धर्म शास्त्र,विवेक और विज्ञान के दुश्मन हैं, कैसे ?

धर्म शास्त्र विवेक और विज्ञान के दुश्मन हैं, कैसे आईये देखते हैं:

1. विज्ञान व भूगोल :
गंगा हिमालय के गंगोत्री हिमनद (ग्लेशियर) से निकलती है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
गंगा शिवजी की जटा से निकलती है और भगीरथ इसे स्वर्ग से धरती पर लाया था।

2. विज्ञान व भूगोल:
जल-वाष्प भरे बादल जब हवाओं के सम्पर्क में आते हैं तो वर्षा होती है

जबकि धर्म व शास्त्र :
वर्षा इंद्र देवता कराते हैं।

3. विज्ञान व भूगोल :
पृथ्वी अपनी धुरी पर 23 डिग्री झुकी हुई है। जब दो tectonic plates आपस में टकराती हैं तो भूकंप आता है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है और जब वह करवट बदलता है तो भूकम्प आता हैं। दूसरी जगह लिखा है कि प्रथ्वी बैल/गाय के सीगं पर टिकी हुई है और थक कर जब वह सीगं बदलता/ती है तो भूकम्प आता है।

4. विज्ञान व भूगोल :
पृथ्वी और चन्द्रमा परिक्रमा करते हुऐ जब पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के मध्य आ जाती है तो चंद्र ग्रहण होता है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
चंद्र ग्रहण के समय राहु चन्द्रमा को खा जाता है।

5. विज्ञान :
हवाई जहाज के माध्यम से मानव हवाई सैर करता है।

जबकि धर्म व शास्त्र :
बिना किसी माध्यम के तथाकथित देवी देवता और राक्षस हवा में उड सकते थे।

6. विज्ञान :
यहां कौसो दूर भी दूरसंचार के माध्यम से मानव एक दूसरे से मन की बात कर सकते हैं।

जबकि धर्म व शास्त्र :
केवल साधु- संत ही बिना किसी माध्यम के ही मन की बात उन्हीं के बनाये ईश्वर से कर लिया करते थे।

अब फैसला आपका ?

आप अपने बच्चों का बौद्धिक विकास करने के लिए उन्हें विज्ञान पढ़ाते हैं या अंधविश्वासी बनाने के लिए उन्हे अप्रमाणित धर्म व शास्त्र ।

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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इंसान अंधविश्वासी क्यू बनता है ?

इस पोस्ट को पूरा पढ़ने से पहले ये समझ लेना जरूरी है कि कोई भी इंसान पैदा होता है, तो, वो कोई धर्म लेकर पैदा नही होता, उसे बचपन से जैसा सिखाया जाता है वो ठीक वैसा ही वो अनुसरण करता है,
1930 से रूस वालो ने अपने बच्चों को ये सिखाया की ना ही आत्मा होती है और ना ही परमात्मा होता है, पूरे 25 वर्ष लगे ये बात समझाने में तब जाकर उनकी पीढ़ी ये बात को समझी और आज रूस नास्तिक देश है, और साथ में विकसित देश है

आज यदि भारत के लोगो को यदि कोई, आत्मा, परमात्मा चमत्कार, भूत का अस्तित्व के बारे कोई कह रहा हो, तो जल्दी से उनके दिमाग मे उतरने लगता है। लेकिन इसके विपरीत कोई कुछ कह रहा है, तो उल्टा उसे पागल करार कर दिया जाता है ।

दोस्तो ऐसा क्यों होता है?

इसका जवाब ये है कि बचपन से होनेवाले हमारे मन पर आस्तिक संस्कार ।

स्कूल हो, या घर हो, थीएटर हो हर तरफ दैवीय शक्ति को बचपन से हमारे कच्चे मन मे बिठा दि जाती है।

ऐसे संस्कारो मे हम पलते है, बडे होते है और अपने अंतर्मन मे पक्का बैठ जाता है कि भगवान का अस्तित्व है , शैतान भी है ।उसे नकारने के लिए मन तैयार नही हो पाता। इसलिए आपने उन लोगो के सामने कितना भी माथा पीटे, तो भी वे यही कहेंगे कि भगवान है ।

आज भी टी.वी सिरीयल मे अंधविश्वास ,काल्पनिक बातो के अतिरिक्त और कुछ भी नही दिखाया जाता।
इसलिए आज से ही अपने बच्चो पर विज्ञानवादी संस्कार दो ताकि वे अंधविश्वास के जाल मे न फसे और खुद के फैसले खुद लेने लगेंगे किसी दैवीय शक्ति पर इसके लिए निर्भर न रहे ।

● बचपन मे माअ कहती है उधर मत जाना वर्ना भूत आ जाएगा. . .

