हैं। पूरे घटनाक्रम को उन्होंने इसतरह बयाँ किया है –

रामसेवक दीक्षित, और मंगल दीक्षित ने गॉंव के ही गणेश प्रसाद का बछडा खोलकर उसका गला काट दिया, एक चश्मदीद हिंदू भाई ने इसे देखकर 100 नम्बर डायल कर दिया, संयोग से पुलिस वैन थोडी दूर से गुज़र रही थी, पुलिस ने रंगे हाथ रामसेवक दीक्षित को ख़ून लगे चाकू और काटे गये बछडे के साथ गिरफ़्तार कर लिया!

घटना गोंडा के थाना कटरा बाज़ार के गॉंव देवा पसिया भटपुरवा की है, 1 October रात 12 बजे घटी इस घटना ने पुलिस की सूझबूझ से गोंडा को जलने से बचा लिया !

एडिश्नल SP गोंडा ने गिरफ्तार रामसेवक और मंगल दीक्षित पर रासुका की कार्यवाई करने का आश्वासन दिया है !!

दशहरा, दुर्गापूजा, मुहर्रम, गॉंधी जयंती जैसे महत्वपूर्ण त्यौहारों से तनाव तनाव से गुज़र रहे समाज के लिये ये घटना कितनी भयावह हो सकती थी, अगर असली गुनहगार मौके से ना पकडे जाते तो आप अंदाज़ा लगाइये कि इल्ज़ाम मुललमानों पर जाता और शायद दंगा भी भडक सकता था !

दोस्त जैसे भाई मसूद आलम ने पूरी घटना की जानकारी दी है और तस्वीरें भी भेजी हैं, कुछ तस्वीरें आपसे साझा कर रहा हूँ ! इस घटना की गहराई से जॉंच हो तो शायद कुछ बडे साज़िशकर्ताओं के नाम आयेंगे !

शुक्रिया पुलिस प्रशासन गोंडा

आप लोग भी अपने अपने इलाक़ों में, गॉंवों में सतर्क रहिये, आसपास नज़र रखिये, क्योंकि समाज को जलाने और तोडने की कोशिश वाले गद्दार आपके आसपास ही छुपे हैं !

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

हमसे जुड़ें –

फेसबुक : एक नास्तिक – 1manatheist

ट्विटर : @1manatheist

Advertisements

पुजारियों की पैदावार – मीरा नन्दा

इस लेख में मीरा नंदा ने चर्चा की है कि किस तरह विश्‍वविद्यालय का दर्जा प्राप्‍त अनेक शिक्षा संस्‍थान पंडो, पुजारियों, कर्मकाण्डियों की पूरी जमात तैयार कर रहे हैं। ये लेख फ्रण्‍टलाइन पत्रिका में छपा था व इसका अनुवाद अमर नदीम ने किया।
image

मानद विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त कई शैक्षिक संस्थान हिन्दू कर्मकाण्डों के खुदरा व्यापारियों के लिये आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ियों की भूमिका निभा रहे हैं। भारत में जो बाज़ार के लिये फ़ायदेमंद है वही देवताओं के लिये भी फ़ायदेमंद सिद्ध हो रहा है। भारतीय मध्यवर्ग अपनी भौतिक सम्पदा में वृद्धि के अनुपात में ही ‘पूजा’ और ‘होम’ में भी उत्तरोत्तर वृद्धि करना आवश्यक और अनिवार्य समझता है। हर वाहन की ख़रीद के साथ पूजा होती है; ठीक वैसे ही जैसे ज़मीन के छोटे से टुकड़े पर भी किसी निर्माण से पहले ‘भूमि-पूजन’ अनिवार्य होता है। और हर पूजा के साथ एक ज्योतिषाचार्य और एक वास्तुशास्त्री भी जुड़ा ही रहता है। और हर प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य और वास्तुशास्त्री को कम्प्यूटर चलाना  और अंग्रेज़ी बोलना तो आना ही चाहिये ताकि वह अपनी बातों को “वैज्ञानिक” ढंग से प्रस्तुत कर सके।
भारत के लगातार फलते-फूलते ‘देवताओं’  के बाज़ार को देख कर एक प्रश्न सहज ही दिमाग़ में आता है- ये मॉडर्न दिखने वाले पुजारी, ज्योतिषाचार्य, वास्तुशास्त्री, और अन्य कर्मकाण्डी दुकानदार आख़िर आ कहां से रहे हैं? सभी तरह के धार्मिक कर्मकाण्डों के लिये 21वीं सदी के हिन्दुओं की इस अनन्त मांग के लिये कर्मकाण्डी पुरोहितों की आपूर्त्ति  आख़िर होती कहां से है?