● बचपन मे मा बताती है भगवान के सामने हाथ जोडकर बोल ‘भगवान मुझे पास कर दो ‘।

● टीवी पर कार्टून मे चमत्कार, जादू जैसी अवैज्ञानिक बाते दिखाकर बच्चो का मनोरंजन किया जाता है, लेकिन चमत्कार और जादू की बच्चो के अन्तर्मन मेें गहराई तक असर होता है और बड़े होने के बाद भी इंसान के मन मे चमत्कार और जादू के लिए आकर्षण कायम रहता है ।

● स्कूल मे जो विज्ञान सिखाया जाता है उसका संबंध रोजमर्रा की जिंदगी से न जोड़ना ।

● Law Of Monopoly मतलब 99% समाज के लोग इसी राह पर चल रहे है तो जरूर वे सही ही होंगे, हमने उनका अनुकरण करणा चाहिये ये समझ।

● इंसानी जीवन भाव भावनाओ का और उलझा होने के कारण उसमे असीम सुख और दुख की विस्मयकारक शाॅकिंग मिलावट है, जो बाते उसे हिलाकर रख देती है और उसका चमत्कारो पर यकीन पक्का होता जाता है ।

● हमने ये किया इसलिये ऐसा हुआ और हमने ऐसा नहीं किया इसलिए हमारे साथ वैसा कुछ हुआ है ।ऐसी कुछ योगायोग की घटनाओ को इंसान नियम समझकर जीवन भर उसका बोझ उठाता रहता है ।

●Law Of Repeated Audio Visual Effect- इस तत्व के अनुसार समाज मे मिडिया, माउथ पब्लिसिटी, सामाजिक उत्सव इत्यादि माध्यम से जो इंसान को बारबार दिखाया जाता है, सुनाया जाता है उसपर इंसान आसानी से यकीन कर लेता है ।

● ‘डर ‘ और ‘ लोभ ‘ ये दो नैसर्गिक भावनाए हर इंसान के भीतर बडे तौर पर होती है, लेकिन जिस दिन ये भावनाए इंसान के जीवन पर प्रभुत्व प्रस्थापित करती है तब वह मानसिक गुलामगिरी मे फसता जाता है ।

● और अंत मे सभी मे महत्वपूर्ण बात ‘चमत्कार’ होता है ऐसा सौ बार आग्रह से बताने वाले सभी धर्म के ग्रंथ इस बात की वजह है ।इसलिए धर्म ग्रंथ मे बतायी गयी अतिरंजित बाते कैसे गलत है, ये वक्त रहते ही बच्चो को समझाने की कोशिश करे ।

भारत अंधविश्वास मुक्त करो

भारत महासत्ता बनेगा

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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आज भी मनाई जाती हैं ऐसी अजीब परंपराएं, जानकर हैरान हो जाएंगे आप

संपूर्ण विश्व में अलग-अलग संप्रदाय, धर्म और संस्कृति को मानने वाले लोग हैं और सभी धर्मों में अपने-अपने रीति रिवाज भी होते हैं।

मल्टीमीडिया डेस्क। संपूर्ण विश्व में अलग-अलग संप्रदाय, धर्म और संस्कृति को मानने वाले लोग हैं और सभी धर्मों में अपने-अपने रीति रिवाज भी होते हैं। कुछ रिवाज तो ऐसे भी होते हैं जो अजीब होने के साथ मानवीय संवेदना विचलित करने वाले होते हैं। आज हम आपको कुछ ऐसी ही अजीब रीति रिवाजों के बारें में बताने जा रहे हैं जो कि विश्व के विभिन्न भागो में मनाई जाती है।

मृतक के केश, चीन-

चीन के मिआओ जनजाति में यह परंपरा बहुत ही अजीब प्रकार से मनाई जाती है। इस जनजाति में अब केवल 5000 लोग ही शेष बचे हैं। इसके बाद भी यह अपने परंपराओं को मनाने में कोई कोताही नहीं करते हैं। इस अलौकिक परंपरा में यह जनजाति मरे हुए लोगों के केशों को उनके शरीर से निकाल कर उससे विग की बुनाई की जाती है। इसके अलावा भी इस जनजाति की महिलाएं बालों में कंघी करते समय निकले बालों को भी संभालकर रखती हैं और इसकी सहायता से विग का निर्माण करती हैं।