मानद विश्वविद्यालय हमेशा से ही पारम्परिक गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं से लेकर घरों, मन्दिरों, दफ़्तरों, दुकानों, और बड़े-बड़े कॉरपोरेट बोर्डरूमों और अनिवासी भारतीयों तक फैली इस भारतीय मध्यवर्गीय श्रँखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते रहे हैं। ये विश्वविद्यालय, जिनमें से अधिकांश करदाताओं के पैसे से चलते हैं, अपने डिप्लोमा और डिग्रियों के द्वारा सक्रिय रूप से हिन्दू पुरोहित-कर्म का एक आधुनिक सँस्करण तैयार कर रहे हैं और उसे मध्यवर्ग के लिये एक आर्थिक रूप से सुविधाजनक रोज़गार के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने माध्यमिक स्तर से आगे की शिक्षा में ज्योतिष और कर्मकाण्ड को सम्मिलित करने के 2001 के अपने एक कुख्यात निर्णय से पहले से ही मौजूद उन सँस्कृत संस्थाओं को एक नया जीवन-दान दे दिया जिन्हें विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त था। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चे की सरकार ने मानद विश्वविद्यालयों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया जो हिन्दू पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिये लगातार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक बना हुआ है। अब भाजपा चाहे अगले कई वर्षों तक भी राजनीतिक सत्ता से दूर रहे फिर भी सत्ता में रहते समय इसने जो संस्थागत ढांचा तैयार कर दिया था वह परम्परागत हिन्दू ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के इसके उद्देश्य की पूर्ति करता रहेगा।

2001 में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा में ज्योतिष शास्त्र को शामिल करने का निर्णय लिया तब तक अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड सम्बन्धी पाठ्यक्रम के लिये जाने माने तीन अखिल भारतीय संस्थानों को मानद विश्वविद्यालय की मान्यता मिल चुकी थी। वे संस्थान हैं- श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,तिरुपति, और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार।

इन संस्थानों की विशेषज्ञता शास्त्रीय ज्ञान के बारे में है जिसमें ज्योतिष, पौरोहित्य और योग के उच्चतर पाठ्यक्रम भी शामिल हैं- वेद-वेदांग के नियमित पाठ्यक्रम के एक भाग और विशिष्ट डिप्लोमा या सर्टीफ़िकेट पाठ्यक्रमों के रूप में भी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (और तदोपरान्त उच्चतम न्यायालय) द्वारा ज्योतिष पाठ्यक्रम को हरी झण्डी दिखाये जाने के बाद से इनका अच्छा-ख़ासा विस्तार देखने में आया। उदाहरण के लिये श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ने 10वीं पंचवर्षीय योजना(2002-07) के दौरान ही अपने ज्योतिष विभाग के लिये नये उपकरण ख़रीदे और एक जन्म-कुण्डली बैंक स्थापित किया। ज्योतिष और पौरोहित्य में अंश-कालिक डिप्लोमा और सर्टीफ़िकेट कार्यक्रमों को प्रारंभ  करके भी इसने अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया। पर यह तो पानी पर तैरते हिमशैल का शिखर मात्र था।

मई 2002  में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान(आर एस एस) को विश्वविद्यालय की  मान्यता मिल गई। यह पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था (स्थापना-1970) जो लम्बे समय से प्राचीन  संस्कृत पाण्डुलिपियों और संस्कृत विद्वानों के संरक्षण के कार्य में लगी हुई थीअब नये पाठ्यक्रम बनाने, नये कोर्स प्रारम्भ करने और नई डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत कर दी गई। इसके दसों कैम्पसों (इलाहाबाद,पुरी,जम्मू,त्रिचूर,जयपुर,लखनऊ,श्रिंगेरी,गरली,भोपाल,मुम्बई) को भी विश्वविद्यालयों के समकक्ष होने की मान्यता मिली हुई है अर्थात उनमें से प्रत्येक (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले से ही परम उदार दिशा-निर्देशों के दायरे के अन्तर्गत) नये पाठ्यक्रम तैयार करने और डिग्रियां और डिप्लोमा प्रदान करने के लिये अधिकृत है। संस्थान इन कैम्पसों और नई दिल्ली और तिरुपति के उपरोक्त विद्यापीठों की गतिविधियों को समेकित करने के लिये केन्द्रक की भूमिका निभाता है। ग़ैर सरकारी गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को अनुदान और वित्तीय सहायता देना इसके कार्यभारों में से एक है। संस्कृत डिग्री धारकों के लिये रोज़गार के अवसर बेहतर करने के लिये संस्थान ज्योतिष और कर्मकाण्ड से जुड़े पाठ्यक्रमों के लिये छात्र वृत्तियां भी देता है। इसी सन्दर्भ में उन दो संस्थाओं को अभी हाल में ही ‘योग विश्वविद्यालय’ की मान्यता दिये जाने का उल्लेख भी आवश्यक है जो सीधे-सीधे ज्योतिष और कर्म-काण्ड से तो नहीं जुड़े हैं परन्तु फिर भी पुजारियों की अनवरत आपूर्ति सुनिश्चित करने में जिनकी भूमिका  महत्वपूर्ण है। वे संस्थायें हैं- बेंगलुरु स्थित स्वामी विवेकानन्द योग अनुसन्धान संस्था(SVYAS)  जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2001 में मान्यता प्रदान की थी, और मुंगेर फ़ोर्ट, बिहार स्थित बिहार योग भारती जिसे 2000 में विश्वविद्यालय के समकक्ष होने की मान्यता मिली।

पुरोहित-प्रशिक्षण संस्थानों के इस उलझे हुये ताने-बाने में दो और धागे भी हैं। केन्द्र सरकार उज्जैन स्थित महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान को वित्तपोषित करती है जो देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उगती ग़ैर सरकारी वैदिक पाठशालाओं और गुरुकुलों को मान्यता और धन उपलब्ध कराने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है। इन गुरुकुलों का मानकीकरण और उदीयमान पुरोहितों के लिये परीक्षाएं आयोजित करना इस संस्था के कार्यभारों में से हैं। इस संस्था से मान्यता मिलना गुरुकुलों की दुकान चलाने के लिए माने रखता है।

पूर्वोक्त मानद विश्वविद्यालयों के अलावा भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुमोदित राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की एक श्रेणी है जिसमें मध्यप्रदेश स्थित महर्षि महेश योगी का विश्वविद्यालय और रामटेक, महाराष्ट्र स्थित कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से  विश्वविद्यालय की पदवी स्थापना के पश्चात नहीं मिली अपितु इनकी तो स्थापना ही इनके प्रान्तीय विधान-मण्डलों द्वारा अपने आप में सम्पूर्ण विश्वविद्यालयों के रूप में की गई थी और बाद में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्रदान कर दी गई।

महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना कांग्रेस मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में 1995 में राज्य विधानमण्डल के सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा की गई थी। ऐसा महेश योगी को मध्य प्रदेश के अपने धरतीपुत्र के रूप में सम्मानित करने के लिये किया गया था। यह संस्था सभी तरह के वैदिक ज्ञान में पी एच डी आदि उच्च शैक्षिक उपाधियों का स्त्रोत बन चुकी है। इसके अनेक स्नातकों ने आगे चल कर कई मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योग स्थापित किये और/या वास्तुशास्त्रियों, ज्योतिषियों, रत्नशास्त्रियों इत्यादि के तौर पर अकादमियों की स्थापना की।
image

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता प्राप्त ये राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय और योग विश्वविद्यालय देश भर में जहां-तहां उगते छोटे-मोटे गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के लिये अन्तिम सीढ़ी की भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई पौरोहित्य पाठशालायें छोटे-छोटे साधनहीन लड़कों (लड़कियां निषिद्ध हैं) को प्रवेश देकर उन्हें पारम्परिक कर्म-काण्ड का प्रशिक्षण देते हैं। पर क्योंकि वे अकादमिक डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं अतः वे अपने छात्रों को किसी भी ऐसे मानद या मान्यताप्राप्त राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय में भेज देते हैं जिसकी विशेषज्ञता योगिक अथवा वैदिक विज्ञानों में हो जिनके दायरे में मोटे तौर पर ज्योतिष से लेकर योग तक सभी कुछ आ जाता है। इससे पुजारियों और कर्मकाण्डियों के रूप में देश-विदेश के बाज़ारों में उनके विद्यार्थियों की ‘मार्केटेबिलिटी’ बेहतर हो जाती है।

ये सही है कि संस्कृत की शिक्षा का हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों से गहरा सम्बन्ध है और कई बार दोनों को अलग-अलग करना कठिन होता है। यज्ञ या पूजा संस्कृत की डिग्री प्राप्त करने के लिये यजुर्वेद के अध्ययन का एक प्रायोगिक पहलू मात्र है। परन्तु संस्कृत में लिखे धार्मिक साहित्य के अध्यापन और कर्मकाण्डों के अध्यापन के बीच में कोई सीमारेखा खींचने का प्रयास करने के स्थान पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था ठीक विपरीत दिशा में मुड़ गई है। यह संस्कृत और हिन्दू दर्शन की शिक्षा की आड़ में जनता के पैसे और संसाधनों का उपयोग हिन्दू कर्मकाण्डों को बढ़ावा देने के लिये कर रही है।

अगर भारत अपने सार्वजनिक संसाधन मानद विश्वविद्यालयों के माध्यम से बहुमत के धर्म को प्रोत्सहित करने में झोंकता है तो क्या वह ख़ुद को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कह सकता है?

स्रोत  – http://smashfascism.net

प्रस्तुतकर्ता: सिकन्दर कुमार मेहता

हमसे जुड़ें –

फेसबुक : एक नास्तिक -1manatheist
ट्विटर : @1manatheist

[कविता] : धर्म

image
Pic - ©vaidambh

Follow Tweets by @1manatheist

नफरत हिंसा द्वेष घृणा का ढूंढा तो आधार धर्म ।
जितना खून बहा है जग में उसका भी आधार धर्म ।
विश्व विवादों की जा जड़ में देखा तो आधार धर्म ।
भूख गरीबी और शोषण का इनका भी आधार धर्म ।
आतंकवाद का पहन के चोला करता नरसंहार धर्म ।
रूढिवाद पाखंडवाद पाषाणवाद का खोल धर्म ।
छल प्रपंच का जाल रचाकर ठगने का ब्यापार धर्म ।
सारे पाप माफ हो जाते लगता यह पचनोल धर्म ।
पोप पुजारी जी को करता देखो मालामाल धर्म ।
आंख के अंधे भक्त गणों को करता यह कंगाल धर्म ।
स्वर्ग नरक भगवान भाग्य का फैला यह भ्रमजाल धर्म ।
तीर्थ और ब्रत में जा देखा पोपो की हर चाल धर्म ।
गांधी को गोली से उडाया इसका भी आधार धर्म ।
ईसा को सूली पे चढाया इसका भी आधार धर्म ।
दयानन्द को जहर पिलाया इसका भी आधार धर्म ।
मोहम्मद साहब को भी सताया इसका भी आधार धर्म ।
किया अहिल्या का मुंह काला इसका भी आधार धर्म ।
एकलव्य का कटा अंगूठा इसका भी आधार धर्म ।
सति बृन्दा के सत को लूटा इसका भी आधार धर्म ।
फिर बचा कौन दुष्कर्म जगत में न जिसका आधार धर्म ।
मंदिर मस्जिद बैर बढाते इतना तो शैतान धर्म ।
इनसे तो अच्छी मधुशाला इतना तो बदनाम धर्म ।
तर्क इसे न अच्छा लगता अक्ल पे ताला पड़ा धर्म ।
सुंदर सुघर सलोना मुखड़ा दिल का काला किन्तु धर्म ।
ढोंगी और पाखंडी कहते हिंदू सिक्ख इस्लाम धर्म ।
संत फकीर सभी यह कहते ईसा मूसा राम धर्म ।
ज्ञानी ध्यानी सव जन कहते वेद पुरान कुरान धर्म ।
सौ बातों की बात एक है मानव का इंसान धर्म ।
कोई कहता है आचार धर्म कोई कहता है ब्यवहार धर्म ।
पर मेरी समझ में यह आया बस मानव का उपकार धर्म ।
मानव सेवा ईश्वर सेवा मानवता ही है सार धर्म ।
कबिरा ने सिखाया प्यार धर्म बरना आडम्बर यार धर्म ।