पूर्वजों के बालों से बनाए गये इस विग को विशेष त्योहारों के मौके पर श्रृंगार के रूप में पहना जाता है। हालांकि इस जनजाति में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं के बालों का विग मिलता है। क्योंकि उनके केश ज्यादा होते हैं।

मृत शरीर के आस पास नृत्य करना, मेडागास्कर-

मेडागास्‍कर में एक अलग ही रिवाज है। मेडागास्‍कर में आदमी के मरने के बार त्‍योहार जैसा माहौल होता है। यहां के परिवार एक अजीब रस्‍म फामाडिहाना (टर्निग ऑफ द बोन्स) मनाते हैं। इस रस्‍म में लोग कब्र से लाश को फिर से निकाल उनकी शव यात्रा निकालते हैं। इस दौरान नए कपड़े पहने जाते हैं। शव को भी एक नए साफ कपड़े में लपेटते हैं और फिर उसके साथ ही नाचते-गाते हैं। नाच-गाने के लिए तेज संगीत भी बजाया जाता है। जानवरों की बलि दी जाती है और मेहमानों व परिवारजनों के बीच मांसाहारी भोजन बांटा जाता है।

मृतकों की राख खाना, अमेजन-

मृतकों की राख खाने की यह अजीब परंपरा अमेजन वर्षावन में रहने वाले योनोमी जनजाति द्वारा प्रचलित है। योनोमी लोगों का मानना है कि इनके संप्रदाय के लोगों की मौत स्वाभाविक रूप से नहीं होती बल्कि इसके बजाय दुश्मन जनजाति के जादूगर द्वारा भेजी एक बुरी आत्मा के कारण होती है। उनका विश्वास है कि यह आत्मा समुदाय में किसी व्यक्ति की मृत्यु का बदला लेने के लिए आती है। इसलिए, मृतक के समुदाय में प्रियजनों का अंतिम संस्कार से 30 से 45 दिनों के बाद एक समारोह का आयोजन किया जाता है जिसमें सभी रिश्तेदार उनके अस्थियों से बने सूप में मृतक की राख डालकर पीना पड़ता है।

दुल्हन का अपहरण, किर्गिस्तान-

यह एक अजीब परंपरा है जो अभी भी किर्गिस्तान, मोल्दोवा और चेचन्या जैसे क्षेत्रों में जारी है। इस परंपरा में जो भी व्यक्ति किसी लड़की से विवाह करना चाहता है वह अपने मित्रों की मदद से उक्त लड़की का अपहरण कर लेता है। वहां इसे कोई अपराध नहीं समझा जाता है क्योंकि इस परंपरा के अनुसार अपहरण के बाद लड़के तथा लड़की के परिवार के लोग इस विवाह को संपन्न कराते हैं। यह यहां की एक सामान्य परंपरा है जो वर्षों से चली आ रही है।

बच्ची को उपर उछालना, कर्नाटक-

आज भी कर्नाटक के कुछ भागों में यह विवादित परंपरा को मनाया जाता है। इसमें 2 वर्ष से छोटी लड़की को लगभग 30 फीट की उंचाई से मंदिर के गुंबद तक उछाला जाता है। इसके बाद एक कंबल की मदद से लड़की को नीचे खड़े लोगों के द्वारा पकड़ लिया जाता है। हालांकि लड़की को सुरक्षित रोक लिया जाता है लेकिन उम्र को देखकर ऐसा करना खतरे से खाली नहीं है।

स्रोत : नई दुनिया

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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गाय के बछड़े का गला काटते रंगे हाथ पकड़े गए दीक्षित बंधु, दंगा होते-होते बचा

गाय के नाम पर पूरे भारत में गौआतंकी निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं…

लखनऊ। गाय के नाम पर पूरे भारत में गौआतंकी निर्दोषों की हत्याएं कर रहे हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले का जो मामला सामने आया है उससे पोल खुल गई है कि इस गौआतंक के पीछे किनका हाथ है।

हमने जब गोण्डापुलिस से ट्विटर पर घटना की जानकारी चाही, तो उत्तर मिला –

“इस प्रकरण में अभियुक्तों के खिलाफ धारा 295A,153A, 505b भादवि व 3/8 गोवध निवारण अधिनियम अभियोग पंजीकृत कर माननीय न्यायालय रवाना किया गया।”

शायर इमरान प्रतापगढ़ी ने अपने फेसबुक पेज पर कुछ चित्र शेयर किए हैं। पूरे घटनाक्रम को उन्होंने इसतरह बयाँ किया है –

रामसेवक दीक्षित, और मंगल दीक्षित ने गॉंव के ही गणेश प्रसाद का बछडा खोलकर उसका गला काट दिया, एक चश्मदीद हिंदू भाई ने इसे देखकर 100 नम्बर डायल कर दिया, संयोग से पुलिस वैन थोडी दूर से गुज़र रही थी, पुलिस ने रंगे हाथ रामसेवक दीक्षित को ख़ून लगे चाकू और काटे गये बछडे के साथ गिरफ़्तार कर लिया!