– Yadunandan Lal Lodhi

प्रस्तुतकर्ता सिकन्दर कुमार मेहता

हमसे जुड़ें –

फेसबुक एक नास्तिक – 1manatheist
ट्विटर – @1manatheist

आस्तिक और नास्तिक

आस्तिक और नास्तिक

Follow Tweets by @1manatheist

• जिस प्रकार आस्तिकों की “आस्था”होती है और आस्तिक लोग जब भी मौका या समय मिलता है अपनी आस्था व्यक्त करने से लिए तथा अपनी आस्था के समर्थन में विचार रखने के लिए बिल्कुल भी चुकते नहीं हैं।।

ठीक इसी प्रकार नास्तिक लोगों की “नास्था” होती है और यदि नास्तिकों को अवसर मिलता है तो वे अपनी नास्था  व्यक्त और प्रकट क्यों नहीं कर सकते हैं।।

• आस्तिकों की मंशा होती है कि सभी लोग उनकी तरह पत्थर को भगवान् माने और अंधभक्ती डुबे रहे और इसके लिए समय-समय पर आस्तिकों द्वारा अनेक कार्यक्रम भी कराएं जाते हैं।।

ठीक इसी तरह नास्तिक चाहते हैं कि सभी लोग तर्क करना सीखें और सच को जाने  व अधिक से अधिक लोग अंधविश्वास और पाखंड को छोड़कर “सार्वभौमिक ज्ञान” को खुद स्वीकार कर और लोगों को बताएं।।

• आस्तिकों को आस्था और भावना का सम्मान होना चाहिए।।

ठीक इसी तरह नास्तिकों के नास्था और भावनाओं को सम्मान मिलना चाहिए।।

• नास्तिकों की बात से आस्थावान व्यक्ति की आस्था आहत होती है।।

ठीक इसी प्रकार आस्तिकों के बात से इनकी अंधभक्ति देख के नास्थावान तर्कशील जागरूक व्यक्ति को भी गहरा आघात पहुंचता है।।

• हर आस्तिक अंधविश्वासी व्यक्ति नास्तिक वास्तविक व्यक्ति को हेय घृणा की नजर से देखता है और उससे बात करने से कतराता है।।

लेकिन नास्तिकों के मन में आस्तिकों के लिए ऐसी भावना नहीं होती वह तो हर आस्तिक व्यक्तियों से चर्चा कर सच तक पहुंचने की कोशिश करता है।।

• आस्तिक व्यक्ति नास्तिक से चर्चा करने ही भागता है जबकि नास्तिक व्यक्ति आस्तिकों के साथ चर्चा बातचीत के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।।

• आस्तिक पौराणिक ग्रन्थों की बात करते हैं।।

नास्तिक प्राचीन और आधुनिक  दोनों काल के विश्व के अनेक देशों के विद्वानों की रचनाओं और उनकी शिक्षा की  बात करते हैं।।

• भारत के आस्तिक सिर्फ भारतीयों द्वारा लिखित धर्म ग्रंथों की बात करते हैं।।

नास्तिक हर देश के विद्वान और हर धर्म में समाहित ज्ञान की बात करते हैं।।

• हिन्दू आस्तिक सिर्फ बाह्मणों की लिखी हुई काल्पनिक कथा पढते हैं।

जबकि हिन्दू नास्तिक सभी प्रकार के विचारधाराओं वाली तर्क और सत्य पर आधारित पुस्तक पढते हैं।।

• आस्तिक लोग अपने धर्म ग्रंथों में लिखी बातों को ही सही मानते हैं।।

नास्तिक लोग सार्वभौमिक सत्य और तर्क पर खरा उतरने वाली बात को सही मानते हैं।।

• आस्तिक लोग नास्तिकों को अपने जैसा बनाने का प्रयास नहीं करते।।

नास्तिक लोग आस्तिकों को अपने जैसा बनाने का प्रयास करते रहते हैं।।

• आस्तिक लोग नास्तिकों को अपना नहीं मानते।।

नास्तिक लोग आस्तिकों को अपना मानते हैं और उन्हें जागरूक करना चाहते हैं।।

• आस्तिक धर्म और ईश्वर पर अपने विचार रखते हैं तो कोई बात नहीं होती।।

जब नास्तिक धर्म और ईश्वर पर अपने विचार रखते हैं तो किसी को बुरा नहीं लगना चाहिए।।