घटना गोंडा के थाना कटरा बाज़ार के गॉंव देवा पसिया भटपुरवा की है, 1 October रात 12 बजे घटी इस घटना ने पुलिस की सूझबूझ से गोंडा को जलने से बचा लिया !

एडिश्नल SP गोंडा ने गिरफ्तार रामसेवक और मंगल दीक्षित पर रासुका की कार्यवाई करने का आश्वासन दिया है !!

दशहरा, दुर्गापूजा, मुहर्रम, गॉंधी जयंती जैसे महत्वपूर्ण त्यौहारों से तनाव तनाव से गुज़र रहे समाज के लिये ये घटना कितनी भयावह हो सकती थी, अगर असली गुनहगार मौके से ना पकडे जाते तो आप अंदाज़ा लगाइये कि इल्ज़ाम मुललमानों पर जाता और शायद दंगा भी भडक सकता था !

दोस्त जैसे भाई मसूद आलम ने पूरी घटना की जानकारी दी है और तस्वीरें भी भेजी हैं, कुछ तस्वीरें आपसे साझा कर रहा हूँ ! इस घटना की गहराई से जॉंच हो तो शायद कुछ बडे साज़िशकर्ताओं के नाम आयेंगे !

शुक्रिया पुलिस प्रशासन गोंडा

आप लोग भी अपने अपने इलाक़ों में, गॉंवों में सतर्क रहिये, आसपास नज़र रखिये, क्योंकि समाज को जलाने और तोडने की कोशिश वाले गद्दार आपके आसपास ही छुपे हैं !

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता

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पुजारियों की पैदावार – मीरा नन्दा

इस लेख में मीरा नंदा ने चर्चा की है कि किस तरह विश्‍वविद्यालय का दर्जा प्राप्‍त अनेक शिक्षा संस्‍थान पंडो, पुजारियों, कर्मकाण्डियों की पूरी जमात तैयार कर रहे हैं। ये लेख फ्रण्‍टलाइन पत्रिका में छपा था व इसका अनुवाद अमर नदीम ने किया।
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मानद विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त कई शैक्षिक संस्थान हिन्दू कर्मकाण्डों के खुदरा व्यापारियों के लिये आपूर्ति की महत्वपूर्ण कड़ियों की भूमिका निभा रहे हैं। भारत में जो बाज़ार के लिये फ़ायदेमंद है वही देवताओं के लिये भी फ़ायदेमंद सिद्ध हो रहा है। भारतीय मध्यवर्ग अपनी भौतिक सम्पदा में वृद्धि के अनुपात में ही ‘पूजा’ और ‘होम’ में भी उत्तरोत्तर वृद्धि करना आवश्यक और अनिवार्य समझता है। हर वाहन की ख़रीद के साथ पूजा होती है; ठीक वैसे ही जैसे ज़मीन के छोटे से टुकड़े पर भी किसी निर्माण से पहले ‘भूमि-पूजन’ अनिवार्य होता है। और हर पूजा के साथ एक ज्योतिषाचार्य और एक वास्तुशास्त्री भी जुड़ा ही रहता है। और हर प्रतिष्ठित ज्योतिषाचार्य और वास्तुशास्त्री को कम्प्यूटर चलाना  और अंग्रेज़ी बोलना तो आना ही चाहिये ताकि वह अपनी बातों को “वैज्ञानिक” ढंग से प्रस्तुत कर सके।
भारत के लगातार फलते-फूलते ‘देवताओं’  के बाज़ार को देख कर एक प्रश्न सहज ही दिमाग़ में आता है- ये मॉडर्न दिखने वाले पुजारी, ज्योतिषाचार्य, वास्तुशास्त्री, और अन्य कर्मकाण्डी दुकानदार आख़िर आ कहां से रहे हैं? सभी तरह के धार्मिक कर्मकाण्डों के लिये 21वीं सदी के हिन्दुओं की इस अनन्त मांग के लिये कर्मकाण्डी पुरोहितों की आपूर्त्ति  आख़िर होती कहां से है?