• आस्तिक किसी नास्तिक को अपने जैसा आस्तिक बनाने का कोई प्रयास नहीं करता।।

मगर नास्तिक सभी आस्तिकों को अंधविश्वास से आजाद करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहता।।

स्रोत : व्हाट्स ऐप

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

धर्म और आस्था के नाम पर वेश्यावृति

Tweets by @1manatheist

आंध्र प्रदेश की लक्ष्मम्मा अधेड़ उम्र की हैं और उनके मां-बाप ने उन्हें मंदिर को देवदासी बनाने के लिए दान कर दिया। इसकी वजह लक्ष्मम्मा कुछ यू बयां करती हैं, ‘मेरे माता-पिता की तीनों संतानें लड़कियां थीं। दो लड़कियों की तो उन्होंने शादी कर दी लेकिन मुझे देवदासी बना दिया ताकि मैं उनके बुढ़ापे का सहारा बन सकूं।’ आज भी आंध्र प्रदेश में, विशेषकर तेलंगाना क्षेत्र में दलित महिलाओं को देवदासी बनाने या देवी देवताओं के नाम पर मंदिरों में छोड़े जाने की रस्म चल रही है। लक्ष्मम्मा मानती हैं कि उनका भी शारीरिक शोषण हुआ लेकिन वो अपना दर्द किसी के साथ बांटना नहीं चाहतीं। जिस शारीरिक शोषण के शिकार होने के सिर्फ जिक्र भर से रुह कांप जाती हैं, उस दिल दहला देने वाले शोषण का सामना ये देवदासियां हर दिन करती हैं। ये दर्द इकलौती लक्ष्मम्मा का नहीं है, आंध्र प्रदेश में लगभग 30 हज़ार देवदासियां हैं जो धर्म के नाम पर शारीरिक शोषण का शिकार होती हैं।

image

देवदासी शब्द का प्रथम प्रयोग कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में मिलता है। मत्स्य पुराण, विष्णु पुराण एवं अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी इस शब्द का उल्लेख मिलता है। फिर भी इस प्रथा की शुरुआत कब हुई, इसके बारे में सुनिश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता। भारत में सबसे पहले देवदासी प्रथा के अंतर्गत धर्म के नाम पर औरतों के यौन शोषण को संस्थागत रूप दिया गया था। इतिहास और मानव विज्ञान के अध्येताओं के अनुसार देवदासी प्रथा संभवत: छठी सदी में शुरू हुई थी। ऐसा माना जाता है कि अधिकांश पुराण भी इसी काल में लिखे गए।देवदासी का मतलब है ‘सर्वेंट ऑफ गॉड’, यानी देव की दासी या पत्नी ।

image

देवदासियां मंदिरों की देख-रेख, पूजा-पाठ के लिए सामग्री-संयोजन,मंदिरों में नृत्य आदि के अलावा प्रमुख पुजारी, सहायक पुजारियों,प्रभावशाली अधिकारियों, सामंतों एवं कुलीन अभ्यागतों के साथ संभोग करती थीं, पर उनका दर्जा वेश्याओं वाला नहीं था। इसका प्रचलन दक्षिण भारत में प्रधान रूप से था ।इस अश्लील तमाशे के पीछे लोगों का यह विश्वास था कि मंदिर में देवदासी के साथ प्रणय-क्रीड़ा करने से गांव पर कोई विपत्ति नहीं आती और सुख-शांति बनी रहती है।यह कुप्रथा भारत में आज भी महाराष्ट्र और कर्नाटक के कोल्हापुर, शोलापुर, सांगली, उस्मानाबाद, बेलगाम, बीजापुर, गुलबर्ग आदि में बेरोकटोक जारी है। कर्नाटक के बेलगाम जिले के सौदती स्थित येल्लमा देवी के मंदिर में हर वर्ष माघ पुर्णिमा जिसे ‘रण्डी पूर्णिमा’ भी कहते है,के दिन किशोरियों को देवदासियां बनाया जाता है। उस दिन लाखों की संख्या में भक्तजन पहुँच कर आदिवासी लड़कियों के शरीर के साथ सरेआम छेड़छाड़ करते हैं। शराब के नशे में धूत हो अपनी काम पिपासा बुझाते हैं।

image

यहां बेटी बनती है अपनी मां की सौतन, सालों से जारी है परंपरा कालिदास के ‘मेघदूतम्’ में मंदिरों में नृत्य करने वाली आजीवन कुंआरी कन्याओं का वर्णन मिलता है, जो संभवत: देवदासियां ही रही होंगी। प्रख्यात लेखक दुबॉइस ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू मैनर्स, कस्टम्स एंड सेरेमनीज़’ में लिखा है कि प्रत्येक देवदासी को देवालय में नाचना-गाना पड़ता था। साथ ही, मंदिरों में आने वाले खास मेहमानों के साथ शयन करना पड़ता था। इसके बदले में उन्हें अनाज या धनराशि दी जाती थी। प्राय: देवदासियों की नियुक्ति मासिक अथवा वार्षिक वेतन पर की जाती थी। मध्ययुग में देवदासी प्रथा और भी परवान चढ़ी। सन् 1351 में भारत भ्रमण के लिए आए अरब के दो यात्रियों ने वेश्याओं को ही ‘देवदासी’ कहा। उन्होंने लिखा है कि संतान की मनोकामना रखने वाली औरत को यदि सुंदर पुत्री हुई तो वह ‘बोंड’ नाम से जानी जाने वाली मूर्ति को उसे समर्पित कर देती है। वह कन्या रजस्वला होने के बाद किसी सार्वजनिक स्थान पर निवास करने लगती है और वहां से गुजरने वाले राहगीरों से, चाहे वो किसी भी धर्म अथवा संप्रदाय के हों, मोल-भाव कर कीमत तय कर उनके साथ संभोग करती है। यह राशि वह मंदिर के पुजारी को सौंपती है।

image

देवदासियों को अतीत की बात मान लेना गलत होगा। दक्षिण भारतीय मंदिरों में किसी न किसी रूप में आज भी उनका अस्तित्व है। स्वतंत्रता के बाद पैंतीस वर्ष की अवधि में ही लगभग डेढ़ लाख कन्याएं देवी-देवताओं को समर्पित की गईं। ऐसी बात नहीं है कि अब यह कुप्रथा पूरी तरह समाप्त हो गई है। अभी भी यह कई रूपों में जारी है। कर्नाटक सरकार ने 1982 में और आंध्र प्रदेश सरकार ने 1988 में इस प्रथा को गैरकानूनी घोषित कर दिया था, लेकिन मंदिरों में देवदासियों का गुजारा बहुत पहले से ही मुश्किल हो गया था। 1990 में किये गए एक सर्वेक्षण के अनुसार 45.9 फीसदी देवदासियां महानगरों में वेश्यावृत्ति में संलग्न मिलीं, बाकी ग्रामीण क्षेत्रों में खेतिहर मजदूरी और दिहाड़ी पर काम करती पाई गईं।

स्रोत –लाइव इंडिया हिन्दी

प्रस्तुतकर्ता-सिकन्दर कुमार मेहता

हमसे जुड़ें –
फेसबुक – एक नास्तिक -1manatheist
ट्विटर- @1manatheist

क्या दुनिया से धर्म ग़ायब हो जाएगा !

क्या दुनिया से धर्म ग़ायब हो जाएगा

नास्तिकता दुनियाभर में बढ़ रही है, तो क्या धार्मिक होना अतीत की बात हो जाएगी? इस सवाल का जवाब मुश्किल नहीं, बहुत-बहुत मुश्किल है.

कैलिफ़ोर्निया में क्लेरमोंट के पिटज़र कॉलेज में सामाजिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर फिल ज़करमैन कहते हैं, “इस समय दुनिया में पहले के मुक़ाबले नास्तिकों की संख्या बढ़ी है, और इंसानों में इनका प्रतिशत भी बढ़ा है.”

यह तथ्य गैलप इंटरनेशनल के सर्वे में उभरकर सामने आया है. गैलप इंटरनेशनल के सर्वे में 57 देशों में 50,000 से अधिक लोगों को शामिल किया गया.

सर्वे के मुताबिक़ 2005 से 2011 के दौरान धर्म को मानने वाले लोगों की तादाद 77 प्रतिशत से घटकर 68 प्रतिशत रह गई है, जबकि ख़ुद को नास्तिक बताने वालों को संख्या में तीन प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है.

इस तरह दुनिया में नास्तिकों का आंकड़ा बढ़कर 13 प्रतिशत तक पहुँच गया है.

अगर नास्तिकों की संख्या में बढ़ोतरी का सिलसिला यूँ ही जारी रहा तो क्या किसी दिन धर्म पूरी तरह से ग़ायब हो जाएगा?

धर्म का मुख्य आकर्षण है कि यह अनिश्चित दुनिया में सुरक्षा का अहसास दिलाता है.

इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि नास्तिकों की संख्या में सबसे अधिक बढ़ोतरी उन देशों में हुई है जो अपने नागरिकों को आर्थिक, राजनीतिक और अस्तित्व की अधिक सुरक्षा देते हैं.

जापान, कनाडा, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड्स, चेक गणराज्य, एस्तोनिया, जर्मनी, फ्रांस, उरुग्वे ऐसे देश हैं जहाँ 100 साल पहले तक धर्म महत्वपूर्ण हुआ करता था, लेकिन अब इन देशों में ईश्वर को मानने वालों की दर सबसे कम है.

इन देशों में शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था काफ़ी मज़बूत है. असमानता कम है और लोग अपेक्षाकृत अधिक धनवान हैं.

न्यूज़ीलैंड की ऑकलैंड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक क़्वेंटिन एटकिंसन कहते हैं, “असल में, लोगों में इस बात का डर कम हुआ है कि उन पर क्या बीत सकती है.”

लेकिन धर्म में आस्था उन समाजों और देशों में भी घटी है जिनमें ख़ासे धार्मिक लोग हैं जैसे – ब्राज़ील, जमैका और आयरलैंड.

प्रोफ़ेसर फिल ज़करमैन कहते हैं, “दुनिया में बहुत कम समाज हैं जहाँ पिछले 40-50 साल के मुक़ाबले में धर्म में आस्था बढ़ी है. एक अपवाद ईरान हो सकता है लेकिन सही से आंकना मुश्किल है क्योंकि धर्मनिरपेक्ष लोग अपने विचार छिपा भी रहे हो सकते हैं.”