मानद विश्वविद्यालय हमेशा से ही पारम्परिक गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं से लेकर घरों, मन्दिरों, दफ़्तरों, दुकानों, और बड़े-बड़े कॉरपोरेट बोर्डरूमों और अनिवासी भारतीयों तक फैली इस भारतीय मध्यवर्गीय श्रँखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी की भूमिका निभाते रहे हैं। ये विश्वविद्यालय, जिनमें से अधिकांश करदाताओं के पैसे से चलते हैं, अपने डिप्लोमा और डिग्रियों के द्वारा सक्रिय रूप से हिन्दू पुरोहित-कर्म का एक आधुनिक सँस्करण तैयार कर रहे हैं और उसे मध्यवर्ग के लिये एक आर्थिक रूप से सुविधाजनक रोज़गार के रूप में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने माध्यमिक स्तर से आगे की शिक्षा में ज्योतिष और कर्मकाण्ड को सम्मिलित करने के 2001 के अपने एक कुख्यात निर्णय से पहले से ही मौजूद उन सँस्कृत संस्थाओं को एक नया जीवन-दान दे दिया जिन्हें विश्वविद्यालय का दर्ज़ा प्राप्त था। साथ ही भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतान्त्रिक मोर्चे की सरकार ने मानद विश्वविद्यालयों का एक ऐसा नेटवर्क तैयार कर दिया जो हिन्दू पुरोहितों के प्रशिक्षण के लिये लगातार प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से सहायक बना हुआ है। अब भाजपा चाहे अगले कई वर्षों तक भी राजनीतिक सत्ता से दूर रहे फिर भी सत्ता में रहते समय इसने जो संस्थागत ढांचा तैयार कर दिया था वह परम्परागत हिन्दू ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के इसके उद्देश्य की पूर्ति करता रहेगा।

2001 में जब विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने उच्च शिक्षा में ज्योतिष शास्त्र को शामिल करने का निर्णय लिया तब तक अपने ज्योतिष और कर्मकाण्ड सम्बन्धी पाठ्यक्रम के लिये जाने माने तीन अखिल भारतीय संस्थानों को मानद विश्वविद्यालय की मान्यता मिल चुकी थी। वे संस्थान हैं- श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली, राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ,तिरुपति, और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार।

इन संस्थानों की विशेषज्ञता शास्त्रीय ज्ञान के बारे में है जिसमें ज्योतिष, पौरोहित्य और योग के उच्चतर पाठ्यक्रम भी शामिल हैं- वेद-वेदांग के नियमित पाठ्यक्रम के एक भाग और विशिष्ट डिप्लोमा या सर्टीफ़िकेट पाठ्यक्रमों के रूप में भी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (और तदोपरान्त उच्चतम न्यायालय) द्वारा ज्योतिष पाठ्यक्रम को हरी झण्डी दिखाये जाने के बाद से इनका अच्छा-ख़ासा विस्तार देखने में आया। उदाहरण के लिये श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ ने 10वीं पंचवर्षीय योजना(2002-07) के दौरान ही अपने ज्योतिष विभाग के लिये नये उपकरण ख़रीदे और एक जन्म-कुण्डली बैंक स्थापित किया। ज्योतिष और पौरोहित्य में अंश-कालिक डिप्लोमा और सर्टीफ़िकेट कार्यक्रमों को प्रारंभ  करके भी इसने अपने प्रभाव-क्षेत्र का विस्तार किया। पर यह तो पानी पर तैरते हिमशैल का शिखर मात्र था।