वैंकुवर स्थित ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सामाजिक मनोविज्ञानी एरा नोरेनज़ायन कहते हैं, “धर्म के प्रति आस्था में कमी का मतलब इसका ग़ायब हो जाना नहीं है.”

आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन का संकट गहराएगा और प्राकृतिक संसाधनों में कमी आएगी, पीड़ितों की संख्या बढ़ेगी और धार्मिक भावना में इज़ाफ़ा हो सकता है.

नोरेनज़ायन कहते हैं, “लोग दुख से बचना चाहते हैं, लेकिन यदि वे इससे बाहर नहीं निकल पाते तो वे इसका अर्थ खोजना चाहते हैं. कुछ कारणों से धर्म, पीड़ा को अर्थ देने लगता है.”

वे कहते हैं कि यदि दुनिया की परेशानियां चमत्कारिक ढंग से हल हो जाएं और हम सभी शांतिपूर्ण तरीक़े से समान जीवन जीएं, तब भी धर्म हमारे आस-पास रहेगा.

ऐसा इसलिए है क्योंकि मानव विकास के दौरान हमारे दिमाग में ईश्वर के बारे में जिज्ञासा हमारी प्रजाति के तंत्रिका तंत्र में बनी रहती है.

इसे जानने के लिए दोहरी प्रक्रिया सिद्धांत को समझने की ज़रूरत है. यह मनोवैज्ञानिक विषय बताता है कि बुनियादी रूप से हमारे दो विचार सिस्टम हैं. सिस्टम एक और सिस्टम दो.

सिस्टम दो हाल ही में विकसित हुआ है. यह हमारे दिमाग़ की आवाज़ है- ये हमारे दिमाग़ में बार-बार गूँजती है और कभी चुप होती- जो हमें योजना बनाने और तार्किक रूप से सोचने को मजबूर करता है.

दूसरी तरफ़ सिस्टम एक, सहज, स्वाभाविक और ऑटोमैटिक है. ये क्षमताएं इंसानों में नियमित तौर पर विकसित होती रहती हैं, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि इंसान कहां पैदा हुआ है.

वे अस्तित्व के तंत्र हैं. सिस्टम एक, बिना सोचे हमें बिना ज़्यादा प्रयास के अपनी मूल भाषा में बात करने देता है, बच्चों को माता-पिता की पहचान कराने और सजीव और निर्जीव वस्तुओं के बीच भेद करने की क्षमता देता है.

यह दुनिया को बेहतर तरीक़े से समझने, प्राकृतिक आपदाओं या अपने क़रीबियों की मौत की घटनाओं को समझने में मदद करता है.

धर्म से छुटकारा

नास्तिकों को नास्तिक बनने या बने रहने के लिए अनेक सांस्कृतिक और मानव विकास से जुड़े बंधनों के ख़िलाफ़ लड़ना पड़ता है. इंसान स्वाभाविक तौर पर ये मानना चाहते हैं कि वो किसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है और जीवन पूरी तरह से निरर्थक नहीं है.

हमारा मन, उद्देश्य और स्पष्टीकरण के लिए लालायित रहता है.

‘बौर्न बीलीवर्स’ के लेखक जस्टिन बैरेट कहते हैं, “इस बात के प्रमाण हैं कि धार्मिक विचारों को अपनाना मनुष्य के लिए – पाथ ऑफ़ लीस्ट रज़िज़टेंस – यानी सबसे कम प्रतिरोध का रास्ता होता है. धर्म से छुटकारा पाने के लिए आपको मानवता में शायद कुछ मूलभूत बदलाव करने होंगे.”

ईश्वर के प्रति आस्था की बात करें तो हालाँकि 20 प्रतिशत अमरीकी किसी चर्च से संबद्ध नहीं थे, लेकिन उनमें से 68 प्रतिशत ने माना कि उनका ईश्वर में विश्वास है और 37 प्रतिशत ने ख़ुद को धार्मिक बताया.

इसी तरह, दुनियाभर में उन लोगों ने जिन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका ईश्वर में यक़ीन नहीं है, उनमें भी भूतों, ज्योतिष, कर्म, टेलीपैथी, पुनर्जन्म जैसे अंधविश्वासों की प्रवृत्ति पाई गई.

धर्म, समूह सामंजस्य और सहयोग को बढ़ावा देता है. कथित लक्ष्मण रेखा को पार करने वालों पर सर्वशक्तिमान ईश्वर की नज़र पुराने समाज को व्यवस्थित रखने में मदद करती थी.

एटकिंसन कहते हैं, “यह अलौकिक सज़ा परिकल्पना है. यदि हर कोई मानेगा कि सज़ा वास्तव में होगी तो यह पूरे समूह के लिए काम करेगी.”

अटूट विश्वास

अंत में, धर्म की आदत के पीछे कुछ गणित भी है. तमाम संस्कृतियों में जो लोग ज़्यादा धार्मिक हैं वे उन लोगों के मुक़ाबले ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं जिनकी धर्म के प्रति आस्था नहीं है.

विशेषज्ञों का मानना है कि मनोवैज्ञानिक, तंत्रिका विज्ञान, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और तार्किक, इन सभी कारणों को देखते हुए धर्म शायद कभी इंसानों से दूर नहीं जा सकेगा. धर्म, चाहे इसे डर या प्यार से बनाए रखा गया हो- खुद को बनाए रखने में अत्यधिक सफल रहा है. अगर ऐसा नहीं होता तो यह शायद हमारे साथ नहीं होता

प्रस्तुतकर्ता –सिकन्दर कुमार मेहता

हमसे जुड़ें –
फेसबुक – एक नास्तिक -1manatheist
ट्विटर – @1manatheist

धर्म – एक मीठा जहर

~धर्म में ठहराव है और आगे बढ़ना जिंदगी है~

धर्म की तुलना हम ठहरे हुए पानी से कर सकते है। सभी धर्मो में ईश्वर अल्लाह भगवान इत्यादि की कल्पना के आगे कुछ नहीं है, धर्म यहीं पर आकर ठहर चूका है। इनमे ऊपरी या अंदरुनी तौर पर कुछ नया होने की कोई संभावनाएं नहीं है। धर्म सतह से उतना ही निर्मल स्वच्छ दीखता है जिस तरह ठहरे हुए पानी की सतह साफ़ और निर्मल दीखती है, पर जैसे ही आप उस पानी में प्रवेश करते है आपको पानी के नीचे के दलदल का आभास हो जाता है।

अब इस दलदल में उतरनेे के बाद लोग बाहर निकलने की कोशिश करना छोड़ देते है क्योंकि उस स्थिति में आपके डूबने का खतरा अधिक होता है।

बच सकते है अगर “कोई आपको किनारे से हाथ देकर बाहर निकाल लेता है।”
“दूसरी परिस्थिति में अगर इस दलदल में आप साथी ढूंढ लेते है तो दोनों एक दूसरे की मदद से बाहर निकल सकते है।”

फिर भी यदि आप निकलने की उम्मीद ही छोड़ देते है तो आपका भविष्य अंत में उस दलदल में समा जाना है।

विचार करे देश में जितने भी दंगे हुए उसका कारण अगर धर्म नहीं तो क्या है? और धर्म ही अगर कारण है तो इस कारण को जीवित कौन रखने में आपका कितना सहयोग है। दंगो में या आतंकवाद में आज तक आप सुरीक्षित रहे अच्छी बात है पर जो लोग मारे गए वो किसी दूसरे देश या आसमान से आये लोग नहीं थे। वो भी आप और हम लोगो की तरह आम लोग ही थे।

दंगों और आतंकवाद को चलाने के लिए हथियारों की जरूरत होती है। तो इन हथियारों के लिए पैसा कहाँ से आता है और धर्म के नाम पर इकठ्ठा किया पैसा कहाँ जाता है? कहीं हम खुद ही तो अपनी कब्र नहीं खोद रहे। ये सवाल हर उस व्यक्ति के लिए है जो बिना सोचे बिना परिणाम की परवाह किये धर्म के पीछे दौड़ रहा है। (कोई भी धर्म चंदे का हिसाब सार्वजानिक नहीं करता।)

अब कृपा करके दौड़ना बंद कीजिये। रुकिए और कुछ पल के लिए सोचिये। धर्म किसी के घर का चूल्हा नहीं जलवा पाता मगर एक दिन ये धर्म लोगो घर जरूर जलवा देता है। तब जिस किसी भी देवी देवता भगवान अल्लाह ईश्वर या किसी को भी आप पूजते या मानते है वो भी बचाने नहीं आता। क्योंकि अब तक कोई भगवान अल्लाह किसी को बचाने नहीं आया (गुजरात UP जैसे दंगो की त्रासदियां हो या फिर केदारनाथ, नेपाल, तमिलनाडु और मक्का जैसी प्राकृतिक आपदाएं)। अगर भगवान अल्लाह बचाने ही आते तो देश की सेना को हर आपदा में तैनात नहीं करना पड़ता।

हम फिर भी नफरतो में उलझे है, हिन्दू ने मदद की या मुसलमान ने। अरे भाई, हिन्दू मुसलमान दोनों मरे, न अल्लाह ने मदद की न भगवान ने। ये नफरत धर्म की फैलाई हुई है, बस। समझाना मुश्किल नहीं, असुरक्षा के भ्रम में असुरक्षा हम लोगो की ही पैदा की हुई है। जिस हिन्दू या मुसलमान ने कभी किसी दूसरे मुसलमान या हिन्दू का कुछ बुरा नहीं किया वो आपस में एक दूसरे से नफरत क्यों पाल रहे है।

ब्लड डोनेट (रक्तदान) करने वाले हिन्दू मुसलमान सिख ईसाई सभी लोग इंसान ही होते है। क्योंकि इंसानो में गायो या किसी जानवर का खून नहीं चढ़ाया जाता। स्वीकार करे, हम शुरू में और अंत में सिर्फ इंसान ही होते है।
कपिल कान्त~
शेयर करे, एक समझदार शिक्षित और बेहतर देश के निर्माण के लिए।
Note-
I would not mind if anyone translate this article in regional language and publish with his her own name. But, this article is not for sale purpose and not for any commercial use.
ध्यान दे-
आप इस लेख को अपनी क्षेत्रीय भाषा में अनुवाद करके आपके नाम से शेयर करे इस पर मेरी कोई आपत्ति नहीं है। पर इसका कोई भी व्यापारिक उपयोग प्रतिबंधित किया जाता है।

प्रस्तुतकर्ता –सिकन्दर कुमार मेहता
हमसे जुड़ें –
फेसबुक –एक नास्तिक -1manatheist
ट्विटर- @1manatheist