मई 2002  में नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान(आर एस एस) को विश्वविद्यालय की  मान्यता मिल गई। यह पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था (स्थापना-1970) जो लम्बे समय से प्राचीन  संस्कृत पाण्डुलिपियों और संस्कृत विद्वानों के संरक्षण के कार्य में लगी हुई थीअब नये पाठ्यक्रम बनाने, नये कोर्स प्रारम्भ करने और नई डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत कर दी गई। इसके दसों कैम्पसों (इलाहाबाद,पुरी,जम्मू,त्रिचूर,जयपुर,लखनऊ,श्रिंगेरी,गरली,भोपाल,मुम्बई) को भी विश्वविद्यालयों के समकक्ष होने की मान्यता मिली हुई है अर्थात उनमें से प्रत्येक (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पहले से ही परम उदार दिशा-निर्देशों के दायरे के अन्तर्गत) नये पाठ्यक्रम तैयार करने और डिग्रियां और डिप्लोमा प्रदान करने के लिये अधिकृत है। संस्थान इन कैम्पसों और नई दिल्ली और तिरुपति के उपरोक्त विद्यापीठों की गतिविधियों को समेकित करने के लिये केन्द्रक की भूमिका निभाता है। ग़ैर सरकारी गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं को अनुदान और वित्तीय सहायता देना इसके कार्यभारों में से एक है। संस्कृत डिग्री धारकों के लिये रोज़गार के अवसर बेहतर करने के लिये संस्थान ज्योतिष और कर्मकाण्ड से जुड़े पाठ्यक्रमों के लिये छात्र वृत्तियां भी देता है। इसी सन्दर्भ में उन दो संस्थाओं को अभी हाल में ही ‘योग विश्वविद्यालय’ की मान्यता दिये जाने का उल्लेख भी आवश्यक है जो सीधे-सीधे ज्योतिष और कर्म-काण्ड से तो नहीं जुड़े हैं परन्तु फिर भी पुजारियों की अनवरत आपूर्ति सुनिश्चित करने में जिनकी भूमिका  महत्वपूर्ण है। वे संस्थायें हैं- बेंगलुरु स्थित स्वामी विवेकानन्द योग अनुसन्धान संस्था(SVYAS)  जिसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने 2001 में मान्यता प्रदान की थी, और मुंगेर फ़ोर्ट, बिहार स्थित बिहार योग भारती जिसे 2000 में विश्वविद्यालय के समकक्ष होने की मान्यता मिली।

पुरोहित-प्रशिक्षण संस्थानों के इस उलझे हुये ताने-बाने में दो और धागे भी हैं। केन्द्र सरकार उज्जैन स्थित महर्षि सान्दीपनि राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान को वित्तपोषित करती है जो देश भर में कुकुरमुत्तों की तरह उगती ग़ैर सरकारी वैदिक पाठशालाओं और गुरुकुलों को मान्यता और धन उपलब्ध कराने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है। इन गुरुकुलों का मानकीकरण और उदीयमान पुरोहितों के लिये परीक्षाएं आयोजित करना इस संस्था के कार्यभारों में से हैं। इस संस्था से मान्यता मिलना गुरुकुलों की दुकान चलाने के लिए माने रखता है।

पूर्वोक्त मानद विश्वविद्यालयों के अलावा भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा अनुमोदित राज्य स्तरीय विश्वविद्यालयों की एक श्रेणी है जिसमें मध्यप्रदेश स्थित महर्षि महेश योगी का विश्वविद्यालय और रामटेक, महाराष्ट्र स्थित कवि कुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय शामिल हैं। इन्हें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से  विश्वविद्यालय की पदवी स्थापना के पश्चात नहीं मिली अपितु इनकी तो स्थापना ही इनके प्रान्तीय विधान-मण्डलों द्वारा अपने आप में सम्पूर्ण विश्वविद्यालयों के रूप में की गई थी और बाद में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा मान्यता प्रदान कर दी गई।

महर्षि महेश योगी वैदिक विश्वविद्यालय की स्थापना कांग्रेस मुख्यमन्त्री दिग्विजय सिंह के कार्यकाल में 1995 में राज्य विधानमण्डल के सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा की गई थी। ऐसा महेश योगी को मध्य प्रदेश के अपने धरतीपुत्र के रूप में सम्मानित करने के लिये किया गया था। यह संस्था सभी तरह के वैदिक ज्ञान में पी एच डी आदि उच्च शैक्षिक उपाधियों का स्त्रोत बन चुकी है। इसके अनेक स्नातकों ने आगे चल कर कई मुनाफ़ा कमाने वाले उद्योग स्थापित किये और/या वास्तुशास्त्रियों, ज्योतिषियों, रत्नशास्त्रियों इत्यादि के तौर पर अकादमियों की स्थापना की।
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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मान्यता प्राप्त ये राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय और योग विश्वविद्यालय देश भर में जहां-तहां उगते छोटे-मोटे गुरुकुलों और वैदिक पाठशालाओं के लिये अन्तिम सीढ़ी की भूमिका निभाते हैं। इनमें से कई पौरोहित्य पाठशालायें छोटे-छोटे साधनहीन लड़कों (लड़कियां निषिद्ध हैं) को प्रवेश देकर उन्हें पारम्परिक कर्म-काण्ड का प्रशिक्षण देते हैं। पर क्योंकि वे अकादमिक डिग्रियां प्रदान करने के लिये अधिकृत नहीं हैं अतः वे अपने छात्रों को किसी भी ऐसे मानद या मान्यताप्राप्त राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय में भेज देते हैं जिसकी विशेषज्ञता योगिक अथवा वैदिक विज्ञानों में हो जिनके दायरे में मोटे तौर पर ज्योतिष से लेकर योग तक सभी कुछ आ जाता है। इससे पुजारियों और कर्मकाण्डियों के रूप में देश-विदेश के बाज़ारों में उनके विद्यार्थियों की ‘मार्केटेबिलिटी’ बेहतर हो जाती है।

ये सही है कि संस्कृत की शिक्षा का हिन्दू धर्म के कर्मकाण्डों से गहरा सम्बन्ध है और कई बार दोनों को अलग-अलग करना कठिन होता है। यज्ञ या पूजा संस्कृत की डिग्री प्राप्त करने के लिये यजुर्वेद के अध्ययन का एक प्रायोगिक पहलू मात्र है। परन्तु संस्कृत में लिखे धार्मिक साहित्य के अध्यापन और कर्मकाण्डों के अध्यापन के बीच में कोई सीमारेखा खींचने का प्रयास करने के स्थान पर भारतीय शिक्षा व्यवस्था ठीक विपरीत दिशा में मुड़ गई है। यह संस्कृत और हिन्दू दर्शन की शिक्षा की आड़ में जनता के पैसे और संसाधनों का उपयोग हिन्दू कर्मकाण्डों को बढ़ावा देने के लिये कर रही है।

अगर भारत अपने सार्वजनिक संसाधन मानद विश्वविद्यालयों के माध्यम से बहुमत के धर्म को प्रोत्सहित करने में झोंकता है तो क्या वह ख़ुद को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य कह सकता है?

स्रोत  – http://smashfascism.net

प्रस्तुतकर्ता: सिकन्दर कुमार मेहता

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[कविता] : धर्म

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नफरत हिंसा द्वेष घृणा का ढूंढा तो आधार धर्म ।
जितना खून बहा है जग में उसका भी आधार धर्म ।
विश्व विवादों की जा जड़ में देखा तो आधार धर्म ।
भूख गरीबी और शोषण का इनका भी आधार धर्म ।
आतंकवाद का पहन के चोला करता नरसंहार धर्म ।
रूढिवाद पाखंडवाद पाषाणवाद का खोल धर्म ।
छल प्रपंच का जाल रचाकर ठगने का ब्यापार धर्म ।
सारे पाप माफ हो जाते लगता यह पचनोल धर्म ।
पोप पुजारी जी को करता देखो मालामाल धर्म ।
आंख के अंधे भक्त गणों को करता यह कंगाल धर्म ।
स्वर्ग नरक भगवान भाग्य का फैला यह भ्रमजाल धर्म ।
तीर्थ और ब्रत में जा देखा पोपो की हर चाल धर्म ।
गांधी को गोली से उडाया इसका भी आधार धर्म ।
ईसा को सूली पे चढाया इसका भी आधार धर्म ।
दयानन्द को जहर पिलाया इसका भी आधार धर्म ।
मोहम्मद साहब को भी सताया इसका भी आधार धर्म ।
किया अहिल्या का मुंह काला इसका भी आधार धर्म ।
एकलव्य का कटा अंगूठा इसका भी आधार धर्म ।
सति बृन्दा के सत को लूटा इसका भी आधार धर्म ।
फिर बचा कौन दुष्कर्म जगत में न जिसका आधार धर्म ।
मंदिर मस्जिद बैर बढाते इतना तो शैतान धर्म ।
इनसे तो अच्छी मधुशाला इतना तो बदनाम धर्म ।
तर्क इसे न अच्छा लगता अक्ल पे ताला पड़ा धर्म ।
सुंदर सुघर सलोना मुखड़ा दिल का काला किन्तु धर्म ।
ढोंगी और पाखंडी कहते हिंदू सिक्ख इस्लाम धर्म ।
संत फकीर सभी यह कहते ईसा मूसा राम धर्म ।
ज्ञानी ध्यानी सव जन कहते वेद पुरान कुरान धर्म ।
सौ बातों की बात एक है मानव का इंसान धर्म ।
कोई कहता है आचार धर्म कोई कहता है ब्यवहार धर्म ।
पर मेरी समझ में यह आया बस मानव का उपकार धर्म ।
मानव सेवा ईश्वर सेवा मानवता ही है सार धर्म ।
कबिरा ने सिखाया प्यार धर्म बरना आडम्बर यार धर्म ।

– Yadunandan Lal Lodhi

प्रस्तुतकर्ता सिकन्दर कुमार मेहता

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आस्तिक और नास्तिक

आस्तिक और नास्तिक

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• जिस प्रकार आस्तिकों की “आस्था”होती है और आस्तिक लोग जब भी मौका या समय मिलता है अपनी आस्था व्यक्त करने से लिए तथा अपनी आस्था के समर्थन में विचार रखने के लिए बिल्कुल भी चुकते नहीं हैं।।

ठीक इसी प्रकार नास्तिक लोगों की “नास्था” होती है और यदि नास्तिकों को अवसर मिलता है तो वे अपनी नास्था  व्यक्त और प्रकट क्यों नहीं कर सकते हैं।।

• आस्तिकों की मंशा होती है कि सभी लोग उनकी तरह पत्थर को भगवान् माने और अंधभक्ती डुबे रहे और इसके लिए समय-समय पर आस्तिकों द्वारा अनेक कार्यक्रम भी कराएं जाते हैं।।

ठीक इसी तरह नास्तिक चाहते हैं कि सभी लोग तर्क करना सीखें और सच को जाने  व अधिक से अधिक लोग अंधविश्वास और पाखंड को छोड़कर “सार्वभौमिक ज्ञान” को खुद स्वीकार कर और लोगों को बताएं।।

• आस्तिकों को आस्था और भावना का सम्मान होना चाहिए।।

ठीक इसी तरह नास्तिकों के नास्था और भावनाओं को सम्मान मिलना चाहिए।।

• नास्तिकों की बात से आस्थावान व्यक्ति की आस्था आहत होती है।।

ठीक इसी प्रकार आस्तिकों के बात से इनकी अंधभक्ति देख के नास्थावान तर्कशील जागरूक व्यक्ति को भी गहरा आघात पहुंचता है।।

• हर आस्तिक अंधविश्वासी व्यक्ति नास्तिक वास्तविक व्यक्ति को हेय घृणा की नजर से देखता है और उससे बात करने से कतराता है।।

लेकिन नास्तिकों के मन में आस्तिकों के लिए ऐसी भावना नहीं होती वह तो हर आस्तिक व्यक्तियों से चर्चा कर सच तक पहुंचने की कोशिश करता है।।

• आस्तिक व्यक्ति नास्तिक से चर्चा करने ही भागता है जबकि नास्तिक व्यक्ति आस्तिकों के साथ चर्चा बातचीत के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।।

• आस्तिक पौराणिक ग्रन्थों की बात करते हैं।।

नास्तिक प्राचीन और आधुनिक  दोनों काल के विश्व के अनेक देशों के विद्वानों की रचनाओं और उनकी शिक्षा की  बात करते हैं।।

• भारत के आस्तिक सिर्फ भारतीयों द्वारा लिखित धर्म ग्रंथों की बात करते हैं।।

नास्तिक हर देश के विद्वान और हर धर्म में समाहित ज्ञान की बात करते हैं।।

• हिन्दू आस्तिक सिर्फ बाह्मणों की लिखी हुई काल्पनिक कथा पढते हैं।

जबकि हिन्दू नास्तिक सभी प्रकार के विचारधाराओं वाली तर्क और सत्य पर आधारित पुस्तक पढते हैं।।

• आस्तिक लोग अपने धर्म ग्रंथों में लिखी बातों को ही सही मानते हैं।।

नास्तिक लोग सार्वभौमिक सत्य और तर्क पर खरा उतरने वाली बात को सही मानते हैं।।

• आस्तिक लोग नास्तिकों को अपने जैसा बनाने का प्रयास नहीं करते।।

नास्तिक लोग आस्तिकों को अपने जैसा बनाने का प्रयास करते रहते हैं।।

• आस्तिक लोग नास्तिकों को अपना नहीं मानते।।

नास्तिक लोग आस्तिकों को अपना मानते हैं और उन्हें जागरूक करना चाहते हैं।।

• आस्तिक धर्म और ईश्वर पर अपने विचार रखते हैं तो कोई बात नहीं होती।।

जब नास्तिक धर्म और ईश्वर पर अपने विचार रखते हैं तो किसी को बुरा नहीं लगना चाहिए।।

• आस्तिक किसी नास्तिक को अपने जैसा आस्तिक बनाने का कोई प्रयास नहीं करता।।

मगर नास्तिक सभी आस्तिकों को अंधविश्वास से आजाद करने के लिए हमेशा प्रयत्नशील रहता।।

स्रोत : व्हाट्स ऐप

प्रस्तुतकर्ता : सिकन्दर कुमार मेहता